Tuesday, March 2, 2010

औरत......तुम फ़िर से दासी बनोगी.

दिनांक 8 मार्च को महिल दिवस के रुप में मनायी जाती है.महिला सशक्तिकरण,उपलब्धियां,महिलाओं की स्थिति आदि विषयों पर ढेर सारी चर्चायें की जाती है.निश्चय ही महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है. भ्रुण-हत्यायें,बच्चियों का स्कुल न जाना,छेडखानी,प्रताडना, दहेज आदि मामले पहले से काफ़ी कम हुए हैं.दुसरी तरफ़ उपलब्धियों में भी सम्मनजनक वृद्धि दर्ज की गयी है.

....लेकिन मैं मानता हूं कि महिलाऒं से संबद्ध मामलों में बुद्धिजीवियों की राय सदैव ही अव्यवहारिक रही है.यह कटु सत्य है कि नारी शक्ति-स्वरुपा होती है.उसे "अबला" समझना मुर्खता है और "अबला" कहना उसे अपमानित करना और पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित करने हतु एक कुटिल चाल है. पुरुष और नारी एक दुसरे के सम्पुरक हैं.दोनो बरबरी के लिये संघर्ष करें तो यह उचित भी है और कल्याणकारी भी.

निस्सन्देह औरतों की बौद्धिक क्षमता पुरुषों से अधिक होती है.उनका हृदय भी विशाल होता है.स्नेह कृतग्यता,त्याग,क्षमाशीलता आदि सद्भावों में स्त्रियों के मुकाबले पुरुष कहीं नहीं ठहरते.वह जननी है ,उसे चुनौती देना असंभव है.ऐसे में औरतों को अबला कहकर अधिक कानुनी अधिकार प्रदान किये गये.शिक्षादि सुविधायें अधिक दी गयी.कुछ आरक्षण दिये जा चुके हैं कुछ दिया जानेवाला है.......अर्थात और ही सशक्तिकरण.

सिर्फ़ अधिक कानुनी अधिकार प्राप्त कर महिलाओं ने शक्ति का कम, उदंडता का अधिक परिचय दिया है.लगभग 95 % झूठे दहेज और प्रताडना की शिकायतें दर्ज की गयी.आज समझदार पुरुष सिर उठाकर भी महिलाऒं से बात नही कर सकते ,क्योंकि बेवजह भी औरत चाहे तो पुरुषों को जेल की हवा खिला सकती है.भ्रुण हत्याओं और दहेज की मांग मे मुलतः महिलायें जिम्मेबार हैं लेकिन उंगलियां मर्दों पर उठायी जाती है.वेश्यावृति को बढावा महिलायें दे रही हैं और सवाल ग्राहकों (पुरुषों) की मानसिकता पर उठायी जाती है.

हां, पुलिस और न्यायालय के लोग (वकील और जज भी) कानुनी रुप से बाध्य होकर महिलाओं को प्रोत्साहन अवश्य देते है लेकिन शिकार भी अधिकतर यही लोग करते हैं..............सच यह है कि आज पुरुष प्रताडित हो रहा है महिलाओं के द्वारा. महिलायें स्वतः ही आगे बढ रही हैं. उपर से आरक्षण भी दिया जा रहा है. कुछ राज्यों नें पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण का जो लाभ दिया उसका दुखद परिणाम सामने आ रहा है.

कुछ सालों मे सभी क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व कायम होगा.पुरुषों के किसी भी बात से यदि उन्हें दुख पहुंचा तो फ़िर छेडखानी, प्रताडना, दहेज और बलात्कार जैसे झुठे मुकदमें तैयार किये जायेंगे.पुरुषों का वर्चस्व समाप्त होगा और महिलाओं के अधिपत्य की शुरुआत होगी.ठीक वैसे ही सभी अधिकार दे दिये जायेंगे जैसे कि ॠग्वेदिक काल मे औरतों को प्राप्त था.

..................और अंत में बाध्य होकर यही पुरुष समाज औरतों से सारे अधिकार छिन लेगा और उसे फ़िर से दासी बना देगा.इसलियें औरतें.....सावधान......तुम्हें शक्ति प्रदान करने के लिये जो उपकरण दिये जा रहे हैं उसे हथियार बनाकर समाज पर मत घुमाओ.,अन्यथा.............तुम फ़िर से दासी बनोगी.

12 comments:

Mithilesh dubey said...

बहतरिन लिखा है आपने , आपके हर बांतो से सहमत हूँ , ईस जानदार पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार्य करें ।

श्याम कोरी 'उदय' said...

...कटु सत्य है कि नारी शक्ति-स्वरुपा होती है.उसे "अबला" समझना मुर्खता है और "अबला" कहना उसे अपमानित करना और पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित करने हतु एक कुटिल चाल है. पुरुष और नारी एक दुसरे के सम्पुरक हैं...
....प्रभावशाली पंक्तियां,बधाई!!!

ललित शर्मा said...

पुरुष और नारी एक दुसरे के सम्पुरक हैं।
यह ध्रुव सत्य है,
अच्छी पोस्ट के लिए-आभार

डॉ महेश सिन्हा said...

तेल देखो और तेल की धार देखो
दुनिया गोल है
जहाँ से शुरू हुई कथा वहीं ख़त्म होगी
हरी कथा, कथा अनंता

शोभा said...

वाह बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

निर्मला कपिला said...

बहुत हद तक सहमत हूँ मगर अकेली औरत को दोश देना सही नही । वो चेहरे क्यों पीछे हैं जो उन्हें आगे रख कर उनके कन्धे से बन्दूक चलाते हैं औरत की प्रक्र्तिक भावनात्मक कम्जोरी का पुरुष समाज ने हमेशा फायदा उठाया है और इस आग मे भी धकेला है मगर औरत को ये बात शायद अभी भी समझ नही आयी । बाज़ारबाद के लाली पाप को वो शायद समझी नही है। अगर अब भी ना चेती तो सही है हमेशा के लिये दासी बन जायेगी। सही आलेख है धन्यवाद्

arvind said...

वो चेहरे क्यों पीछे हैं जो उन्हें आगे रख कर उनके कन्धे से बन्दूक चलाते हैं.....apka kahana sahee hai.lekin adhikatar ve chehare bhi ourate hi hai.

makrand said...

bahut sunder

Babli said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है! मेरे सारे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

बेचैन आत्मा said...

लगभग 95 % झूठे दहेज और प्रताडना की शिकायतें दर्ज की गयी.

..मुझे यह बात ही झूठ लगती है क्योंकि मुझे याद नहीं कि मैं आज तक किसी ऐसे बारात में गया हूँ जहाँ शादी बिना दहेज के हुई हो! जबकि हर वर्ष कई शादियों में जाना होता है. दोनों पक्ष राजी होते हैं इसलिए शिकायत नहीं सुनने को मिलती. आपकी बात तब मान लेता जब यदा-कदा ऐसी शादी देखी होती जहाँ दहेज लिया जा रहा हो. जहाँ १००% शादियाँ दहेज से हो रही हों वहाँ कैसे मान लिया जाय कि ९५% शिकायत झूठे हैं!

..और अंत में बाध्य होकर यही पुरुष समाज औरतों से सारे अधिकार छिन लेगा और उसे फ़िर से दासी बना देगा.इसलियें औरतें.....सावधान......तुम्हें शक्ति प्रदान करने के लिये जो उपकरण दिये जा रहे हैं उसे हथियार बनाकर समाज पर मत घुमाओ.,अन्यथा.............तुम फ़िर से दासी बनोगी.

...यह तो आप धमकी दे रहे हैं! यह स्थिति कभी नहीं आएगी. मुझे तो आपकी इस भाषा में सामंतवादी व्यवस्था की झलक दिखाई दे रही है!
.....समाज में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. किसी एक घटना के लिए सभी को दोषी ठहराना उचित नहीं है. इस समस्या का समाधान यही है कि हम महिलाओं का आदर करें...प्यार दें ..ऐसा करें कि उनका विश्वास पुरुषों पर बना रहे. अविश्वास है तो इसके लिए पुरुष समाज ही उत्तरदायी माना जायेगा. दहेज प्रथा का वास्तविक विरोध करें. सरकार..आरक्षण..नहीं इसके लिए आप जैसे क्रन्तिदूतों की आवश्यकता है क्योंकि आप मानते हैं कि
.. यह कटु सत्य है कि नारी शक्ति-स्वरुपा होती है.उसे "अबला" समझना मुर्खता है और "अबला" कहना उसे अपमानित करना और पुरुषों के वर्चस्व को स्थापित करने हतु एक कुटिल चाल है. पुरुष और नारी एक दुसरे के सम्पुरक हैं.दोनो बरबरी के लिये संघर्ष करें तो यह उचित भी है और कल्याणकारी भी.

arvind said...

मै आपकी बातों से सहमत हूं कि १००% शादियाँ दहेज से हो रही हों वहाँ कैसे मान लिया जाय कि ९५% शिकायत झूठे हैं!
लेकिन जो शिकायतें पुलिस और न्यायालय में दर्ज की गयी ९५% झूठे हैं-जिनमे यह कहा जाता है कि शादी के बाद दहेज मांगा जा रहा है.---परिणामस्वरुप कई निर्दोष लोगों कि जिंदगी बर्बाद होते देखा है.

औरतें.....सावधान......तुम्हें शक्ति प्रदान करने के लिये जो उपकरण दिये जा रहे हैं उसे हथियार बनाकर समाज पर मत घुमाओ.,अन्यथा.............तुम फ़िर से दासी बनोगी.

यह धमकी नहीं है मैं सचेत कर रहा हूं.हां ऎसा हुआ तो यह सामंअत्वादी व्यवस्था होगी जो अनुचित है.

कृपया यह अर्थ न निकालें कि मैं आरक्षण का विरोधी हूं.मैं आरक्षण का सार्थक परिणाम चाहता हूं.

सती प्रथा के विरोध की तरह अब दहेज प्रथा के विरोध मे सभी को एकजुट होना चाहिये.इसके वास्तविक निदान हेतु मैं अगला पोस्ट लिखुंगा.

kshama said...

Naaree to aajbhi daasee hee hai! Aisi aurtonki sankhya aajbhi adhik hai,jo pashvi atyacharon se dam tod deti hain...