Sunday, October 11, 2009

मेरी मां ने मुझे कहा था............,भाग-२

(मेरी यह कविता मुझे जन्म देनेवाली मां इन्दिरा और नयी प्रेरणा देनेवाली मां निर्मला के लिये समर्पित है।मेरे ये शब्द उन सभी मांओं को समर्पित हैं जिन्होंने मातृत्व को नयी परिभाषा दी है.नारी निश्चित रुप से जननी है,अपने आप मे अन्य की तरह सद्गुणों से युक्त और हज़ारो अवगुणों के होते हुए भी वह निर्मला है.वह पहली और अंतिम पाठशाला है.उसके शब्दों के सागर को समेटना असंभव है.टुकडों मे ही सही सागर को समेटने का दुस्साहस कर रहा हुं.यदि प्रिय पाठकों को यह पसन्द आये तो आगे बढने का आदेश दें यही इस कविता की सार्थकता होगी.) मेरी मां ने मुझे कहा था............,

भाग-२
तुमको मिल जाये ग्यानामृत,
प्रेम का हो पुष्प उदित,
यदि करो सब कुछ अर्पित,
हो संपुर्ण जगत का सुख अर्जित।

मेरा मंत्र ,यह याद रहे,
शेष रह अब अंतिम शिक्षा.
अपना सब कुछ वलि चढाकर,
करना तुम मातृभुमि की रक्षा.

जननी और जननी की भूमि
स्वर्ग से भी सुन्दर होती.
मां रोती जब पुत्र के होते,
मातृभूमि की आभा रोती।

अंतिम शिक्षा पुर्ण हो गया,
शांत हो गयी इतना कहकर.
देखा मुझको हो प्रेमातुर,
नयन कटोरा नीर से भरकर।

खिंची हृदय मे प्रश्न की रेखा,
हुए विना विचलित ही पुछा.
संशय क्या है? मुझे बताओ.
फ़िर आगे तुम कदम बढाओ।
क्रमश:................,

2 comments:

Pankaj said...

जननी और जननी की भूमि
स्वर्ग से भी सुन्दर होती.
मां रोती जब पुत्र के होते,
मातृभूमि की आभा रोती।
achhi kavita hai,---aage badhiye.

Nirmla Kapila said...

तुमको मिल जाये ग्यानामृत,
प्रेम का हो पुष्प उदित,
यदि करो सब कुछ अर्पित,
हो संपुर्ण जगत का सुख अर्जित।

मेरा मंत्र ,यह याद रहे,
शेष रह अब अंतिम शिक्षा.
अपना सब कुछ वलि चढाकर,
करना तुम मातृभुमि की रक्षा.

जननी और जननी की भूमि
स्वर्ग से भी सुन्दर होती.
मां रोती जब पुत्र के होते,
मातृभूमि की आभा रोती।
बहुत सुन्दर प्रेरणात्मक शिक्षा है अगर जीवन मे गघण कर सको तो बहुत अच्छे इन्सान बनोगे बहुत सुन्दर रचना है बधाई अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा आशीर्वाद्