Friday, July 9, 2010

क्रांतिदूत की कलम से......जातिगत दिवारों का पक्कीकरण

मित्रों, क्रांतिदूत की कलम चलती ही रहेगी. यह कलम अपने शब्दों को लघुकथा, कविता या किसी अन्य वर्गीकरण में नहीं रखना चाहती. वर्गीकरण शब्द का साकारात्मक उद्देश्य सिर्फ़ विवाद की संभावना को निरस्त करना होता. यदि विवाद की संभावना वर्गीकरण के कारण बढ जाये तो वर्गीकरण को नाकारात्मक मानकर वर्गों को समाप्त कर देना चाहिये. इसी नजरिये से जब समाज की ओर देखें तो जातिवाद की ओर ध्यान जाता है. एक ही धार्मिक मान्यताओं के बीच लोगों को कितनी जातियों में बांट दिया गया. बांटते समय वर्गीकरण का उद्देश्य साकारात्मक था यह सभी जानते हैं. यह भी सभी लोग मानते हैं कि जातिवाद आज हजारों विवादों को जन्म दे रही है. सभी चाहते हैं कि काश, जातिवाद नहीं होता.......सिर्फ़ यह चाहना भी पर्याप्त है...क्योंकि इसके बाद का जो रास्ता है उसे विजय की संभावना कहते हैं और फ़िर अंत मे जो जाति-विहीन समाज का लक्ष्य है वह विजय है..

निश्चय ही जाति-विहीन समाज का निर्माण बहुत ही सुखमय होगा और उससे भी अधिक सुखमय होगा वहां तक पहुंचने का रास्ता. फ़ुलवारी से अधिक रमणीय फ़ुलवारी तक पहुंचने का रास्ता होता है. उत्साह ,जिग्याशा , खुश होने की ईच्छा आदि भावनायें फ़ुलवारी तक पहुंचने के रास्ते को फ़ुलवारी से भी अधिक प्यारा बना देता है. यदि कोई आकाश छुना चाहता है तो छू कर देखे उसे पता चल जायेगा कि आकाश मे होने की खुशी से ज्यादा खुशी जमीन से आसमान की ओर छलांग मारने में मिलता है. जब रास्ता भी सुन्दर और लक्ष्य भी तो हमें जरुर आगे बढना चाहिये. हमारी सोच के जिस हिस्से में जातिवाद जम चुका है उस हिस्से से जातिवाद निकालकर फ़ेंक देना चाहिये. न ही कोई अगङा न ही कोई पिछङा, न ही कोई ब्राह्मण न ही कोई दलित. जाति बने तो किसानों कि, मजदूरों की, डाक्टरों की, ईंजिनियरों की...जो अपनी जाति को समाज के निर्माण हेतु समर्पित कर दे.

इस बार जाति-आधारित जनगणना की जा रही है.पृष्ठभूमि की ओर देखें तो सन उन्नीस सौ एकतीस में जाति-आधारित जनगणना की गयी थी. फ़लतः अंग्रेजी सरकार को कम से कम अतिरिक्त दस वर्ष का जीवनदान मिला था. यदि आज के शासकों में अंग्रेजों की तरह उत्कट कुटिल इच्छा-शक्ति होगी तो उनका शासन अमरत्व प्राप्त कर सकेगा. मुझे यह गंभीर आशंका है कि जातियों के प्रमाणिक और सत्यपूर्ण आंकङे ऐसे विषैले बीजों की तरह होंगे जो पूरे देश को जहरीला कर देगी........सभी जातियों को मिलाकर कई सारी जातियां बनेगी जिसमे से कोई जाति फ़िर से देश पर राज करेगा,कोई जाति आध्यात्म और पाखंड का सहारा लेकर सबको नचायेगा, कोई जाति अपनी मर्जी से व्यवसाय करेगा और किसी जाति को पांव से कुचक दिया जायेगा.

मुझे देश के जन-प्रतिनिधियों से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि यह कलम खामोश नहीं होना चाहती.....लेकिन यह जरुर कहुंगा कि दूर-दृष्टि की कमी अवश्य दिखता है. निकट परे मोतियों को चुनने के लिये दूर परे हीरों की अनदेखी की जा रही है.जाति-आधारित जनगणना से सत्ता तक पहुंचने का रास्ता सुलभ हो सकता है लेकिन सत्ता संभालना नहीं. इस जनगणना के दुष्परिणामों की अनदेखी करना अनुचित और मूर्खतापुर्ण है.जातिवाद के परिणाम नक्सलवाद, जातिय हिंसा, भेद-भाव, छुआछुत , वोट की राजनीति आदि रुपों मे पहले से ही दिख रहा है.अब मिट्टी की कच्ची दीवारों का पक्कीकरण किया जा रहा है जिसकी छतों से कूदकर समाजिकता दम तोङ देगी...

क्रमशः...........

Thursday, July 8, 2010

क्रांतिदूत की कलम से......जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?

यह कलम आग ही उगलती है. अन्य कलमों की तरह इसमें भी स्याही ही डाली गयी है, फ़िर भी पता नहीं क्यों यह आग ही उगलती है. शायद चिंगारी बनना चाहती हो, खुद जलकर भी. एक ऐसी चिंगारी जो घरों में रोशनी पैदा करे, चेहरों पे चमक लाये, कमजोरों को रास्ता दिखा सके और भूखे चुल्हों को थोङी सी गर्मी दे सके. एक ऐसी चिंगारी जो क्रांति की आग का केन्द्रक बन जाये. एक ऐसी चिंगारी जो देश-भक्ति की आग को जन्म दे. एक ऐसी चिंगारी जिसकी लपटों से सारी बुराईयां जलकर खाक हो जाये.........पर कमवख्त नहीं जानती कि ऐसी कलमें जो चिंगारी पैदा करती है उन्हें जमीन के नींचे दबाकर उसके वजूद को ही खत्म कर दिया जाता है ताकि वह फ़िर किसी आग के लिये चिंगारी न बन पाये. इसलिये इसका भी हश्र वही होगा पर यह भी सच है कि यह जितना सोना होगा उतना ही खङा उतरेगा. कितनी अजीब बात है कि कोई कितना भी सोना हो जाये मरने के बाद तो जलना ही होता है..आग के बीचों-बीच आग बनकर. यदि जीते-जी कोई अपने भीतर थोङी सी आग ले ले तो पता नहीं कितनी रोशनी पैदा हो जायेगी. मरते वक्त इंसान की मजबूरी, नंगी जमीन पर लेट जाने की बाध्यता, अपाहिज की तरह चार कंधों पर उठकर जाने की लाचारी और जलकर खाक हो जाने जैसा अंत होना ही है तो फ़िर जीते-जी डर कैसा, मजबूरी और लाचारी कैसी...?

जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?
क्यों डर से सहमी हैं आंखें.
पिंजरों मे क्यों कैद हैं पांखें.
बेचा दिल और गुर्दा क्यों?
जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?

ऐसी भी क्या थी मजबूरी
कि इतनी बङी जिंदगी हारी.
ऐसे क्यों लाचार हुए
इतने कंधों पर बैठ गये.
जब भीख मांगकर ही खाना था
फ़िर पायी इतनी उर्जा क्यों?
जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ?


बन सकते हो किसी का सहारा
मां का प्यारा राज दुलारा
झुकाकर ही सर जब जीना था
तो खाया दूध का कर्जा क्यों?
जिंदा हो पर मुर्दा क्यों ? क्रमशः...........

Wednesday, July 7, 2010

आंसू

जानती हूं परेशान हो
मेरे बह निकलने की आदत से.
आंखों से निकलते ही
फ़ेंक डालते हो
सूखी जमीन पर कचङों के जैसे.
पर मेरी बफ़ादारी तो देखो
जब भी तुम तन्हा होते हो
आ जाती हूं बिना बुलाए.
अक्सर भरी महफ़िल में भी
मैं तुम्हें तन्हा पाती हूं
तब भी चली आती हूं.

मुझ पर तरस खाकर
एक बार मुझसे प्यार करके देखो
तन्हाई में भी
तुम्हें महफ़िल नजर आयेगी.

Tuesday, July 6, 2010

कोठा (भाग-तीन)----जिस्म और जमीर

आज एक वर्दीवाला पुलिस शराब पीकर कोठे पर पहुंचा. जाते ही नोटों कि गड्डी पुतलीबाई के हाथों में पकङा दिया.कहने लगा--"मुझे सबसे खूबसूरत जिस्म चाहिये". "जानती हूं कीमत को देखते ही समझ गयी थी.अच्छा पीस नहीं दिया तो जेल के अन्दर भी डाल सकते हो.पुलिस वाले हो ना..."----कहते हुए पुतलीबाई हंसने लगी. कुछ देर के बाद वह किसी कमरे से बाहर निकला और पुतलीबाई के पास आकर बोला--"बहुत सही सौदा करती हो तुम".
पुतलीबाई कहने लगी---"साहब हमारा सौदा इसलिये सही होता है क्योंकि हम सिर्फ़ अपना जिस्म बेचते हैं ईमान नहीं".वह कुछ सोचने लगी फ़िर बोली---".....और आप जिस्म के लिये अपना जमीर बेच देते है. हमारा जिस्म घायल होता है और आपके जमीर के टुकङे होते हैं. हम वजन के दर से जिस्म का सही कीमत वसुलते हैं पर आप जमीर की कीमत जानते ही नहीं.क्योंकि आपको जमीर का वजन ही नहीं पता. इसलिये चंद रुपयों में ही बेच दिया करते हैं.
.................फ़िर अंत में हमारा जिस्म मर जाता है और आपका भी.पर आपके पास तब कुछ नहीं बचता, आपका जमीर तो पहले ही मर चुका था.........".वह पुलिसवाला बहुत पहले वहां से जा चुका था.पुतलीबाई स्वयं से बात कर रही थी.

Monday, July 5, 2010

आज भारत बंद है.

नहीं बिकेगी आज
मंहगे गेहूं के दाने.
नहीं निकलेगा धुआं
मंहगे पेट्रोल के जलने से.
न ही आसमान में कालिख पुतेंगे
क्योंकि आज भारत बंद है.

आज किसी रेल को
केनवाली वीयर के डब्बों की तरह
नहीं फ़ेका जायेगा
पटरियों के इर्द-गिर्द.
नहीं मारे जायेंगे इंसान
बीचो-बीच अपने लक्ष्य के
क्योंकि आज भारत बंद है.

आज बैंक अधिकारी नहीं खायेगा
कर्ज देने के बदले रिश्वत.
आज नहीं होगी चहलकदमी
मंत्रालयों में दलालों के.
सदा की तरह अदालतों में
आज भी नहीं मिलेगा इंसाफ़.
पहले की तरह आज भी
दबी रह जायेगी गरीबी फ़ाईलों में.
क्योंकि आज भारत बंद है.

हां कुछ बेरोजगारों को
मिलेगा एक दिन की रोजी.
चन्द सिक्कों से गरीबों के घर
आज फ़िर जलेगा मनहूस चुल्हा.
आज फ़िर बङे नेताओं के घर
खायी जायेंगी मंहगी घी से सनी
राजनीति की गरमागरम रोटियां
क्योंकि आज भारत बंद है.

Friday, July 2, 2010

कोठा (भाग-दो)----सावित्री की ईज्जत

सहेली के साथ खेलते-खेलते शाम हो चला था. दस साल की सावित्री जैसे ही घर पहुंची उसकी मां ने उसे बाल पकङकर खींचा और जोरदार थप्पर लगाया---"कितनी बार समझाया है कि शाम ढलने से पहले घर आ जाया कर. दिन की रोशनी में मर्द बने लोग शाम के अंधेरे मे भेङिये बन जाते हैं जो सिर्फ़ जिस्म नोंचना जानते हैं और किसी की इज्जत का वो हाल करते हैं किबेचने के लिये भी इज्जत नहीं बचता और खुद के जीने के लिये भी.". सावित्री अपने बचपन की यादों में खो गयी थी. तभी पुतलीबाई ने उसे बाल पकङकर खींचा और जोरदार थप्पर मारते हुए कहा---"कितनी देर से चिल्ला रही हूं...जल्दी से कमरा नम्बर तीन में जा और गाहक को निपटा. उनको अपने शादी की सालगिरह पार्टी में जाना है".

सावित्री के जिस्म को सिर्फ़ चोट लगा था. थप्पर तो ईज्जत ने खायी थी ,वह भी मां के हाथ से , कभी बचने के लिये तो कभी बिकने के लिये.

क्रमशः

(मित्रों मुख्य शीर्षक "कोठा" के अन्तर्गत एक लघुकथा शृंखला लिख रहा हूं जिसके एक भाग दुसरे भाग से संबद्ध नहीं है.एक प्रयास है कुछ अनछुए पहलुओं को बाहर लाने का, वेश्या-वृति को हतोत्साहित करने का और पुरुषों के मानसिक विकृतियों को सही पुरुषार्थ की ओर दिशा देने का...........कृपया अपने टिप्पणियों के जरिये उचित सलाह देते रहें)

Thursday, July 1, 2010

कोठा (भाग-एक)----काश तुम हिजङे होते.

आज बाप और बेटा दोनो एक साथ कोठे पर आया. पुतलीबाई से लङकी देने को कहा. किसी एक के साथ बेटा एक कमरे में चला गया. पुतलीबाई ने उसके बाप से कहा--" बेटा को तो सही जगह पे पहुंचा ही दिया. अब तुम यहां क्या कर रहे हो...?...जाओ अपने घर ". बाप खिसियाकर बोला-" मैं तुम्हें हिजङा नजर आता हूं क्या? ". पुतलीबाई का गुस्से से खून खौल उठा---"अरे जा जा हिजङों की बराबङी करता है. तुम मर्दों ने भगवान के दिये हुए हथियार को भांजने के सिवा किया ही क्या है, हिजङों से अलग. इतने महान तो हिजङे ही होते हैं जो यह जानते हैं कि हम भी किसी के मां, बहन और बेटी होते हैं. काश... तुम हिजङे होते तो किसी भी सूरत मे अपने बेटे के साथ कोठे पर नही आते".

क्रमशः.........

(मित्रों मुख्य शीर्षक "कोठा" के अन्तर्गत एक लघुकथा शृंखला लिख रहा हूं जिसके एक भाग दुसरे भाग से संबद्ध नहीं है.एक प्रयास है कुछ अनछुए पहलुओं को बाहर लाने का, वेश्या-वृति को हतोत्साहित करने का और पुरुषों के मानसिक विकृतियों को सही पुरुषार्थ की ओर दिशा देने का...........कृपया अपने टिप्पणियों के जरिये उचित सलाह देते रहें)