Monday, August 30, 2010

चांद बहुत भूखा लगता है

आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

आज फ़ूस की छत से छनकर
काला धुआं नहीं निकला है.
आज नहीं है चमकी आंखें
घर का चुल्हा नहीं जला है.
वे लेट गये हैं पानी पीकर
फ़िर क्यों चेहरा सूखा लगता है.
आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

उसकी मां भी गले लगाकर
आज बहुत रोयी होगी.
आज भी गायी होगी लोरी
पर वह नहीं सोयी होगी.
घने बादल, शीतल पुरवाई
क्यों इतना रूखा लगता है
आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

22 comments:

रश्मि प्रभा... said...

chaand ke aansu kaun samajhta hai....

Divya said...

भावुक कर देने वाली प्रस्तुति।

Babli said...

बहुत ही ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! बढ़िया लगा!

दिगम्बर नासवा said...

दिल को छूती हुई रचना ... बहुत ही संवेदनशील रचना ....

Majaal said...

ढल ही जाता है हर रंग सख्त ,
तो क्या गर अभी चोखा लगता है

अच्छी रचना.

Shekhar Suman said...

bahut dino ke baad itni khubsurat rachna padhi hai.....
bahut khub...

बेचैन आत्मा said...

आज फ़ूस की छत से छनकर
काला धुआं नहीं निकला है.
आज नहीं है चमकी आंखें
घर का चुल्हा नहीं जला है

आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

...ये पंक्तियाँ तो इतनी शानदार बन पड़ी हैं कि तारीफ के लिए शब्द ही नहीं मिल रहे। दीन-हीन की पीड़ा कागज पर उतर आई है।
...बधाई।

'उदय' said...

... bahut khoob abhivyakti !!!

kshama said...

उसकी मां भी गले लगाकर
आज बहुत रोयी होगी.
आज भी गायी होगी लोरी
पर वह नहीं सोयी होगी.
Kya kahun?Dilme ek tees uth gayi..
"Bikhare Sitare" pe aapki shukrguzari ada kee hai...aapki tippanee yaad karte hue.."In sitaron se aage",is post pe...zaroor gaur farmayen!

ललित शर्मा-ਲਲਿਤ ਸ਼ਰਮਾ said...


वाह-वाह,बहुत बढिया-
आज तो कमाल कर दिया
अरविंद भाई-साधुवाद

खोली नम्बर 36......!

Rahul Singh said...

ताजगी भरी काव्‍य दृष्टि.

ana said...

भावपूर्ण प्रस्तुति………।

निर्मला कपिला said...

भावमय गहरी अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

KK Yadava said...

बहुत खूबसूरती से भावों को पिरोया...उत्तम प्रस्तुति..बधाई.
________________
'शब्द सृजन की ओर' में 'साहित्य की अनुपम दीप शिखा : अमृता प्रीतम" (आज जन्म-तिथि पर)

rohitler said...

लाजवाब प्रस्तुति...

पद्म सिंह said...

मार्मिक और सुन्दर प्रस्तुति ...

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत ही ख़ूबसूरत रचना....संवेदनशील और भावपूर्ण प्रस्तुति...

DEV GIRI said...

उसकी मां भी गले लगाकर
आज बहुत रोयी होगी.
आज भी गायी होगी लोरी
पर वह नहीं सोयी होगी.
घने बादल, शीतल पुरवाई
क्यों इतना रूखा लगता है
आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

very nice para in the poetory.

क्योकि भूख ऐसी है की हर किसी को हर तरफ अन्धंकार दिखायी देती हैं.

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

अच्छी रचना,
आप भी बहस का हिस्सा बनें और
कृपया अपने बहुमूल्य सुझावों और टिप्पणियों से हमारा मार्गदर्शन करें:-
अकेला या अकेली

Dr.J.P.Tiwari said...

जीवन की यथार्थ और आदर्शवाद के द्वन्द को रेखांकित करती एक ऐसी सार गर्भित रचना जो पाठक को अन्दर तक झकझोर देती है. संदेहपूर्ण रचना. शब्द, अर्थ सम्प्रेषण में पुर्णतः समर्थ .

Dr.J.P.Tiwari said...

जीवन की यथार्थ और आदर्शवाद के द्वन्द को रेखांकित करती एक ऐसी सार गर्भित रचना जो पाठक को अन्दर तक झकझोर देती है. संदेहपूर्ण रचना. शब्द, अर्थ सम्प्रेषण में पुर्णतः समर्थ .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज फ़ूस की छत से छनकर
काला धुआं नहीं निकला है.
आज नहीं है चमकी आंखें
घर का चुल्हा नहीं जला

ओह बहुत मार्मिक चित्रण ...अच्छी भावाभिव्यक्ति