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Monday, July 19, 2010

क्रांतिदूत की कलम से......मेरा वोट वापस करो.

जाति के आधार पर जन-गणना की सोच जिस महान आधुनिक नेता के दिमाग की उपज है उनकी कुटिल सोच को मैं नमस्कार करता हूं. यह जरूर ही किसी तिक्ष्ण बुद्धि और मंद विवेक की उपज है. उनसे पुछा जाना चाहिये कि जाति के आधार पर आंकङे लेकर क्या किया जायेगा ? किस तरह का आचार बनाने की योजना है ? किस जाति के आरक्षित पदों को काटकर किस जाति के आरक्षण की सीमा बढाई जायेगी ?अब किस जाति की बहू-बेटियों को नीलाम किया जायेगा ? अब किस जाति को पांव से कुचला जायेगा ? और किस जाति को सत्ता की कुर्सी सौंपी जायेगी ? ढेर सारे सवाल.....लेकिन उन्हें इन सवालों से क्या मतलब. वे तो जल्दी से जल्दी आंकङे पाना चाहते हैं ताकि समय निकालकर संतुलित भाषण तैयार किया जा सके जिसमे लगे कि सभी जातियों को लाभ होगा,लेकिन फ़ायदा दिल्ली में बैठे नेता लोग आपस में बांट लें. दुख तो तब होता है जब विपक्ष भी हां में हां मिला देता है.शायद सभी यह सोच रहे हों कि विकास की राजनीति का जबाव जाति की राजनीति ही हो सकता है.

सत्ता की कुर्सी और विपक्ष के सोफ़े पर कुन्डली मारकर बैठ चुके लोगों से मैं सादर कहना चाहता हूं कि यदि उन्हें बैठना ही था तो चुनाव में खङे क्यों हुए थे..??कहां गया वो इच्छा-शक्ति..?हमारा वह विश्वास और सम्मान जो हम वोट के जरिये देते रहे हैं. क्या इसीलिये हमने वोट दिया था ? घोटाला करने के लिये ? आतंकी और नक्सली के सामने दुम हिलाने के लिये ? कुर्सी के लिये हम सबको आपस में लङाने के लिये ? भगदङ कराने के लिये और भारत बंद करने कि लिये ?........जानता हूं प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलेगा....इन प्रश्नों का उत्तर सरकारी गोली के शिकार हुए निर्दोष लोगों को छातियां देती है, भूख से तङपते पेट की आग देती है, बलात्कार की शिकार हुई औरतों की आंखे देती है, न्यायालय के चक्कर काटनेवालों के फुले हुए पांव देते है और मजहबी एवं जातिगत हिंसा के भय से फ़ङफ़ङाते होठ देते हैं.

हमें अपने प्रश्नों का उत्तर मिल रहा है. मैं अपना वोट वापस चाहता हूं.........

हमने वोट दिया था
संस्कृति और सम्मन की रक्षा के लिये
राष्ट्र और संविधान की सुरक्षा के लिये
देश चलाने के लिये
विपक्ष की भूमिका निभाने के लिये
रोटी उपलब्ध कराने के लिये
इज्जत बचाने के लिए.

विश्वास था
नहीं लूटोगे खजाने से एक कौङी भी
नहीं बढने दोगे सामानों की बेलगाम कीमत
नहीं खाओगे हमारा रोजगार
नहीं चढने दोगे देशद्रोहियों को सिर पर.

हमारा वोट विश्वास था
आशा थी.......
सभावना थी.....
प्यार था.....
सम्मान था.....
हमारा वोट वापस करो. क्रमशः...........

Friday, July 9, 2010

क्रांतिदूत की कलम से......जातिगत दिवारों का पक्कीकरण

मित्रों, क्रांतिदूत की कलम चलती ही रहेगी. यह कलम अपने शब्दों को लघुकथा, कविता या किसी अन्य वर्गीकरण में नहीं रखना चाहती. वर्गीकरण शब्द का साकारात्मक उद्देश्य सिर्फ़ विवाद की संभावना को निरस्त करना होता. यदि विवाद की संभावना वर्गीकरण के कारण बढ जाये तो वर्गीकरण को नाकारात्मक मानकर वर्गों को समाप्त कर देना चाहिये. इसी नजरिये से जब समाज की ओर देखें तो जातिवाद की ओर ध्यान जाता है. एक ही धार्मिक मान्यताओं के बीच लोगों को कितनी जातियों में बांट दिया गया. बांटते समय वर्गीकरण का उद्देश्य साकारात्मक था यह सभी जानते हैं. यह भी सभी लोग मानते हैं कि जातिवाद आज हजारों विवादों को जन्म दे रही है. सभी चाहते हैं कि काश, जातिवाद नहीं होता.......सिर्फ़ यह चाहना भी पर्याप्त है...क्योंकि इसके बाद का जो रास्ता है उसे विजय की संभावना कहते हैं और फ़िर अंत मे जो जाति-विहीन समाज का लक्ष्य है वह विजय है..

निश्चय ही जाति-विहीन समाज का निर्माण बहुत ही सुखमय होगा और उससे भी अधिक सुखमय होगा वहां तक पहुंचने का रास्ता. फ़ुलवारी से अधिक रमणीय फ़ुलवारी तक पहुंचने का रास्ता होता है. उत्साह ,जिग्याशा , खुश होने की ईच्छा आदि भावनायें फ़ुलवारी तक पहुंचने के रास्ते को फ़ुलवारी से भी अधिक प्यारा बना देता है. यदि कोई आकाश छुना चाहता है तो छू कर देखे उसे पता चल जायेगा कि आकाश मे होने की खुशी से ज्यादा खुशी जमीन से आसमान की ओर छलांग मारने में मिलता है. जब रास्ता भी सुन्दर और लक्ष्य भी तो हमें जरुर आगे बढना चाहिये. हमारी सोच के जिस हिस्से में जातिवाद जम चुका है उस हिस्से से जातिवाद निकालकर फ़ेंक देना चाहिये. न ही कोई अगङा न ही कोई पिछङा, न ही कोई ब्राह्मण न ही कोई दलित. जाति बने तो किसानों कि, मजदूरों की, डाक्टरों की, ईंजिनियरों की...जो अपनी जाति को समाज के निर्माण हेतु समर्पित कर दे.

इस बार जाति-आधारित जनगणना की जा रही है.पृष्ठभूमि की ओर देखें तो सन उन्नीस सौ एकतीस में जाति-आधारित जनगणना की गयी थी. फ़लतः अंग्रेजी सरकार को कम से कम अतिरिक्त दस वर्ष का जीवनदान मिला था. यदि आज के शासकों में अंग्रेजों की तरह उत्कट कुटिल इच्छा-शक्ति होगी तो उनका शासन अमरत्व प्राप्त कर सकेगा. मुझे यह गंभीर आशंका है कि जातियों के प्रमाणिक और सत्यपूर्ण आंकङे ऐसे विषैले बीजों की तरह होंगे जो पूरे देश को जहरीला कर देगी........सभी जातियों को मिलाकर कई सारी जातियां बनेगी जिसमे से कोई जाति फ़िर से देश पर राज करेगा,कोई जाति आध्यात्म और पाखंड का सहारा लेकर सबको नचायेगा, कोई जाति अपनी मर्जी से व्यवसाय करेगा और किसी जाति को पांव से कुचक दिया जायेगा.

मुझे देश के जन-प्रतिनिधियों से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि यह कलम खामोश नहीं होना चाहती.....लेकिन यह जरुर कहुंगा कि दूर-दृष्टि की कमी अवश्य दिखता है. निकट परे मोतियों को चुनने के लिये दूर परे हीरों की अनदेखी की जा रही है.जाति-आधारित जनगणना से सत्ता तक पहुंचने का रास्ता सुलभ हो सकता है लेकिन सत्ता संभालना नहीं. इस जनगणना के दुष्परिणामों की अनदेखी करना अनुचित और मूर्खतापुर्ण है.जातिवाद के परिणाम नक्सलवाद, जातिय हिंसा, भेद-भाव, छुआछुत , वोट की राजनीति आदि रुपों मे पहले से ही दिख रहा है.अब मिट्टी की कच्ची दीवारों का पक्कीकरण किया जा रहा है जिसकी छतों से कूदकर समाजिकता दम तोङ देगी...

क्रमशः...........

Thursday, July 8, 2010

क्रांतिदूत की कलम से......जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?

यह कलम आग ही उगलती है. अन्य कलमों की तरह इसमें भी स्याही ही डाली गयी है, फ़िर भी पता नहीं क्यों यह आग ही उगलती है. शायद चिंगारी बनना चाहती हो, खुद जलकर भी. एक ऐसी चिंगारी जो घरों में रोशनी पैदा करे, चेहरों पे चमक लाये, कमजोरों को रास्ता दिखा सके और भूखे चुल्हों को थोङी सी गर्मी दे सके. एक ऐसी चिंगारी जो क्रांति की आग का केन्द्रक बन जाये. एक ऐसी चिंगारी जो देश-भक्ति की आग को जन्म दे. एक ऐसी चिंगारी जिसकी लपटों से सारी बुराईयां जलकर खाक हो जाये.........पर कमवख्त नहीं जानती कि ऐसी कलमें जो चिंगारी पैदा करती है उन्हें जमीन के नींचे दबाकर उसके वजूद को ही खत्म कर दिया जाता है ताकि वह फ़िर किसी आग के लिये चिंगारी न बन पाये. इसलिये इसका भी हश्र वही होगा पर यह भी सच है कि यह जितना सोना होगा उतना ही खङा उतरेगा. कितनी अजीब बात है कि कोई कितना भी सोना हो जाये मरने के बाद तो जलना ही होता है..आग के बीचों-बीच आग बनकर. यदि जीते-जी कोई अपने भीतर थोङी सी आग ले ले तो पता नहीं कितनी रोशनी पैदा हो जायेगी. मरते वक्त इंसान की मजबूरी, नंगी जमीन पर लेट जाने की बाध्यता, अपाहिज की तरह चार कंधों पर उठकर जाने की लाचारी और जलकर खाक हो जाने जैसा अंत होना ही है तो फ़िर जीते-जी डर कैसा, मजबूरी और लाचारी कैसी...?

जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?
क्यों डर से सहमी हैं आंखें.
पिंजरों मे क्यों कैद हैं पांखें.
बेचा दिल और गुर्दा क्यों?
जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?

ऐसी भी क्या थी मजबूरी
कि इतनी बङी जिंदगी हारी.
ऐसे क्यों लाचार हुए
इतने कंधों पर बैठ गये.
जब भीख मांगकर ही खाना था
फ़िर पायी इतनी उर्जा क्यों?
जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?


बन सकते हो किसी का सहारा
मां का प्यारा राज दुलारा
झुकाकर ही सर जब जीना था
तो खाया दूध का कर्जा क्यों?
जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ? क्रमशः...........

Tuesday, March 2, 2010

औरत......तुम फ़िर से दासी बनोगी.

दिनांक 8 मार्च को महिल दिवस के रुप में मनायी जाती है.महिला सशक्तिकरण,उपलब्धियां,महिलाओं की स्थिति आदि विषयों पर ढेर सारी चर्चायें की जाती है.निश्चय ही महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है. भ्रुण-हत्यायें,बच्चियों का स्कुल न जाना,छेडखानी,प्रताडना, दहेज आदि मामले पहले से काफ़ी कम हुए हैं.दुसरी तरफ़ उपलब्धियों में भी सम्मनजनक वृद्धि दर्ज की गयी है.

....लेकिन मैं मानता हूं कि महिलाऒं से संबद्ध मामलों में बुद्धिजीवियों की राय सदैव ही अव्यवहारिक रही है.यह कटु सत्य है कि नारी शक्ति-स्वरुपा होती है.उसे "अबला" समझना मुर्खता है और "अबला" कहना उसे अपमानित करना और पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित करने हतु एक कुटिल चाल है. पुरुष और नारी एक दुसरे के सम्पुरक हैं.दोनो बरबरी के लिये संघर्ष करें तो यह उचित भी है और कल्याणकारी भी.

निस्सन्देह औरतों की बौद्धिक क्षमता पुरुषों से अधिक होती है.उनका हृदय भी विशाल होता है.स्नेह कृतग्यता,त्याग,क्षमाशीलता आदि सद्भावों में स्त्रियों के मुकाबले पुरुष कहीं नहीं ठहरते.वह जननी है ,उसे चुनौती देना असंभव है.ऐसे में औरतों को अबला कहकर अधिक कानुनी अधिकार प्रदान किये गये.शिक्षादि सुविधायें अधिक दी गयी.कुछ आरक्षण दिये जा चुके हैं कुछ दिया जानेवाला है.......अर्थात और ही सशक्तिकरण.

सिर्फ़ अधिक कानुनी अधिकार प्राप्त कर महिलाओं ने शक्ति का कम, उदंडता का अधिक परिचय दिया है.लगभग 95 % झूठे दहेज और प्रताडना की शिकायतें दर्ज की गयी.आज समझदार पुरुष सिर उठाकर भी महिलाऒं से बात नही कर सकते ,क्योंकि बेवजह भी औरत चाहे तो पुरुषों को जेल की हवा खिला सकती है.भ्रुण हत्याओं और दहेज की मांग मे मुलतः महिलायें जिम्मेबार हैं लेकिन उंगलियां मर्दों पर उठायी जाती है.वेश्यावृति को बढावा महिलायें दे रही हैं और सवाल ग्राहकों (पुरुषों) की मानसिकता पर उठायी जाती है.

हां, पुलिस और न्यायालय के लोग (वकील और जज भी) कानुनी रुप से बाध्य होकर महिलाओं को प्रोत्साहन अवश्य देते है लेकिन शिकार भी अधिकतर यही लोग करते हैं..............सच यह है कि आज पुरुष प्रताडित हो रहा है महिलाओं के द्वारा. महिलायें स्वतः ही आगे बढ रही हैं. उपर से आरक्षण भी दिया जा रहा है. कुछ राज्यों नें पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण का जो लाभ दिया उसका दुखद परिणाम सामने आ रहा है.

कुछ सालों मे सभी क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व कायम होगा.पुरुषों के किसी भी बात से यदि उन्हें दुख पहुंचा तो फ़िर छेडखानी, प्रताडना, दहेज और बलात्कार जैसे झुठे मुकदमें तैयार किये जायेंगे.पुरुषों का वर्चस्व समाप्त होगा और महिलाओं के अधिपत्य की शुरुआत होगी.ठीक वैसे ही सभी अधिकार दे दिये जायेंगे जैसे कि ॠग्वेदिक काल मे औरतों को प्राप्त था.

..................और अंत में बाध्य होकर यही पुरुष समाज औरतों से सारे अधिकार छिन लेगा और उसे फ़िर से दासी बना देगा.इसलियें औरतें.....सावधान......तुम्हें शक्ति प्रदान करने के लिये जो उपकरण दिये जा रहे हैं उसे हथियार बनाकर समाज पर मत घुमाओ.,अन्यथा.............तुम फ़िर से दासी बनोगी.