Friday, March 5, 2010

वैदेही

वैदेही दिवाल से कान सटाकर सुन रही थी.पिताजी कह रहे थे -" मैं अपना प्रण नहीं तोडुंगा.वैदेही की सादी में दहेज नही दुंगा.आज लडके के पिताजी ने माना कि वैदेही गुणवती है लेकिन फ़िर भी शादी से मना कर दिया". मां रोते हुए बोली-"आज कल विना दहेज के शादी कौन करता है.ऎसे मे तो आपके कारण हमारी बेटी कंवारी ही रह जायेगी".पिताजी का जबाब था-"चाहे जो भी हो ,मेरी बेटी कोई खुंटा नहीं है जिससे खरीदकर लाये गये किसी बैल को बांध दूं".वैदेही मन ही मन मुस्कुरा रही थी.वह निश्चिंत थी.अब या तो वह जिंदगी भर एक महान बाप की बेटी बन कर जीयेगी या एक आदर्श व्यक्ति की पत्नी बनेगी जो वैदेही को चाहेगा दहेज को नहीं.

4 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

...बहुत सुन्दर,प्रसंशनीय!!!!

बेचैन आत्मा said...

अब या तो वह जिंदगी भर एक महान बाप की बेटी बन कर जीयेगी या एक आदर्श व्यक्ति की पत्नी बनेगी जो वैदेही को चाहेगा दहेज को नहीं.
....यह एक पंक्ति बहुत वजनी है.

Babli said...

वाह बहुत बढ़िया लगा जो सराहनीय है! बधाई!

निर्मला कपिला said...

बिलकुल सत्य और सटीक लघु कथा। बधाई और आशीर्वाद्