Wednesday, July 7, 2010

आंसू

जानती हूं परेशान हो
मेरे बह निकलने की आदत से.
आंखों से निकलते ही
फ़ेंक डालते हो
सूखी जमीन पर कचङों के जैसे.
पर मेरी बफ़ादारी तो देखो
जब भी तुम तन्हा होते हो
आ जाती हूं बिना बुलाए.
अक्सर भरी महफ़िल में भी
मैं तुम्हें तन्हा पाती हूं
तब भी चली आती हूं.

मुझ पर तरस खाकर
एक बार मुझसे प्यार करके देखो
तन्हाई में भी
तुम्हें महफ़िल नजर आयेगी.

12 comments:

Pankaj said...

मुझ पर तरस खाकर
एक बार मुझसे प्यार करके देखो
तन्हाई में भी
तुम्हें महफ़िल नजर आयेगी....bahut sundar

दिगम्बर नासवा said...

इन आँसुओं की दास्तान बहुत दर्द भरी है ... ये हमेशा साथ देते हैं ...

आचार्य उदय said...

भावपूर्ण लेखन।

kshama said...

मुझ पर तरस खाकर
एक बार मुझसे प्यार करके देखो
तन्हाई में भी
तुम्हें महफ़िल नजर आयेगी.
Badi nafasat se apni baat kahi hai...! Bahut sundar!

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।

Akhtar Khan Akela said...

kraanti dut ji yeh aapki kranti ki hi kraamaat he ke aapne aansu ko striling bnaa diyaa vrnaa bechaaaraa aansu to purling ke roop men istemaal kiyaa jaataa rha he ab aansu zimn pr nhin giregaa aek mulaym saa rumaal use ponchne ke liyen hmne haath men le liya he achche lekn k liyen bdhaayi. akhtar khan akela kota rajsthan

monali said...

Aksar jinhein bilkul tavajjo nahi dete wo hi tanhaayi k saathi bante hain////

monali said...

Aksar jinhein bilkul tavajjo nahi dete wo hi tanhaayi k saathi bante hain////

Divya said...

sukh , dukh dono ke saathi...aansoo

Behad khoobsurat rachna.

Saumya said...

nice one again!

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

संजय भास्कर said...

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..