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Monday, December 26, 2011

सत्यनिष्ठा




नौकरी का आवेदन पत्र भेजने के सात साल बाद चन्द्राकर को साक्षात्कार के लिये बुलाया गया.अब उसे नौकरी की जरूरत नहीं थी क्योंकि वह बिजनेस करने लगा था , लेकिन अनुभव प्राप्त करने के लिये वह साक्षात्कार बोर्ड में उपस्थित हुआ.एक सदस्य ने पूछा..."इस पद के लिये आपमे कितनी काबिलियत है?" जबाव था---"सर यह पद आरक्षित है और मैं अकेला उम्मेदवार हूं. "दूसरे सदस्य ने पूछा---"आपको इस पद पर काफ़ी मेहनत करनी होगी.?"चन्द्राकर ने कहा--"सर मेहनत करने की मुझे आदत नहीं है...हां मैं चमचागिरी कर सकता हूं."तीसरे सदस्य ने कहा---"क्या आप विश्वास दिलायेंगे कि आप ईमानदारी से काम करेंगे ".उसने छूटते ही उत्तर दिया---"हां मैं यकीन दिलाता हूं कि भ्रष्टाचार से कमाये गये सभी रुपयों का हिसाब और कमीशन उपर के अधिकारी तक ईमानदारी से पहुंचा दूंगा."फ़िर बोर्ड के चेयर्मैन ने उसे यह कहते हुए बधाई दी कि उसका चयन कर लिया गया है.जाते समय चन्द्राकर यह जानना चाहता था कि उसके चयन का आधार क्या था.कुछ कहने के बदले चेयर्मैन ने उसके तरफ़ एक पुरानी पेपर जिसमे भारत का मानचित्र खींचा था और जिसके बीच मे एक जगह पर सत्यनिष्ठा लिखा हुआ था उसकी ओर बढा दिया.

Wednesday, April 27, 2011

चुप्पी



बीच चौराहे पर दो-तीन गुंडों ने सेठ की गाङी रोक दी और अंधा-धुंध फ़ायरिंग की. सेठ वहीं ढेर हो गया. तभी किसी ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस आयी और पूछताछ करने लगी. इंसपेक्टर ने कहा--- " बीच चौराहे पर किसी को गोली मारी गयी और किसी ने नहीं देखा ? ये कैसे हो सकता है ? कोई तो सच-सच बताओ कि गोली किसने चलायी." अपराधी तो वहां से भाग चुके थे पर किसी भद्र-जन ने अपनी चुप्पी नहीं तोङी. तभी एक अस्सी साल का बूढा सामने आकर कहा....."Gentleman such offens is niver committed  due to the violence of bad people but the silence of good people    (ऐसे अपराध गिने-चुने बुरे लोगों की हिसा की वजह से नहीं बल्कि ढेर सारे अच्छे लोगों की चुप्पी की वजह से होती है.)

Thursday, October 7, 2010

तीसरी ताकत का सच

आज भी ठेकेदार ने काम देने से मना कर दिया. ठेकेदार के तो सौ में से पचास रुपये कमीशन देने में खर्च हो जाते हैं. इमानदारे से उसे काम मिलता ही कहां है. लेकिन बेचारा मजदूर तो पिस रहा है. सात दिनों से काम नहीं. आज तो घर में खाने के लिये अनाज भी नहीं है. जिसकी औकात नहीं होती उसे बैंक भी कर्ज नहीं देता. वह परेशान होकर घर लौटा और बैठ गया चेहरे को हाथों में लेकर. पत्नी चांदिया सामने आकर खङी हो गयी.आंखों में आंसू की दो बूंदों के सिवा कुछ ना कह सकी. होठ फङफ़ङाये जरूर लेकिन शब्दहीन स्वर भूख की त्रासदी के सिवा कुछ भी बय़ां नहीं कर पाये. वह बोला----"जाता हूं चौराहे पर....सभी को जमा करता हूं और कहता हूं कि हमें भी रोटी पाने का हक है. यदि हमें रोटी नहीं मिला तो मैं दुनियां में आग लगा दूंगा." चांदिया बोली----" तमाशा करने की कोई जरुरत नहीं हैं.बाहर के लोग समझते हैं हमारा देश दुनियां की तीसरी ताकत है. यह क्यों नहीं सोचते कि सच बोलोगे तो हमारी तीसरी ताकत की छवि का क्या होगा...".


चांदिया की तीन साल की भूखी बेटी मुस्कुरा कर अपनी मां को मौन समर्थन दे रही थी.

Monday, October 4, 2010

ट्रांसफ़र (लघुकथा)

(ससुरजी तो घर पर रह ही रहे है. उनसे बातचीत नोंक-झोंक चलता ही रहता है.आपको एक और खुशखबरी दे रहा हूं कि मेरी सासू मां, मेरे सालेजी और प्यारी साली भी जल्द ही मेरे घर पधार रही हैं....इसलिये अभी थोङा सा विराम लेता हूं कुछ दिनों के बाद पुन: यह व्यन्ग्य श्रृंखला लेकर उपस्थित हो जाउंगा)



                                             ट्रांसफ़र (लघुकथा)



डी.जी.पी साहब ने पदभार संभालते ही डाटा मंगवाया. अस्सी आई.पी.एस अधिकारी और मालदार पोस्ट सिर्फ़ बीस.क्या करते ....? बीस सबसे भ्रष्ट अधिकारियों को मालदार पोस्टों पर ट्रांसफ़र कर दिया गया. सबसे मालदार पोस्ट पर जिस एस.पी ने ज्वायन किया उसने डाटा लेकर सभी डी.एस.पी और थाना प्रभारियो के मालदार पोस्टों पर भ्रष्ट पुलिसवालों को ट्रांसफ़र कर दिया. सबसे मालदार थाना का प्रभारी सबसे भ्रष्ट पुलिस को चुना गया.सबसे भ्रष्ट थाना प्रभारी ने हवलदारों और अन्य पुलिसवालों को बुलाकर समझाया---"हमे पुलिस विभाग मे शिष्टाचार और भ्रष्टाचार दोनो चाहिये. यदि ठीक से नौकरी करना है तो कहीं से भी दस लाख रुपये का प्रबंध करो. इतना मालदार पोस्ट मुफ़्त में नहीं मिलता.....हमें अच्छी कुर्सी पाने की कसौटी पर खरा उतरना है."

Thursday, August 5, 2010

प्रतिशोध

"काट डाल उसको.....सब्जी के माफ़िक काट डाल"---अन्ना भाई से फ़ोन पर बात कर रहा था----"साला हमारे धंधे में टाग अङाता है....क्या बोलता था हमारे अड्डे में आग लगायेगा...अच्छा...ऐसा कर उसके घर में आग लगा उसपे बरतन पिन्हा और उसमें तेल को उबाल.....साला हरामी कहींके.......बोल्ता है हिंसा नहीं होने देगा....अब उसकी धुलाइ कर और तेल में टुकङे-टुकङे कर के डाल दे..........उछलेगा....उछलेगा जानता हूं......मसाला डालकर उसे ढक दे.....अब देख जितना उछलेगा आग और तेल में उतना ही पकेगा.....साला खूब उछलता था......और सुन बाहर के लोग कुछ बोले तो नमक-मिर्च लगाकर उसको भी डाल दे उसी में......साला डिश बन जायेगा....."तभी बीच में कुक ने टोका....."साहेब खाना बन चुका है लगा दूं ?" अन्ना ने सिर हिला दिया.----"आज तो लाजवाब डिश बनाया है रे....कहां से सीखा...?
कुक ने कहा---"आज तो साहेब आपके कहे मुताबिक ही बनाया है.मैं रसोई से आपकी बात सुन रहा था.मेरे बेटे के बारे मे बात हो रही थी इसलिये मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था...बस हाथ आपकी जुबान के आर्डर पर काम कर रहे थे डिश तैयार हो गया. आज मेरे घर में भी ऐसा ही डिश बना होगा". अन्ना बङे चाव से खाना खाने लगा फ़िर अचानक वह पत्थर सा हो गया जब देखा कि उसका पांच साल का बेटा घर से गायब था.

नैतिक शिक्षा--प्रतिशोध का परिणाम बहुत बुरा होता है, इससे किसी की भलाई नहीं होती.विपरीत परिस्थितियों के लिये समय को दोषी मानकर शोध करना चाहिये प्रतिशोध नहीं.प्रतिशोध का डिश बार बार नहीं पका सकते....पर प्रक्रिया निरन्तर रहती है.

Monday, August 2, 2010

बाढ की आशा

"हल्लो...नमस्ते बाबूजी."
"हां बेटा, कईसे हो?"
"बहुत बढियां बाबूजी."
"नोकरिया मिली ?"
"नहीं बाबूजी, पर चिन्ता के कोनो बात नाहीं. इस बार हम पूरा तैयारी में है.अतना पैसा कमायेंगे कि कोनो जरुरते नहीं रहेगी."
"वाह,...कैसे बेटा?"
"अरे बाबूजी बिहार में बाढ आनेवाली है न.इस बार बाढ एक सप्ताह लेट आ रहा है लेकिन पिछले साल जैसा ही होगा."
"बाढ आनेवाली है..?"
"लो उ तो हर साल आता है. दस कोठलीवाला जो मकान बनाये थे उसमे पहले से क्रेक डलवा दिया है. टी भी वाले को भी बता के रखा हूं.मंत्रीजी को पहले से तैयार कर दिया है. इस बार गरीब लोगों के लिये बहुत पईसा मिलेगा."
"तो उ पैसा तुमको कैसे मिलेगा"
"बाबूजी सरकार गरीबॊं के लिये पैसा देती है लेकिन गरीब सब तो दहा जाता है आ उनका झोपङिया तो पानी मे इधर से उधर हो जाता है. उसका कोनो प्रुफ़े नहीं बचता है. अंत में हमलोग अपने घर के मरम्मत के लिये पईसा रख लेते हैं. ."
"ठीक है लेकिन गरीब लोगन के लिये घर बनवा देना."
"बाबूजी गरीब के घर बनवाइयो देन्गे तभियो अगला साल त दहाइये जायेगा. भगवान एतना अन्याय थोङे ही करेगा कि अगिला साल बाढ नहीं आयेगा."

Tuesday, July 6, 2010

कोठा (भाग-तीन)----जिस्म और जमीर

आज एक वर्दीवाला पुलिस शराब पीकर कोठे पर पहुंचा. जाते ही नोटों कि गड्डी पुतलीबाई के हाथों में पकङा दिया.कहने लगा--"मुझे सबसे खूबसूरत जिस्म चाहिये". "जानती हूं कीमत को देखते ही समझ गयी थी.अच्छा पीस नहीं दिया तो जेल के अन्दर भी डाल सकते हो.पुलिस वाले हो ना..."----कहते हुए पुतलीबाई हंसने लगी. कुछ देर के बाद वह किसी कमरे से बाहर निकला और पुतलीबाई के पास आकर बोला--"बहुत सही सौदा करती हो तुम".
पुतलीबाई कहने लगी---"साहब हमारा सौदा इसलिये सही होता है क्योंकि हम सिर्फ़ अपना जिस्म बेचते हैं ईमान नहीं".वह कुछ सोचने लगी फ़िर बोली---".....और आप जिस्म के लिये अपना जमीर बेच देते है. हमारा जिस्म घायल होता है और आपके जमीर के टुकङे होते हैं. हम वजन के दर से जिस्म का सही कीमत वसुलते हैं पर आप जमीर की कीमत जानते ही नहीं.क्योंकि आपको जमीर का वजन ही नहीं पता. इसलिये चंद रुपयों में ही बेच दिया करते हैं.
.................फ़िर अंत में हमारा जिस्म मर जाता है और आपका भी.पर आपके पास तब कुछ नहीं बचता, आपका जमीर तो पहले ही मर चुका था.........".वह पुलिसवाला बहुत पहले वहां से जा चुका था.पुतलीबाई स्वयं से बात कर रही थी.

Friday, July 2, 2010

कोठा (भाग-दो)----सावित्री की ईज्जत

सहेली के साथ खेलते-खेलते शाम हो चला था. दस साल की सावित्री जैसे ही घर पहुंची उसकी मां ने उसे बाल पकङकर खींचा और जोरदार थप्पर लगाया---"कितनी बार समझाया है कि शाम ढलने से पहले घर आ जाया कर. दिन की रोशनी में मर्द बने लोग शाम के अंधेरे मे भेङिये बन जाते हैं जो सिर्फ़ जिस्म नोंचना जानते हैं और किसी की इज्जत का वो हाल करते हैं किबेचने के लिये भी इज्जत नहीं बचता और खुद के जीने के लिये भी.". सावित्री अपने बचपन की यादों में खो गयी थी. तभी पुतलीबाई ने उसे बाल पकङकर खींचा और जोरदार थप्पर मारते हुए कहा---"कितनी देर से चिल्ला रही हूं...जल्दी से कमरा नम्बर तीन में जा और गाहक को निपटा. उनको अपने शादी की सालगिरह पार्टी में जाना है".

सावित्री के जिस्म को सिर्फ़ चोट लगा था. थप्पर तो ईज्जत ने खायी थी ,वह भी मां के हाथ से , कभी बचने के लिये तो कभी बिकने के लिये.

क्रमशः

(मित्रों मुख्य शीर्षक "कोठा" के अन्तर्गत एक लघुकथा शृंखला लिख रहा हूं जिसके एक भाग दुसरे भाग से संबद्ध नहीं है.एक प्रयास है कुछ अनछुए पहलुओं को बाहर लाने का, वेश्या-वृति को हतोत्साहित करने का और पुरुषों के मानसिक विकृतियों को सही पुरुषार्थ की ओर दिशा देने का...........कृपया अपने टिप्पणियों के जरिये उचित सलाह देते रहें)

Thursday, July 1, 2010

कोठा (भाग-एक)----काश तुम हिजङे होते.

आज बाप और बेटा दोनो एक साथ कोठे पर आया. पुतलीबाई से लङकी देने को कहा. किसी एक के साथ बेटा एक कमरे में चला गया. पुतलीबाई ने उसके बाप से कहा--" बेटा को तो सही जगह पे पहुंचा ही दिया. अब तुम यहां क्या कर रहे हो...?...जाओ अपने घर ". बाप खिसियाकर बोला-" मैं तुम्हें हिजङा नजर आता हूं क्या? ". पुतलीबाई का गुस्से से खून खौल उठा---"अरे जा जा हिजङों की बराबङी करता है. तुम मर्दों ने भगवान के दिये हुए हथियार को भांजने के सिवा किया ही क्या है, हिजङों से अलग. इतने महान तो हिजङे ही होते हैं जो यह जानते हैं कि हम भी किसी के मां, बहन और बेटी होते हैं. काश... तुम हिजङे होते तो किसी भी सूरत मे अपने बेटे के साथ कोठे पर नही आते".

क्रमशः.........

(मित्रों मुख्य शीर्षक "कोठा" के अन्तर्गत एक लघुकथा शृंखला लिख रहा हूं जिसके एक भाग दुसरे भाग से संबद्ध नहीं है.एक प्रयास है कुछ अनछुए पहलुओं को बाहर लाने का, वेश्या-वृति को हतोत्साहित करने का और पुरुषों के मानसिक विकृतियों को सही पुरुषार्थ की ओर दिशा देने का...........कृपया अपने टिप्पणियों के जरिये उचित सलाह देते रहें)

Tuesday, June 29, 2010

बेवकूफ़

बङा भाई समझदार, समृद्ध और शक्तिशाली था. वह काफ़ी पढा लिखा और बङे पद पर कार्यरत था. छोटा भाई बेरोजगार, गरीब और मूर्ख था. लोग उसका मजाक उङाया करते थे. अक्सर चौराहे पर लोगों के सामने उसकी बेवकूफ़ी पर हंसा जाता था. उसे यदि पांच रुपये और दो रुपये के सिक्कों में से एक को चुनने कहा जाता तो वह दो रुपये का सिक्का चुनता था. लोग हंसते थे और दो रुपये का सिक्का दे देते थे.
आज साझा आम के पेंङ से आम तोङा गया. चालाकी से बङे भाई ने पचास जोङी आम का एक हिस्सा और बीस जोङी का दूसरा हिस्सा बनाया. फ़िर उदारता दिखाते हुए छोटे भाई को अपना हिस्सा चुनने का हक दिया गया. छोटे भाई ने बीस जोङी आम का हिस्सा चुना और टोकरी मे भर लिया. घर आने पर बेटी ने पूछा--"बापू, जब तुम जानते हो कि पचास बीस से ज्यादा होता है तो फ़िर ऐसी बेवकूफ़ी क्यों..?".बाप ने टूटे मन से जबाव दिया--"बेटी सिर्फ़ अमीर लोग ही समझदार होते हैं. यदि मैं पचास जोङी आमवाला हिस्सा चुनता तो मुझे बीस जोङी आम भी नहीं मिलता. गरीबों को यदि अपने अधिकार का एक टुकङा भी चाहिये तो उसे बेवकूफ़ बनकर ही जीना पङता है."

Monday, June 28, 2010

चीनी की बीमारी --लघुकथा

हृदयगति अचानक तेज हो जाने से परेशान रोगी डाक्टर के पास पहुंचा.उसे तत्काल दवा दी गयी. वह ठीक हो गया.वह ठीक हो जाने के बाद कहने लगा--" डाक्टर साहब, आज से काफ़ी पहले मुझे किसी डाक्टर ने कम चीनी खाने को कहा था. आजकल मैं काफ़ी कम चीनी खाता हूं फ़िर भी......"कहकर चुप हो गया. डाक्टर ने समझाया--"आप चीनी खाना बिल्कुल ही बंद कर दीजिये नहीं तो रक्तचाप बढ सकता है,हृदयगति रुक सकती है,हृदयाघात भी हो सकता है और भी कई तरह की बीमारियां हो सकती है--" इस पर रोगी ने कहा---"लेकिन डाक्टर साहब, यदि दवा लेता रहूं तो थोङा सा चीनी तो खा सकता हूं ना?". डाक्टर ने कहा--"नहीं...बिल्कुल नहीं, मैं बीमारी का इलाज करता हूं, मंहगाई का नही.मंहगाई से पुरा देश परेशान है लेकिन यह भी लाइलाज है.मैं आपकी सहायता नहीं कर सकता.यदि डायलासिस पे जीना चाहते हैं तो डाक्टर मनमोहन सिंहजी से इलाज करवाइये.

Tuesday, June 15, 2010

गुलामी.

वह गुलाम है लेकिन उसकी मानसिकता नहीं. क्या हो गया जो उसने दो वक्त की रोटी के लिये ठाकुर से कुछ रुपये उधार ले लिये, इसके बदले में ठाकुर ने भी तो उसकी जमीन गिरवी रख ली थी.दो दिनों से उसका बेटा बीमार था कैसे जाता वह ठाकुर की खातिरदारी करने..?.उसने कोई गुनाह नहीं कर दिया था. जब ठाकुर ने बुलावा भेजा तो शेर की तरह चल दिया मिलने.मगर ठाकुर की नजर में वह अपराधी था. जो पेट की आग बुझाता है उसे .......पर लात मारने का हक भी है.उसके आते ही ठाकुर ने उसे खंभे से बांधकर खूब पीटा.वह लाचार था, मार भी खाया और अपमान का घूंट भी पीया.

पचास साल बाद

आज उसके पोते सेवाराम को उसी ठाकुर का पोता छोटे ठाकुर ने घर बुलाया. सेवाराम पहली बार ठाकुर की हवेली जा रहा है.पता नहीं उससे क्या भूल हुई है. वह डरा हुआ है , नहीं गया तो बहुत बङा अपराध हो जायेगा. चेहरा लाल है, पसीना छुट रहा है.वह सहमा हुआ दरवाजे तक जाता है.छोटे ठाकुर अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए है .दरवाजे के अन्दर जाने की उसे हिम्मत नहीं हुई. वह तनिक रुका फ़िर दूसरी तरफ़ मुङा और धीमें कदमों से चहलकदमी करते हुए उसी खंभे के पास खङा हो गया जहां कभी उसके दादा को बांधकर पीटा गया था.

Monday, June 14, 2010

आज का गांधी

चौबीस-पच्चीस साल का एक युवक चौराहे पर भाषण दे रहा था-"दोस्तों , भ्रष्टाचार देश की सबसे बङी समस्या है. आज इसके चलते लोगों को नौकरी नहीं मिलती, लाचारों को न्याय नहीं मिलता, गरीबों को रोटी नहीं मिलती, सरकार के खर्च होनेवाले एक रुपया में से दस पैसा भी जरुरतमंदों तक नहीं पहुंचता............सत्त के दलालों ने भ्रष्टाचार को देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया है. हमें ऐसे लोगों को चौराहे पर बांधकर गोली........" तभी मंत्री महोदय के कारों का काफ़िला चौराहे से गुजर रहा था . मंत्री महोदय ने अपने एक सलाहकार से कहा----"यह युवक काफ़ी क्रांतिकारी दिखता है, बहुत ही जोरदार भाषण दे रहा है........लेकिन इसके विचारों से हिंसा की बू आ रही है. इससे जाकर मिलो. मेरी ओर से शुभकामनायें देना और गांधी के बताये रास्ते पर चलने को कहना". मंत्री महोदय के कारों का काफ़िला आगे बढ गया और सलाहकार वहीं उतरकर सीधे उस युवक के पास गया. उसने उस युवक से कहा--"मंत्रीजी ने आपको शुभकामनायें भेजा है और गांधी के बताये रास्ते पर चलने का आग्रह किया है." ऐसा कहते समय ही उसने अपनी जेब से अर्धपारदर्शी
लिफ़ाफ़ा निकालकर उस युवक के शर्ट की जेब में रख दिया. वह युवक फ़िर से भाषण देने लगा--"दोस्तों बेशक भ्रष्टाचार देश की समस्या है, लेकिन सभी समस्याओं का मूल तो नक्सलवाद और आतंकवाद है......और इन समस्याओं का निदान भी देश के भाग्य-विधाता गांधी के सत्य और अहिंसा के जरिये ही करने में सफ़ल हो रहे है.गांधी आज भी हमारे हृदयों में जिंदा हैं और देश के कोने-कोने में उन्हें सम्मान प्राप्त है."युवक के शर्ट की जेब से अर्ध पारदर्शी लिफ़ाफ़े के भीतर से हरे कागजों पर गांधी की धुंधली तस्वीर स्पश्ट दिख रही थी.

Wednesday, June 2, 2010

मैं भी भूखा हूं.

संस्था में चार लोग काम कर रहे थे. कल मुझे एक हजार रुपये प्रति श्रमिक कुल चार हजार रुपये वेतन देना था.हाथ पर रुपये सिर्फ़ दो हजार ही थे.मैंने चारो श्रमिक के पिछले माह के कार्य का अवलोकन किया.दो श्रमिक लगातार कार्यालय में उपस्थित हुए थे. एक श्रमिक के दाहिने हाथ की हड्डी टूट जाने के कारण उपस्थित होकर भी कार्य करने में असमर्थ रहा था.बांकी एक श्रमिक जो वृद्ध भी हैं महिने में पंद्रह-बीस दिन अस्वस्थ रहे थे. मैंने कर्तव्यनिष्ठा को ध्यान में रखकर उन दो श्रमिकों को वेतन दे दिया जो लगातार कार्यालय में उपस्थित हुए थे. बांकी दो लोगों को मैंने ये बता दिया कि वेतन सिर्फ़ काम करनेवालों को दिया जाता है.

रात में फ़ोन की घंटी बजी........"बेटे, तुम्हारे चाचा बीमार हैं. खाने के लिये अनाज भी नहीं है, दवा भी खरीदना है. यदि वेतन नहीं मिला तो आगे तुम्हें चाचा से कोई शिकायत नहीं होगी.....क्योंकि अब वे हालात से लङकर ज्यादा दिन नहीं जी पायेंगे.........".मेरे पास कोई शब्द नहीं था......"कुछ भी करो, हमारा पेट तो तुम्हीं चलाते हो........"मैं फ़िर निःशब्द था. उन्हें कैसे बताता कि मैं चाचा का दर्द जानता हूं क्योंकि मैं भी भूखा हूं.

Tuesday, May 18, 2010

बच्चों का कठपुतली-खेल

गर्मी की छुट्टी शुरु हो गयी थी.स्कुल के बच्चे जो होस्टल में रहते थे, खाली समय में कुछ करना चाहते थे.सबने मिलकर सोचा कि कठपुतली खेल खेला जाये ..बच्चों ने प्रांगण को घेर कर एक रंगमंच बनाया और दर्शकों के लिये दर्शक-दीर्घा बनाया गया. फ़िर सभी ने लकङियों के कई पुतले बनाये. प्रधान-मंत्री सहित सभी दिग्गज हस्तियों के पुतले हु-ब-हु बना लिये बच्चों ने.रंगमच पर ही सभा बनाया गया.बच्चे पुरी उत्साह से कार्य कर रहे थे ताकि उनका कार्यक्रम सफ़ल हो.सभा में पुतले बिठा दिये गये.सभी पुतलों में छेद कर काले रंग केअलग-अलग पतले धागे से बांधा गया जिसे नेपथ्य के एक कमानी से जोङ दिया गया.अब एक संचालक की जरुरत थी जो धागा भी हिलाता और सबके संवाद भी बोलता.....यानी कमान संभालता.

संचालक के नियुक्ति संबंधी सलाह के लिये सभी छात्र होस्टल अधिक्षक के पास गये.अधीक्षक महोदय ने कहा-"किसी सशक्त विदेशी महिला को इस कठपुतली-नांच का संचालक बनाओ,देखना तुम्हारे कार्यक्रम को देश की सवा सौ करोङ जनता देखेगी.".

Sunday, May 9, 2010

जख्म

"लो पहले इससे अपना बदन ढक लो" कहते हुए ठाकुर ने उसके फ़टे हुए कपङे से निकल आये अंगों पर एक तौलिया डाल दिया.फ़िर उसके एक गाल पर अपना हाथ रखकर अपनी ऊंगलियों से उसके आंसू पोछते हुए कहा-"जानवर था वह जो इतनी प्यारी कोमल बच्ची के साथ बलात्कार किया, छी......,लेकिन ठाकुर की हवेली में तुम सुरक्षित हो." वह सोच रही थी कि कुछ लोग ठाकुर की तरह अच्छे भी होते हैं.वह ठाकुर के साथ उसकी हवेली में सचमुच सुरक्षित महसुस कर रही थी.तभी ठाकुर के दो-तीन दोस्त आ गये.कुछ देर के बाद ठाकुर के कक्ष से वह निर्वस्त्र होकर कराहते हुए बाहर निकली.बाहर के बगीचे में एक जख्मी बिल्ली के उपर कई सारे गिद्ध झपट्टे मार रहे थे.वह भी अपने स्वर में चिल्ला रही थी.आवाजें अलग-अलग पर जख्म एक सा था और दर्द भी.

Thursday, April 1, 2010

सालगिरह का तोहफ़ा

मालिक के बेटे की सातवीं सालगिरह मनायी जा रही थी।सैकङों लोग मालिक के लिये उनके घर के ही सदस्य थे.घर के सभी लोगों को तोहफ़े बांटे गये.एक उजला टी-शर्ट घर मे रह रहे सभी लोगों को दिया गया....लेकिन वितरण का कार्य चमचागिरि करनेवाले कर्मचारियों को सौंपा गया.चालाकी से कर्मचारियोंने सभी को टी-शर्ट दे दिये लेकिन मालिक के छोटे भाई को छांट दिया गया.ब्युहरचना का उद्देश्य मालिक को अनभिग्य रखना,छोटे भाई को चिढाना औए नींचा दिखाना,अपने आप को मालिक का सबसे भरोसेमंद साबित करना और कुत्तों के लिये फ़ेंके जानेवाले रोटी के टुकङों को पुरी तरह हङप जाना॥सब कुछ था. बात जितनी छोटी थी षङयंत्र उतना ही विशाल.

मालिक का छोटा भई जानता था विभाग की गलती नहीं है.वह कर्मचारियों के लिये प्रार्थना कर रहा था ""फ़ादर,फ़ोरगिव देम ,फ़ोर दे डोंट नो व्हाट दे डू."

Friday, March 5, 2010

वैदेही

वैदेही दिवाल से कान सटाकर सुन रही थी.पिताजी कह रहे थे -" मैं अपना प्रण नहीं तोडुंगा.वैदेही की सादी में दहेज नही दुंगा.आज लडके के पिताजी ने माना कि वैदेही गुणवती है लेकिन फ़िर भी शादी से मना कर दिया". मां रोते हुए बोली-"आज कल विना दहेज के शादी कौन करता है.ऎसे मे तो आपके कारण हमारी बेटी कंवारी ही रह जायेगी".पिताजी का जबाब था-"चाहे जो भी हो ,मेरी बेटी कोई खुंटा नहीं है जिससे खरीदकर लाये गये किसी बैल को बांध दूं".वैदेही मन ही मन मुस्कुरा रही थी.वह निश्चिंत थी.अब या तो वह जिंदगी भर एक महान बाप की बेटी बन कर जीयेगी या एक आदर्श व्यक्ति की पत्नी बनेगी जो वैदेही को चाहेगा दहेज को नहीं.

Thursday, February 25, 2010

खेल

रुद्रप्रताप क्लब स्तर के क्रिकेट वन डे श्रृंखला का मेन ओफ़ दि सिरीज चुना गया.घर पहुंचा तो थाल सजाकर आरती उतारी गयी.कप को टेबुल पर सजाया गया.यादगार बल्ला स्टैंड के सहारे खडी कर दी गयी.तस्वीरें दीवार से चिपका दी गयी.घर के सारे लोग एक साथ बैठकर जश्न मना रहे थे.तभी बडा भाई रविप्रताप अन्य दिनों की तरह चुपचाप घर मे घुसा और अपने निजी कक्ष मे चला गया.अन्दर से दरबाजा बन्द कर दिया और अपनी एक तस्वीर छिपाकर चुपचाप अपनी एक एलबम मे लगा दी.फ़िर जेब से एक पदक निकाला.एशियाड के बेस्ट एथलीट का यह मेडल उसने अपने सीने से सटाकर आंखें बंद कर ली.

Wednesday, February 10, 2010

कैद

पुलिस अधीक्षक का आदेश था.पुलिस और सरकारी तंत्रों को कलम के जरिये भ्रष्ट कहनेवाले आरोपी को हथकडी पहना दी गयी थी.सवाल मानहानि का था.थानेदार यह जानते हुए भी कि आरोपी बेकसूर है कुछ नही कर सकता था.आरोपी को मुजरिमों की कोठरी मे डाल दिया गया.वह एक पतली सी डायरी निकालकर लिखने लगा -"इन चाहर-दिवारी के बीच मेरे शरीर को कैद कर दिया गया है,लेकिन मैं निडर होकर सच चाहे जैसा भी हो,लिखुंगा.मेरे विचार अभी भी आजाद हैं....... और वह थानेदार आजादी की सांस ले रहा है.उसे आत्म-ग्लानि हो रही है. वह डरा हुआ है और गलती करने के लिये बाध्य है.वह आजाद है लेकिन उसके विचारों को कैद कर दिया गया है.पता नही कैदी मैं हूं या वह थानेदार.