Monday, August 2, 2010

बाढ की आशा

"हल्लो...नमस्ते बाबूजी."
"हां बेटा, कईसे हो?"
"बहुत बढियां बाबूजी."
"नोकरिया मिली ?"
"नहीं बाबूजी, पर चिन्ता के कोनो बात नाहीं. इस बार हम पूरा तैयारी में है.अतना पैसा कमायेंगे कि कोनो जरुरते नहीं रहेगी."
"वाह,...कैसे बेटा?"
"अरे बाबूजी बिहार में बाढ आनेवाली है न.इस बार बाढ एक सप्ताह लेट आ रहा है लेकिन पिछले साल जैसा ही होगा."
"बाढ आनेवाली है..?"
"लो उ तो हर साल आता है. दस कोठलीवाला जो मकान बनाये थे उसमे पहले से क्रेक डलवा दिया है. टी भी वाले को भी बता के रखा हूं.मंत्रीजी को पहले से तैयार कर दिया है. इस बार गरीब लोगों के लिये बहुत पईसा मिलेगा."
"तो उ पैसा तुमको कैसे मिलेगा"
"बाबूजी सरकार गरीबॊं के लिये पैसा देती है लेकिन गरीब सब तो दहा जाता है आ उनका झोपङिया तो पानी मे इधर से उधर हो जाता है. उसका कोनो प्रुफ़े नहीं बचता है. अंत में हमलोग अपने घर के मरम्मत के लिये पईसा रख लेते हैं. ."
"ठीक है लेकिन गरीब लोगन के लिये घर बनवा देना."
"बाबूजी गरीब के घर बनवाइयो देन्गे तभियो अगला साल त दहाइये जायेगा. भगवान एतना अन्याय थोङे ही करेगा कि अगिला साल बाढ नहीं आयेगा."

8 comments:

kshama said...

Pata nahi aise logon ko dohzak me bhi jagah milegi ya nahee?

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बाढ नहीं आएगा तो सूखा तो पड़ेगा
दोनो घी में और मुड़ कड़ाही में रहेगा।

अच्छा व्यंग्य,मजा आ गया

अब एक मौसम के हिसाब से गीत हो जाए।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

राष्ट्रीय आपदा से घर उजड़ जाते हैं मगर कुछ लोग इसका इंतजार भी करते हैं.
..सुंदर कटाक्ष. बहुत दिनों बाद आया..बहुत अच्छा लिख रहे हैं आप.

कडुवासच said...

... dhamekaadaar abhivyakti !!!

Anonymous said...

बहुत बढिया!

Saumya said...

भगवान एतना अन्याय थोङे ही करेगा कि अगिला साल बाढ नहीं आयेगा."

bauhat accha vyanga

hem pandey said...

प्राकृतिक आपदा भी कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया है - पतन की पराकाष्ठा की ओर अग्रसर हैं हम.

दिगम्बर नासवा said...

करारा व्यंग ... समाज किस हालत तक पहुँच गया है ...