Sunday, September 19, 2010

मैं ,श्रीमतीजी और..........भाग ३ (व्यंग्य)

उसने अपना भाषण जारी रखा ---" शान्ति का सन्देश देने से भले ही पब्लिक न माने लेकिन नेता , पुलिस , अपराधी सबके साथ आपके सम्बन्ध अच्छे हो जायेंगे ......लेकिन  क्रान्ति के नाम पर तो ये लोग मुझे विधवा कर देंगे .फिर बिना परेशानी के मैं अपनी जिन्दगी कैसे काट पाउंगी ?".
अब मुझे  वर्दास्त नहीं हो रहा था----" तो क्या तुम्हारी परेशानी मैं हूँ  ?"
" नहीं जी ये तो मेरे पापा के विचार थे .मैंने तो सिर्फ उनका समर्थन किया था "
" समर्थन...?"---अब मैं सहन  नहीं कर पा रहा था---" समर्थन किस बात के लिए ?'.
"इस बात के लिए की वह महिलाओं का दर्द समझते हैं.".
"क्या बहकी बातें कर रही हो ? तुम्हारे कहने का मतलब महिलाओं का दर्द पुरुषों के चलते है  ?"
" नहीं जी. मैंने ऐसा कब कहा. यदि पुरुषों ने महिलाओं को दर्द दिया है तो चूड़ी और  बिंदी लाकर खुश भी तो कर देता है और  यदि डांटते -पीटते हो तो शाम को पिज्जा भी तो खिलाते हो"----श्रीमतीजी के हंसी में दर्द के छीटे साफ़ दिखाई दे रहे थे. मैं जान रहा था जल्दी ही उसकी आँखों में घरियाली आंसू के सैलाब आनेवाले हैं.

                                                                           ससुरजी जब भी आते हैं चाहे तो सैलाब आता है या तूफ़ान.अगले दिन मेरे एक ब्लोगर मित्र ने सुझाव दिया की ससुरजी को बच्चे को पढ़ाने के काम में लगा दिया करो. मैंने ऐसा ही किया.जब शाम को घर पहुंचा तो चुप चाप खिड़की   से झांककर देखा वह टिंकू को पढ़ा रहे थे---" पढो...ए फॉर   अमीर , बी फॉर बेईमान.
टिंकू ने टोका---" लेकिन पापा तो ए फॉर एप्पल पढ़ाते हैं....."
"बेटे एप्पल से तुम याद नहीं रख पाओगे ...आजकल एप्पल कहीं दिखता नहीं अस्सी रुपये किलो चल रहा है और  आज के महगाई के दौर में अमीर लोग तो फुटपाथ पर भी मिल जायेंगे. पढो सी फॉर करप्सन "   टिंकू ने फिर टोका------"नानाजी ....ये भी एप्पल  और बनाना की तरह कोई फल होता है क्या ?".
" नहीं..करप्सन  पौधे  का नाम है जिसे आजकल हर डिपार्टमेंट में लगा दिया गया है.इसका फल सीधे कैश के रूप में निकलता है." ओह गोड ससुरजी बच्चे को पढ़ाने के बदले बिगार रहे थे.मैं कमरे में घुसा और बोला-----" पापाजी चलिए दूसरे रूम में बैठकर बात करते हैं ". वह बोले---" नहीं दामादजी मुझे अपने नाती को पढ़ाने दीजिये----पढो डी फॉर दंगा ". अब उनको रोकना बहुत जरुरी था.सो मैंने कहा---" पापाजी मुझे आपसे बहुत जरुरी सलाह लेना है." इसबार वह मान गए.

                                                                      मैंने सोचा गणित में बहकी बातें करने की संभावना नहीं है इसलिए मैंने उनसे आग्रह किया की टिंकू को गणित पढ़ाया करें. अगले दिन शाम को वह टिंकू को रेखा-गणित पढ़ाने   लगे ------- ---
" रखा-गणित को समझाने के लिए पहले रेखा को जानो.पहले लोग बिंदु से शुरू करते थे तब जाकर रेखा के बारे में जान पाते थे.आजकल लोग रेखा से शुरू कर रेखा पर ही गणित समाप्त कर देते हैं.रेखा को जानने के प्रयास में कई विद्वान् स्वर्ग सिधार गए.मेरे जैसे कई लोग जिन्हें रेखा से लगाव रहा युवा से वृद्ध होते गए लेकिन रेखा जस की तस बनी रही.उसका महत्व कभी भी कम नहीं हुआ. गणित, वाणिज्य और कला के क्षेत्र में रेखा के योगदान को कभी भी नहीं भूला जा सकेगा.यदि रेखा न होती तो आज से तीस चालीस वर्ष पूर्व ही कला दम तोड़  देती, मुंबई जैसी महानगरी का वाणिज्य रसातल में चला जाता और कई लोगों का जीवन गणित कागजी बनाकर रह जाता.रेखा को आधार बनाकर जितने भी थ्योरेम्स लिखे गए लोगों के बीच हिट हुए.आधार ही नहीं वह लम्ब और कर्ण भी बनी ऊपर से सौन्दर्य तो उसमें है ही. बड़े  से बड़े  नटवरलाल भी सरल रेखा के खेल के सामने बौने सावित होते रहे .मुकद्दर  के सिकंदर भी अपने मुकद्दर की रेखा को बदल नहीं पाए .मुझे लगता है रेखा की प्रासंगिकता कभी भी कम नहीं होगी. कभी अंतहीन सीधी रेखा लोगों के अग्निपथ को सरल -पथ बनाती रही तो कभी शराब के प्याले की परिधि की तरह किसी वृत्त का रूप लेती रही जिसके क्रन्द्रक में मयखाना ही समा जाया करता था. सत्तर के दशक में आज की तरह ना ही कैट हुआ करती थी न ही करिश्मा होती थी.तब पढ़ाई का माहौल अच्छा था. वह रेखा का स्वर्णकाल था.उस समय सभी छात्र  रेखा के अध्ययन में लगे रहते थे.....लेकिन कोई भी रेखा को नहीं जान पाया.

अगले भाग में ससुरजी टिंकू को संस्कृत के श्लोक पढ़ाएंगे.............क्रमश:

14 comments:

Anonymous said...

Arvindji,
Vyangya ke madhyam se Samaj ka vastvik Rekha-Chitra kheenchtey rahiye.

Anonymous said...

Agyat nahi maine likha hai.

निर्मला कपिला said...

व्यंग भी और ग्यान भी एक जगह बहुत अच्छा चल रहा है व्यंग बधाई। आज ही पिछले भाग भी पढे।

Pratik Maheshwari said...

ए, बी, सी, डी.. वाला तो मस्त था... हाहा..
मज़ा आ गया...

'उदय' said...

... bahut sundar ... shaandaar-jaandaar !!!

दिगम्बर नासवा said...

हा हा बहुत मज़ा आ रहा है .... ससुर दामाद दोनो का अपना अंदाज़ .... अच्छा हास्य और व्यंग ....

ललित शर्मा said...

bahut achchha vyangya likh hai arvind bhai.
ganit vala dimag laya hai.

aabhar

ZEAL said...

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अरविन्द जी,

पिछला नुस्खा आपके काम न आया , इसका अफ़सोस है।

अब second line of treatment दे रही हूँ.....इसे आजमाइए।

आदरणीय ससुर जी से कहिये की की थाईलैंड एक सुन्दर जगह है और उनके लिए अच्छी नौकरी है। दो लाख भात [ bhat= Thai currency ] प्रति महिना एवं एकोमोडेशन फ्री । यहाँ आकर मेरा कंप्यूटर संभाल लें।

अरे ..करना कुछ ख़ास नहीं, मैं मोडरेशन हटा लेती हूँ, और अंकल जी आने वाली गोली-बारी का उत्तर टाइप करेंगे।

नोट- कृपया भाभी जी को मेरे नुस्खें न बताएं।

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ZEAL said...

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अभी-अभी देखा आपने पिछली पोस्ट पर से मेरा कमेन्ट हटा दिया है। यदि पहले देख लेती तो इस पोस्ट पर कमेन्ट नहीं करती।
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मो सम कौन ? said...

हम बताये दे रहे हैं अरविन्द जी, आपके ससुर की हिस्ट्री ठीक नहीं है, हा हा हा।
अगली बार शायद ’फ़लम, फ़ले फ़लानी, संस्कॄत कभी न आनी’ का पाठ चलेगा। वैसे बाई द वे, बारहवीं में संस्कॄत में मेरे खुद के 91/100 मार्क्स थे। इंतज़ार में हैं अगली कक्षा के

बेचैन आत्मा said...

आप तो बड़े भाग्यशाली हैं जो आपको इतने ज्ञानी ससुर जी मिले! खाली-पीली उनसे लाल होने का क्या मतलब ? हा...हा..हा..
..करप्सन पौधे का नाम है जिसे आजकल हर डिपार्टमेंट में लगा दिया गया है.इसका फल सीधे कैश के रूप में निकलता है....
..करारा व्यंग्य। बधाई।

बेचैन आत्मा said...

आप तो बड़े भाग्यशाली हैं जो आपको इतने ज्ञानी ससुर जी मिले! खाली-पीली उनसे लाल होने का क्या मतलब ? हा...हा..हा..
..करप्सन पौधे का नाम है जिसे आजकल हर डिपार्टमेंट में लगा दिया गया है.इसका फल सीधे कैश के रूप में निकलता है....
..करारा व्यंग्य। बधाई।

संजय भास्कर said...

..करारा व्यंग्य। बधाई।

Vijai Mathur said...

Sanskrit ka paath jaldi shuru karaiye kahin aisa n ho ki--

nana nana bhookh lagi
khalo beta moongfali
moong fali me dana nahin
ham tumhare nana nahin

kahte hue chale n jayen.