Thursday, April 21, 2011

तुम दूर ही रहो.





मेरे निकट मत आना.

बेईमानी की बदबू से

दम घुटेंगे तुम्हारे.

चमकते चिकने चेहरे की

बदसूरत और टेढी-मेढी

झूठी रेखाएं

साफ़-साफ़ दिख जायेंगी.

भावनाओं और विचारों की

हत्या करनेवाले हाथ

खून से इस तरह रंगे मिलेंगे

कि निशान भी नहीं देख सकोगे

ईंसानों की भाग्य-रेखा का.

अपने छोटे से पेट के लिये

चट कर चुका हूं

कुरान की आयतों को.

छोटे से मांसल गुल्ली से

मूत चुका हूं

गीता के श्लोकों पर.

नहीं देख पाओगे

लाखों कोशिकाओं के बीच

की लम्बी दरारें.

नहीं झेल पाओगे

खूबसूरत मांसल जिस्म के

बीच की नर-कंकाल को.

बिल्कुल नहीं सह पाओगे

यह कि तुम

मेरे दिल में नहीं ठहर सकते

इसका कई बार पोस्टमार्टम हो चुका है.

Monday, April 18, 2011

सेक्स,प्यार,स्वाभिमान और पतन

सेक्स




विशाल पेंङ के

मोटे डन्टल के चारो ओर

हरी, परपोषी, अबला

लताओं का चिपक जाना

और धीरे-धीरे

वृक्ष के विशाल रस-भंडार को

चूस लेना.



प्यार



बूढे-घने दरख्तों के बीच

पतले युवा पेंङ का

संकीर्ण खाली जगह से

मूंह निकालकर

सुनहली किरणों को

कामुक होकर छूना.



स्वाभिमान



तना के निचले हिस्से

की झुकी हुई डालियों के

काट दिये जाने के बाद

अपना भविष्य जानते हुए भी

मुख्य सिरा का

उपर आसमान की ओर

बेअटक देखना.



पतन



विशाल पेङ की

खूबसूरत, गगनचुंबी

हरी पत्तियों का

सूखकर रंग बदल जाना

फ़िर कुछ ही देर में

स्वतः गिरकर

उबङ-खाबङ जमीन से

चिपक जाना

Wednesday, April 13, 2011

पंक को निर्मल करो रे

डा. बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकरजी के जन्म दिवस की पुर्व-सन्ध्या के अवसर पर मेरी रचना:-




सदियों से जो दलित बनकर

पैर को तेरे पखारा

तेरी जय में भी पराजित

तेरी हारों में भी हारा

आज उसके पग धरो रे

पंक को निर्मल करो रे.



फ़ूलों की भेंट हुई पुरी

नीरजों की हो चुकी पूजा.

अशक्त हैं कुछ अस्थियां

उन तन्तुओं में बल भरो रे

पंक को निर्मल करो रे.



भर चुके आंखों की प्याली

सुख दुखों के ही अमिय से

कुछ कटोरे रिक्त हैं जो

उनमे भी तुम जल भरो रे

पंक को निर्मल करो रे.



हुई अर्चना मां लक्ष्मी की

सरस्वती की वंदना भी

बिक रही बाजार बनकर

शीष उनपे नत करो रे

पंक को निर्मल करो रे.

Monday, March 14, 2011

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१८ (व्यंग्य)



राजा ने अपना प्रवचन जारी रखा----"वोही हनुमान जब बङा हुआ तो रावन का लंका जो सोना का बना हुआ था, जलाकर राख कर दिया. यानि कि पीला-धन को काला-धन बना दिया. तब का रावण भले घमंडी था लेकिन कलियुग के रावण के माफ़िक काला धन नहीं रखता था इसलिये उसका लंका सोने का था. भले ही हनुमानजी ने रावण का पीला धन को काला धन में बदल दिया लेकिन उस टाइम का राम लंका के उस काला-धन को ईंडिया नहीं ला सका. अपुन उम्मीद करता है कि कलियुग का देव बाबा रामदेव स्विस बैंक में रखा हुआ काला-धन इंडिया ले आयेगा. वैसे अपुन हनुमानजी पे बोल रहा है तो एक बात बता देता है कि तब के राम और आज का रामदेव के बीच का मेजर डिफ़रेन्स येही है कि त्रेता का राम बल-बुद्धि और विद्या के धनी वानर पे भरोसा करता था जबकि कलियुग का बाबा रामदेव वानर के बदले दुष्ट-नर पर भरोसा करता है."



राजा को खुद नहीं पता था कि उसने रामचरितमानस से रामदेवचरितमानस की ओर टर्न ले लिया था. फ़िर भी सौ चूहे खाकर हज की यात्रा का निर्णय लेना ही बहुत बङी बात होती है.अपराधिक प्रवृति का व्यक्ति यदि प्रवचन दे रहा था तो यह बहुत बङी बात थी, भले ही वह भगवान राम के बदले बाबा रामदेव को ही क्यों न प्रवचन का विषय बना ले.उसका प्रवचन निरन्तर रहा-------" कलियुग का बाबा रामदेव कालाधन को पीलाधन तो बनायेगा ही. उपर से बाबा ये भी बोलता है कि अपुन के देश में जहां खुशहाली और समृद्धि का नाली भी नहीं बहता है वहां खुशियों की गंगा बहायेगा. शराब ,तम्बाकू , गुटखा के उत्पादन और प्रसार को रोकेगा. एक-एक आदमी के किडनी और लीवर को दुरुस्त करेगा. भले ही ये सब करते-करते करोङो बेईमानो का हार्ट ब्रेक कर जाये लेकिन लोक-सभा में सैकङो इमानदारों को जरूर पहुंचायेगा. यानी कि सीधी बात------


भ्रष्टाचार को शिष्टाचार पढायेगा

कालाधन को पीलाधन बनायेगा

विदेशी के बदले स्वदेशी चलायेगा.

विलेन्टाइन डे के बदले बसंत-पंचमी मनायेगा.

मल्लिका शेरावत को सलवार-सूट पहनायेगा.

अंग्रेजियत को हिन्दी सिखायेगा

राम-राज्य से रोम-राज्य भगायेगा."


तभी मेरा दस साल का बेटा टिंकू बोल पङा----"मामा प्रवचन सुना रहे हो या कविता गा रहे हो ?" राजा को भांजा का विरोध बर्दाश्त नहीं हुआ----" चुप रह चड्ढीलाल. तू क्या बोलेगा. तू भी सत्ता पक्ष के सांसद की तरह बात करने लगा है. अच्छी बात प्रवचन से कहूं या कविता गाकर.....बात सही है तो सही है.-----भक्तों---इसी तरह कलियुग के देवता बाबा रामदेव का भी छोटे कद का बच्चा जैसा लोग विरोध करता है कि बाबा योग के साथ-साथ राजनीति काहे को करता है. काहे को बेईमान लोगों के चेहरे का नकाब उठाता है. काहे को गङे मुर्दे को जमीन से निकालता है---लेकिन बाबा रामदेव अपुन के जैसे ताल ठोकता है. गङे मुर्दे को जमीन से निकालता है--पोस्टमार्टम करने को. ओ पोस्टमार्टम करेगा और जांच करेगा कि कुछ जिन्दा और मुर्दा लोग कैसे पुरे देश का किडनी और लीवर बर्बाद कर दिया. ओ तो गनीमत है कि अपुन के देश का हार्ट इतना मजबूत है कि अभी भी बोडी दुरुस्त काम कर रहा है. उपर से बाबा है तो बांकी पार्ट भी ठीक हो जायेगा. जब बाबा अपने पेट को सटकाता है तो उसका थ्री-डाइमेन्सनल पेट टू-डाइमेन्सनल प्लेन बन जाता है. जरूर ही ओ नेताओं और बेईमानों का बढा हुआ मल्टी-डाइमेन्सनल पेट को प्लेन बना देगा.अपुन अब आज का प्रवचन बंद करता है कल बाबा रामदेव के माफ़िक योगासन सिखायेगा"



लोगों के जाते समय भक्तों के चढावे से पूजा की थाल रुपयों से भर गयी थी. श्रीमतीजी, ससुरजी, सासू-मां, चिन्टी और खुद राजा उसे देखकर आत्म-विभोर हो रहे थे. मैं चाहकार भी खुश कैसे हो सकता था. जब से प्रवचन शुरु हुआ था मां लक्ष्मी घर में रोज पधार रही थी और सारा श्रेय मेरे साला राजा को मिल रहा था. मैं तो अपने घर में ही परायों सा महसूस कर रहा था. लेकिन आज मेरा बेटा टिन्कू भी नाराज दिख रहा था. उसने अपने दुख का राज मेरे सामने प्रगट किया---"पापा...आज सबके सामने मामाजी ने फ़िर से मुझे चड्ढीलाल कहकर पुकारा" . मेरे दिल में जल रहे आग को घी की जरुरत थी जिसे मेरे बेटे ने फ़्री में सप्लाई कर दिया था. राजा के प्रवचन को रुकवाने का एक मजबूत काट मुझे मिल गया था. मैंने टिंकू को समझाया ---- " अब देख बेटा....किस तरह मैं तुम्हारे मामा का प्रवचन भी बंद करवाता हूं और बोरिया-बिस्तर समेंटकर गांव भी भिजवाता हूं. उसने तुम्हारे साथ-साथ मेरे स्वाभिमान को भी ठेंस पहुंचाया है."



क्रमशः

Wednesday, March 9, 2011

प्रकृति-प्रियतमा



जब भी करता हूं प्रेमालिंगन

राज खोलती प्रकृति-प्रियतमा.

अपनी कानों से सुनता हूं

बात बोलती प्रकृति-प्रियतमा.



उसके यौवन को तो देखो

अल्हङ नदिया सी बहती है.

चांद समेट सौन्दर्य-पीयुश

कामुक दृष्टि-वाण सहती है.

जब भी करता हूं मैं ईशारा

तभी डोलती प्रकृति-प्रियतमा.



है ज्ञात नहीं उसकी ताकत

हजार भुजाएं फ़ैली है.

उसके रंग-रुप अपने हैं

चाल चलन अपनी शैली है.

प्रति-पल प्रेयस के प्रणय का

भाव मोलती प्रकृति-प्रियतमा.

जब भी करता हूं प्रेमालिंगन

राज खोलती प्रकृति-प्रियतमा.

Tuesday, March 8, 2011

औरत---बेटी या मां





पता चल गया होता

कि तू बेटी है

तो दफ़न कर दी जाती

भ्रुण में ही.

या पैदा होने के बाद

बचपन को खंरोच दिया जाता

और साट दी जाती

जलते हुए चुल्हे और काली बरतनों से.

जवान होते ही

बांध दी जाती

मर्यादा के खूंटे से

या फ़िर

जला दी जाती

दहेज के बदले इस तरह

की श्मशान तक

अर्थी के बदले धूआं पहुंचता.

फ़िर भी बच जाती तो

सुला दी जाती जीते-जी

संबंधों से निकले शूलों पर.

फ़िर भावनाओं

और तुम्हारे शरीर के साथ

हजारो बार खेला जाता.



उन तथाकथित मर्दों के हाथों

जो आज भी नहीं समझते

जो औरत पैदा हो रही है

वह सिर्फ़ दुनियां की

बेटी ही नहीं

मां भी है.

Monday, March 7, 2011

बीत मैं खुद ही रहा हूं.



काल को क्यों दोष दूं ?

बीत मैं खुद ही रहा हूं.



खंडों में बांटूं तो देखूं

काल यौवन के प्रवाह को.

जीवन के वे निशा-रात्रि

व्यथा के सागर अथाह को.

एक सी वह स्यामल काया

प्रीत मैं खुद ही रहा हूं.



गर काल के आकार होते

तो अतीत में वे न घुलते.

होते दृढ उसके चरण तो

निकट क्षण से वे न मिलते.

जन्म-मृत्यु के क्षणिक पथ का

रीत मैं खुद ही रहा हूं...