Tuesday, June 15, 2010

गुलामी.

वह गुलाम है लेकिन उसकी मानसिकता नहीं. क्या हो गया जो उसने दो वक्त की रोटी के लिये ठाकुर से कुछ रुपये उधार ले लिये, इसके बदले में ठाकुर ने भी तो उसकी जमीन गिरवी रख ली थी.दो दिनों से उसका बेटा बीमार था कैसे जाता वह ठाकुर की खातिरदारी करने..?.उसने कोई गुनाह नहीं कर दिया था. जब ठाकुर ने बुलावा भेजा तो शेर की तरह चल दिया मिलने.मगर ठाकुर की नजर में वह अपराधी था. जो पेट की आग बुझाता है उसे .......पर लात मारने का हक भी है.उसके आते ही ठाकुर ने उसे खंभे से बांधकर खूब पीटा.वह लाचार था, मार भी खाया और अपमान का घूंट भी पीया.

पचास साल बाद

आज उसके पोते सेवाराम को उसी ठाकुर का पोता छोटे ठाकुर ने घर बुलाया. सेवाराम पहली बार ठाकुर की हवेली जा रहा है.पता नहीं उससे क्या भूल हुई है. वह डरा हुआ है , नहीं गया तो बहुत बङा अपराध हो जायेगा. चेहरा लाल है, पसीना छुट रहा है.वह सहमा हुआ दरवाजे तक जाता है.छोटे ठाकुर अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए है .दरवाजे के अन्दर जाने की उसे हिम्मत नहीं हुई. वह तनिक रुका फ़िर दूसरी तरफ़ मुङा और धीमें कदमों से चहलकदमी करते हुए उसी खंभे के पास खङा हो गया जहां कभी उसके दादा को बांधकर पीटा गया था.

11 comments:

रश्मि प्रभा... said...

gulaami kee tasweer achhi khinchi hai

पी.सी.गोदियाल said...

मानसिकता को ब्यान करती लघु कथा ! आज भी ज्यादातर भारतीयों कि इस तरह की नहीं तो उस तरह की मगर है तो ऐसी ही मनोदशा !

'उदय' said...

... पुरानी पीडा ... वर्तमान में भी देखने कहीं कहीं मिल जाती है यह पीडा !!!

संजय भास्कर said...

मार भी खाया और अपमान का घूंट भी पीया.
मानसिकता को ब्यान करती लघु कथा...

दिलीप said...

waah aajkal dhoondh dhoondh kar teer chhod rahe hain sirji....bahut hi maarmik laghukatha...

माधव said...

the old style still continue

दिगम्बर नासवा said...

गुलाम मानसिकता ... शायद बरसों की कहानी है और बरसों तक चलेगी ...

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर लघुकथा है!

आचार्य जी said...

प्रभावशाली लेखन।

( आइये पढें ..... अमृत वाणी। )

आचार्य जी said...

आईये जानें ..... मैं कौन हूं !

आचार्य जी

अरुणेश मिश्र said...

अच्छी लघुकथा । परतंत्र मानसिकता का संकेत ।