Tuesday, May 11, 2010

भ्रष्टाचारम सर्वत्रम

कार्यालये च विद्यालये
न्यायालये च रक्षालये
विधानालये च वाचनालये
गृहालये च फ़िल्मालये
चिकित्सालये च शौचालये
मस्जिदे च मठालये
यत्रम-तत्रम उपस्थितम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

उद्योगे च व्यवसाये
पर्यावरणे च भाषाये
निर्माणे च ठेकालये
दुग्धालये च विषालये
खेलम-कूदम और क्रिकेटम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

कार्यालये अंग्रेजम पुत्रम
विद्यालये मैकाले वत्सम
न्यायालये न्यायधीषम भ्रष्टम
रक्षालये भौं-भौं श्वानम
किंचित स्थानम कुतौ न रिक्तम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

विधानालये दो बापम पुत्रम
वाचनालये नित्यानन्दम
गृह मंत्राले सत्चित अम्बरम
फ़िल्मालये दाउद सम्पर्कम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

चिकित्सालये किडनी चोरम
शौचालये ठेकेदारम
मस्जिदे जेहादम षङयंत्रम
मठालये ब्राह्मण पाखंडम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

निर्माणे पुलम पतितम
ठेकालये बन्दूकम नोकम
दुग्धालये केमिकल मिलावटम
विषालये अवैध शराबम
खेलम-कूदम संघम प्रमुखम
क्रिकेटम मोदी मोदकम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

उद्योगे टेक्सम चोरम
च व्यवसाये जमाखोरम
पर्यावरणे मुद्रा धुर्तम
भाषा क्षेत्रम मीडिया मित्रम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

पशु भोजनम च बोफ़ोर्सम
ताबुतम च शेयर मार्केटम
स्टम्प पेपरम च सैनिक दालम
किंचित अल्पम किंचित दीर्घम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.

राष्ट्राध्यक्षं प्रतिभा मातरम
मंत्री प्रमुखः मनमोहनम
सर्वत्रम, कथय न कुत्रम?
क्रांतिदूतम प्रश्नम किंचित उत्तरम?
वन्दे मातरम वन्दे मातरम.
(मित्रों मैं संस्कृत नहीं जानता,फ़िर भी कविता लिखने का प्रयास किया है,आशा है भाषा पर ध्यान न देकर भावार्थ पर जायेंगे.)

13 comments:

राजकुमार सोनी said...

जनसामान्य को समझ में आने वाली खतरनाक किस्म की संस्कृत है। अच्छा लिखा है आपने।

ललित शर्मा said...

वाह वाह वाह
आज तो खाखी संस्कृत में लिख डाले

यत्र-तत्र-सर्वत्र-भष्ट्राचारम् व्याप्तम्।

सुभाष चन्द्र said...

मज़ा आ गया,

Babli said...

बहुत सुन्दर लिखा है आपने और आपकी लेखनी के बारे में जितना भी कहा जाए कम है! बहुत ही बढ़िया और मज़ेदार लगा!

jai bihar said...

vatav me bahut achha likha hai. Vyavsth Par karara tamacha.
thanks
sushil dev

kshama said...

Sanskrit to samajh gayi...bhrashtachar ka nivaran kaise karen?

कविता रावत said...

भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
वन्दे मातरम वन्दे मातरम.
....अतीव सुन्दरम ....
इदं १०1% सत्यम .....
सार्थक व्यंगे अभिनन्दनम

बेचैन आत्मा said...

यह संस्कृत तो मेरे भी समझ में आ गयी ..बहुत दिनों से यही एक दुःख था कि संस्कृत भाषा समझ नहीं पाता ...

अच्छा व्यंग्य लिखा है आपने.
..बधाई.
मित्र, आजकल व्यंग्य लिखना बहुत आसान है! सही कहो तो लोग समझते हैं कि व्यंग्य कस रहा है!

Akhtar Khan Akela said...

aapki bhrstaachaa ke maamle men shishtaaachaar bhri tippni qaabil e taarif he. akhtar khan akela kota rajathan my blog akhtarkhanakela.blogspot.com

'उदय' said...

... बहुत खूब ... नये प्रयोग के लिये बधाई!!!

संजय भास्कर said...

......सार्थक व्यंगे अभिनन्दनम

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत सुन्दर, मजा आया पढ़कर !

आनन्‍द पाण्‍डेय said...

सराहनीय प्रयास है आपका ।


संस्‍कृत में रूचि के लिये हार्दिक धन्यवाद ।
हालांकि भाषागत व व्‍याकरणगत कमियां हैं इस कविता में पर आपने संस्‍कृत में लिखने की हिम्‍मत तो जुटाई है। आपके इस प्रयास के लिये आपका ऋणी हूं ।

संस्‍कृत विषय में अधिक जानने के लिये तथा अपना ब्‍याकरणजन्‍य दोष शुद्ध करने के लिये यदि सहायता की अपेक्षा हो तो हमें संपर्क करें । आप की सहायता करने में खुशी होगी । मेरे ब्‍लाग पर सादर आमंत्रित हैं ।
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