Tuesday, April 6, 2010

चांद और तुम.

मुझ से दूर
गगन-पटल पर
अपनी चाल से चलते हुए
जग के तम को निगलते हुए
हल्की सी रोशनी लिये
गुलाब की पंखुङियों सी
हंसनेवाली.
दाग होते हुए भी
खूबसूरत
बादलों से घिरकर भी
निर्मल
पवित्र फ़िर भी मादक
ऎसा स्तित्व कि मिट नही सकता।

फ़िर भी
चांद और तुम
दोनों को
मेरे होने या ना होने
का अहसास भी नही...?

9 comments:

Amitraghat said...

बहुत बढ़िया प्रवाहमयी......."

सीमा सचदेव said...

सुन्दर प्रवाह और अंत में निराशा का भाव मानसिक व्यथा को उजागर करता है ।

kshama said...

फ़िर भी
चांद और तुम
दोनों को
मेरे होने या ना होने
का अहसास भी नही...?
Behad sundar rachna jo antme ek tees chhod deti hai!

ललित शर्मा said...

दाग होते हुए भी
खूबसूरत
बादलों से घिरकर भी
निर्मल
पवित्र फ़िर भी मादक

वाह!क्या बात कह दी अरविंद जी,
हम तो आपके लेखन के कायल हैं,
आभार

संजय भास्कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Shekhar kumawat said...

फ़िर भी
चांद और तुम
दोनों को
मेरे होने या ना होने
का अहसास भी नही...?


waqay me bahut sundar


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi sahaj rachna hai....

sidheshwer said...

अच्छी अभिव्यक्ति !!

श्याम कोरी 'उदय' said...

....bahut sundar, prabhaavashali rachanaa!!!