Wednesday, October 14, 2009

सच बोलना गुनाह है।

धुन लगी है सच बोलने की। सनकी है साला। सौ दफे समझाया, मत बोला कर। कुछ बोल ही मत। बोलेगा भी तो झूठ बोल, सच मत बोल। सच काहे के वास्‍ते बोलेगा। तेरे को पागल कुत्‍ते ने काटा है क्‍या। लाख समझाओ कौन मानता है। काहे को मानेगा। शेर समझता है खुद को। सनकी साला।

शाम का वक्‍त था। चौराहे पर चायवाला भी था और पानवाला भी। रास्‍ते के दोनों ओर कई दुकाने खुली थीं। हम सीधे रास्‍ते सिनेमा हॉल की ओर चलते गये। फिर तीन घंटे सिनेमा देखा। सिनेमा के दौरान परदे पर सैकड़ों गोलियाँ चली, कमोवेश उतने ही लोग मरे। वह कुछ नहीं बोला, क्‍योंकि जानता है परदे पर दिखने वाले पिस्‍तौल खिलौने थे, गोलियाँ नकली थी और इन मौतों का सच से कोई रिश्‍ता न था। सिनेमा के बाद हम उसी रास्‍ते से आ रहे थे, जिधर से गये थे। फिर एक गोली चली और खल्‍लास। मैनें तो कुछ नहीं देखा। चायवाले और पानवाले को कल भी अपनी दुकानदारी चलाना है। इसलिए उसने भी कुछ नहीं देखा।
किसी ने कुछ नहीं देखा सिवा उसके। मैं उसे समझाया, लॉक रख अपनी जुबान को। हमारी तरह तुमने भी कुछ नहीं देखा। तुम कुछ बोल ही मत। बोलना है, तो बोल कि कुछ नहीं देखा तूने। झूठ के सिवा कुछ भी मत बोल, लेकिन काहे को मानेगा। उसने वर्दी वाले को सब कुछ बताया। उस वर्दीवाले को जो अक्‍सर गोली चलने के आधे घंटे के बाद ही आता है तब तक गोली चलाने वाले का हुलिया भी बदल चुका होता है, और ठिकाना भी। उस वर्दीवाले को उसने सब कुछ बताया-गोली चलाने वाले का चेहरा भी, और हुलिया भी। शेर के माफिक लोगों की भीड़ में शर्ट की छाती के बटन खोलकर एक-एक बात बतायी उसने। सच जो बोल रहा था। किसी खादी वाले का नाम बताया था उसने। जानता ही नहीं खादी वाले और वर्दीवाले में दोस्‍ती का रिश्‍ता होता है। अपनी दोस्‍ती के वास्‍ते कुछ भी करता है ये लोग। चोरी करता है, डाँका डालता है, खून करता है, बलात्‍कार करता है और क्‍या नहीं करता अपनी दोस्‍ती के वास्‍ते। लेकिन उसका कुछ नहीं होता। अदालत की ऊँची कुर्सी पर बैठकर और टेबल पर हथौड़ा ठोक-ठोककर आर्डर-आर्डर चिल्‍लाने वाला भी जानता है कि मामूली सी गलती भी उसे महँगी पड़ सकती है। जब खादी वाला कानून बनाता है, और वर्दीवाला चलाता है तो वो कौन है बीच में बोलने वाला।

अभी-अभी गोलियाँ चलीं हैं, चंद मिनट पहले, उसी जगह। दुकानें खुली हुई हैं, चायवाला भी है और पानवाला भी। आज भी किसी ने कुछ नहीं देखा। मैंने भी कुछ नहीं देखा। लेकिन आज तो इसे खुद ही गोली लगी है जरूर इसने सब कुछ देखा होगा। गोली चलाने वाले का चेहरा भी और हुलिया भी। ये तो छाती की बटन खोलकर एक-एक बात बताया है किसी से डरता ही नहीं। आँखें खोलकर रखा है। लेकिन देखो न जुबॉन को लॉक कर दिया है। कुछ बोल ही नहीं रहा है। आज सच्‍ची रिपोर्ट कौन लिखवायेगा। बाकी लोगों ने तो कुछ देखा ही नहीं। उन्‍हें कभी ये सब दिखायी ही नहीं देता। जिसने देखा है वह कुछ बोल भी नहीं रहा है। लगता है कि आज जान गया है कि सच बोलना गुनाह है।
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3 comments:

ganga said...

sach bolane ki saja ka kafi dardanaak chitran woh bhi unique language me. very nice.kalam sasakt hai.

antuni said...

sachmuch सच बोलना गुनाह है। interesting story.diwali ki sabhkamna.

Nirmla Kapila said...

सही कहा सच बोलना आजकाल गुनाह सा ही हो गया है। और सजा भी सच बोलने वाले को मिलती है प्रसंग अच्छा है बधाई दीपावली की शुभकामनायें