Sunday, October 25, 2009

साहब की सोच

छोटे साहब हर समय जिम्मेदारियों से लदे रहते हैं.कभी कर्मचारियों के कार्य का वितरण,कभी अधिकारियों के अधिकार का संघर्ष और उपर से अपने कार्य क दबाब.सचमुच इन सारे दायित्वों का निर्वाह काफ़ी कठिन है.सामान्यतः उनसे कभी भुल नही होती.वह हर समय आदर्श सोचते हैं.
आज तो सुबह से ही दुखद समाचारों कि श्रिखला शुरु हो गयी है।पहला समाचार यह था कि जानकी बाई जो हमारे कार्यालय मे चपरासी, कल मर गयी.उसकी बहू ने पूछने पर इस बात की जानकारी दी.फौरन यह सूचना छोटे साहब को दी गयी.साहब ने तभी बाबू को बुलाया और उदारता दिखाते हुए आदेश पारित किया कि सभी अधिकारी दो सौ रुपये,ग्रुप सी कर्मचारी सौ रुपये और चतुर्थवर्गिय कर्मचारी पचास रुपये जमा करें और सारे रुपये जानकी के बेटे को भेज दिया जायें.कुल आठ हजार पचास रुपये जमा किये गये.एक चतुर्थवर्गिय कर्मचारी के हाथों जानकी के बेटे के पास भेज दिया गया.जानकी का बेटा मातृशोक के सदमे मे डूबा था.सो सारे रुपये तत्काल उसकी बहू ने जमा रख लिया. तभी छोटे साहब के फोन की घंटी बजने लगी.बडे साहब का फोन था.उन्होने अपने पचहत्तर वर्षीय पिता के देहावसान का दुखद समाचार दिया.छोटे साहब ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रगट किया.शोक लहर तत्काल जंगल मे लगे आग की तरह पूरे कार्यालय मे फैल गयी.अभी कार्यालय मे कार्य की शुरुआत ही हुई थी.महिला कर्मचारियों की आंखों से निकली अश्रुधारा शोक की लहर को उसी तरह आवर्धित करने लगी जैसे पवनदेव के सहयोग से महासमुद्र की लहरें तेज हो जया करती है. कार्यालय का कार्य पुरी तरह से ठप हो गया .शोक की लहर में कर्मचारियों के लिये कंप्युटर की कीबोर्ड पर उंगली फ़ेरना कठिन था और अधिकारियों के लिये निर्णय लेन.बडे दिलवाले अधिकतर कर्मचारीगण एवं अधिकारीगण छोटे साहब के पास आकर बडे साहब के पिता के निधन पर शोक प्रगट किया और उनके अंतिम संस्कार मे भाग लेने की इच्छा जतायी.साहब ने उन सभी को हस्ताक्षर कर कार्यालय छोडने की अनुमति दे दी स्वयं भी उनके साथ हो लिये.शेष बचे लोग अपने-अपने कार्य मे लगे रहे.
सायंकाल लगभग पांच बजे अंतिम संस्कार के उपरांत सभी लोग कार्यालय वापस आ गये.जानकी का बेटा छोटे साहब के कक्ष के पास खडा था. छोटे साहब के कक्ष मे जाने के बाद वह भी आदेश लेकर कक्ष मे प्रवेश किया.पुछने पर वह बोलने लगा "साहब! मेरी मां ने मरने से पहले कहा था कि आफ़िस जाकर बता देना नही तो साहब लोगों को पानी कौन पिलायेगा. उसने तीस साल रेलवे की सेवा की थी.जीते जी जब साहब लोग खुश होकर उसे रुपये देते थे तो वह नही लेती थी,मरने के बाद वह इतने रुपये लेकर क्या करेगी?आज तो यहां दो-चार लोग ही काम कर रहे थे,क्यों न ये सारे रुपये रेलवे को दे दिया जाये" वह तनिक चुप हो गया.साहब भी शान्त रहे.उन्होने रुपये लेकर अपने लोकर मे रख लिया.वह फिर कहने लगा "साहब मेरी मां इस कार्यालय मे सब को जानती थी और हर कोइ उसे दीदी कहकर पुकारते थे". वह फिर से चुप हो गया. वह जहां खडा था और साहब जहां बैठे थे उन दो स्थानों की सामाजिक दूरी इतनी ज्याद थी कि एक-दुसरे के विचारों के ज्वार को समझना नामुमकिन था और अश्रुधारा के रुप मे प्रगट करना उतना ही शर्मनाक.इसी बीच वह आदेश लेकर चला गया. साहब ने अपने कमरे का दरबाजा अन्दर से बंद कर दिया और फूट-फूटकर रोने लगे.जानकी के हाथ से इतने दिनों मे उन्होंने जितना पानी पीया था,सार पानी आंसू के रुप मे अपनी आंखों से बहा दिया.अक्सर जब एक बार कहने पर कोई बात जानकी नही सुनती तो साहब चिल्ला उठते थे और कहते थे बहरी हो गयी हो क्या.आज उनके फूट-फूटकर रोने की आवज दरवाजा बंद होने के कारण कोई नही सुन रहा,शायद बहरी जानकी सुन रही होगी.इससे बढकर श्रद्धांजलि क्या हो सकती है? साहब ने जानकी का कर्ज चुका दिया था.
अब चिंतन का समय था.साहब का चिंतन बडे साहब के पिता और जानकी के रेलवे के प्रति किये गये योगदानों की तुलना पर केंद्रित हो गया था.ईश्वर ने उन दोनों के जीवन मे तो बहुत बडा फर्क कर दिया था लेकिन मृत्यु तो सभी की एक जैसी होती है.ईंसानों ने उनके जीवन मे भी फर्क किया था और मृत्यु मे भी.क्षण भर के लिये साहब को लगा कि जानकी हाथ मे पानी का ग्लास लेकर खडी है,उनक चिंतन टूट गया.

5 comments:

antuni said...

ईश्वर ने उन दोनों के जीवन मे तो बहुत बडा फर्क कर दिया था लेकिन मृत्यु तो सभी की एक जैसी होती है.ईंसानों ने उनके जीवन मे भी फर्क किया था और मृत्यु मे भी.-----story bahut achhi hai,badhai our subhkamanaye.

shashi said...

galti to insono se hoti hi hai,fir bhi chhote sahab ki soch kabile-tarif hai-----thank u bahut achha.

ganga said...

आज उनके फूट-फूटकर रोने की आवज दरवाजा बंद होने के कारण कोई नही सुन रहा,शायद बहरी जानकी सुन रही होगी.इससे बढकर श्रद्धांजलि क्या हो सकती है? साहब ने जानकी का कर्ज चुका दिया था.
------marmik,sundar rachna.

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर रचना है कुछ दिन अस्वस्थ रहने से ब्लोग पर नहीं आ पाई । शुभकामनायें

Harkirat Haqeer said...

साहब का चिंतन बडे साहब के पिता और जानकी के रेलवे के प्रति किये गये योगदानों की तुलना पर केंद्रित हो गया था.ईश्वर ने उन दोनों के जीवन मे तो बहुत बडा फर्क कर दिया था लेकिन मृत्यु तो सभी की एक जैसी होती है.ईंसानों ने उनके जीवन मे भी फर्क किया था और मृत्यु मे भी.क्षण भर के लिये साहब को लगा कि जानकी हाथ मे पानी का ग्लास लेकर खडी है,उनक चिंतन टूट गया.

रोचक......!!

अच्छा लिखते हैं आप ......!!