Wednesday, March 31, 2010

प्रिये तुम

प्रिये ,

यह खत नहीं है.यह मेरे हृदय में उठ रहे विचारों का ज्वार है,दिमागी तारों को हिला देनेवाली एक कंपन है,धमनियों में बह रहे रक्त-कणों का आवेग है,एक साथ कई भावनाओं के मिलने से बना एक शब्द है.इसलिये प्रिये तुम मेरे दिल की तरह इसके भी टुकङे कर कूङेदान में मत फ़ेक देना.एक बार जरुर पढना.

आज मैं तुमसे दूर हूं.....काफ़ी दूर और बीच में सारा का सारा समन्दर आ गया है.जिसमें निर्दयी सुनामी भी है और रुला देनेवाली सन्नाटा भी.जिसमें अनन्त गहराई भी है और आकाश को छू लेनेवाली ऊंचाई भी..............और इसका नमकीन पानी तो इतना जहरीला है कि हमदोनों को एक कर देनेवाले हर रास्ते को ऎसे डंक मारता है कि उसका वजूद ही मिट जाता है.

जानती हो.... आज मेरे पास सब कुछ है.खूब सारा पैसा, कई घर, दर्जनों गाङियां, सैकङो नौकर-चाकर और वह सब कुछ जो मुझे नहीं चाहिये.मैं जो चाहता था वह प्रिये तुम ही थी.गरीबी और अमीरी की जिस दीवार नें हमेंअलग कर दिया था,लंबी छलांग लगाकर उस दीवार को मैनें कबका फ़ांद लिया है प्रिये. ऎसा मैनें गरीबी से पीछा छुङाने या अमीरी को पाने के लिये नहीं किया.मैं तो सिर्फ़ उस रास्ते पर आगे बढा जिसका मंजिल प्रिये तुम ही थी.

मुझे तुम्हारा प्यार क्या मिला, मानो सब कुछ मिल गया था,सारे सपनें पुरे हो गये थे.किसी चीज की जरुरत ही न बची थी.सिर्फ़ चंद रुपये वाली नौकरी नहीं होने की वजह से तुमनें मुझे ठोकर मार दिये, जितने रुपयों के बिस्किट से आज मेरे कुत्ते का भी पेट नहीं भरता.वह ठोकर भी इतनी जोरदार कि मैं लगातार गिरता ही जा रहा हूं और दुनियां समझती है कि मैं बुलंदी को छु रहा हूं.

हो सकता है कि तुम्हें चाहनेवाले कई रहे हों.प्रिये तुम तो ऐसी हो ही कि हर कोई तुम्हें जरुर चाहेगा........लेकिन तुमने यह कैसे सोच लिया कि मुझसे ज्यादा प्यार करनेवाला कोई और हो सकता है......यह कैसे हो सकता है?
हिमालय से भी ऊंचा और सागर से भी गहरा कुछ होता है क्या?..........नहीं. तो फ़िर प्रिये ऎसी कौन सी मजबूरी थी कि चंद सोने-चांदी के टुकङों के बदले ढेर सारे प्यार से भरा तराजु का पल्ला उपर उठ गया.ऎसी भूल कैसे हो गयी कि जिसने जन्नत को जमीं पे उतारा था उसे जहन्नुम कि जलालत मिली.

प्रिये तुम मेरी छोटी सी डांट-डपट पर रो दिया करती थी.कहीं तुम रो तो नहीं रही?.....रोना मत.......चलो अब हंसा देता हूं.याद है तुम्हें वो पूनम की रात.....समन्दर के किनारे....तुमने मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी थी.फ़िर तुम तितली की तरह भागने लगी और मैंने तुम्हें पकङ लिया.ऎसा खेल एक बार नहीं दर्जनों बार हमने खेला था.........और हर बार मैं तुम्हें पकङ लेता था. जानती हो क्यों?क्योंकि उस वक्त तुम मेरे दिल में रहती थी और दिल को आंखों की जरुरत नहीं होती.

प्रिये एक दिन मुझे वही वाकया याद आया जब मैं अकेला था. मुझे बहुत जोर से हंसी आयी.मेरे ठहाके की एक आवाज ने मेरे ही भीतर से निरन्तर चित्कार मार रहे हजारों-लखों क्रन्दन के स्वरों को तत्काल दबा दिया.आंखें भले ही नम थीं पर पानी के रंग बदल गये थे.फ़िर मैंने आंखों पर तुम्हारे दिये हुए रुमाल को बांध लिया और तुम्हें पकङने के लिये इधर-उधर भागने लगा.प्रिये इस बार भी मैंने दर्जनों बार यह खेल खेला पर एक बार भी तुम्हें नहीं पकङ पाया.मुझे अब भी उतना ही मजा आ रहा था जितना पहली बार आया था.लेकिन तब मैं हर बार सफ़ल हुआ था और अब हर बार असफ़ल हो रहा था.फ़िर मैंने ठान लिया कि मैं यही खेल खेलता रहुंगा.भले ही जीवन के पूर्वार्ध में इस खेल में मैं हर बार जीता और उत्तरार्ध मे हर बार मुझे हारना ही है.

प्रिये बंद कमरे में मैं कई दिनों तक यह खेल खेलता रहा............फ़िर अचानक उस शीशे से मेरा हाथ टकराया जिस शीशे में रोज मैं अपना चेहरा जो कबका अपना सूरत बदल चुका है,देखा करता था.शीशे के टुकङे-टुकङे हो गये और मैं बेहोश होकर गिर पङा.......बाद में पता चला कि मेरे किसी अपने ने मेरी आंखों से पट्टी खोल दी थी.जानती हो मैं क्यों असफ़ल हो रहा था? क्योंकि इस बार मुझे खयाल ही नहीं रहा कि प्रिये तुम तो मेरे दिल में हो.. यदि मैं अपना हाथ अपने दिल पर रखता तो तुम जरुर पकङी जाती.

प्रिये मेरा यह शरीर तो कभी न कभी नष्ट होगा ही पर मैं तुम्हें चाहता ही रहुंगा.....क्योंकि मेरा प्यार महज शारीरिक आकर्षण भर नहीं है.तुम तो मेरी आत्मा से जुङी हुई हो....................और आत्मा तो अमिट है,अमर है.

6 comments:

Babli said...

नए अंदाज़ में आपने बहुत ही सुन्दरता से हर एक शब्द लिखा है! बहुत ही शानदार पोस्ट!

Dev said...

प्रेम के रस से भीगे हुए शब्दों से पिरोये हुए आपके भाव बहुत खूब है

sangeeta swarup said...

अद्भुत शाश्वत प्रेम.....खूबसूरत अभिव्यक्ति

Suman said...

nice

सीमा सचदेव said...

shaandaar post

Dr Satyajit Sahu said...

gajab aap cha gaye...........................