Tuesday, July 27, 2010

प्यार की परिभाषा

मेरे बिस्तर पर
गर्म भट्ठी की तरह
सांसें छोङना
फ़िर
कुछ ही पल में
मेरी बांहों में पिघलकर
सर्द हो जाना.

बेशर्म होकर
मेरे जिस्म के हिस्सों को
अपनी नजरों से शिकार करना
फ़िर
अपनी ही आंखों पर
खुद की हथेली से
पर्दा डाल देना.

हजारों की भीङ में
मदहोश कर देनेवाली
कामुक चुंबन
फ़िर
प्रणय निवेदन करने पर
पलकें झुकाकर
मूक होते हुए
नाकारात्मक संकेत.

तुम प्यार की परिभाषा हो.....

13 comments:

रश्मि प्रभा... said...

ek khamoshi ... sunti hai, kahti hai

श्याम कोरी 'उदय' said...

... bahut khoob !!!

कविता रावत said...

Jajbaaton ke bharpurn prastuti..

ललित शर्मा said...

बहुत कुछ कह गए
नकारात्मकता में सकारात्मक्ता

उठा पटक said...

sundar rachanaa !

संजय भास्कर said...

कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।

soni garg said...

achhi kavita ......

Akhtar Khan Akela said...

bhbut khub is pyaar ki pribhashaa pr sdqe jaaun. akhtar khan akela kota rajsthan

Mithilesh dubey said...

अश्लीलता साफ दिख रही है, मुझे नहीं लगता की प्यार की कोई ऐसी परिभाषा हो सकती है , नीचे की लाईन में आप पता नहीं क्या कहना चाहते हैं मई तो समझ ही नहीं पा रहा हूँ,

Pankaj said...

@ mithilesh Dubey
is kavita me mujhe kahi bhi aslilata nahi dikhta.yadi aap bhaavaarth hi nahi samajh rahe to kaise kah sakate hain ki yah aslil hai.aslilata shabdon se nahi balki usake bhaavaarth se hota hai.......

hem pandey said...

प्यार की एक नयी परिभाषा.

monali said...

Very beautiful poem...

*KHUSHI* said...

pyaar ki paribhasha ko bahot sundar tarikese pesh kiya...