Monday, October 25, 2010

अक्सर ही बह जाता हूं.

नहीं जानता मैं रुक जाना
बाधाओं से डर झुक जाना
मैं तो पानी की धारा जैसे
अक्सर ही बह जाता हूं.

पता नहीं किसने कब रोका
मेरी छाती पर भाला भोंका
खुद ही अपनी मरहम बन
दुख सारी सह जाता हूं.


मेरे भी हजारो सपने हैं
हर कोई मेरे अपने हैं
मैं अपनों को दे ऊंचाई
चलता ही रह जाता हूं.



खामोशी मेरी आदत है
चुप रहना ही इबादत है
कलम की धार से ही मैं
सब कुछ कह जाता हूं.

11 comments:

यश(वन्त) said...

भावों की सशक्त अभिव्यक्ति!

संजय भास्कर said...

सभी ही अच्छे शब्दों का चयन
और
अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने.

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

विवेक Call me Vish !! said...

शुरू की चार पंक्तियो में ही साडी कहानी कह दी ......आपने !

बधाई हो ..
जय हो मंगलमय हो

Shekhar Suman said...

बहुत ही प्यारी और ख़ूबसूरत सी रचना है...
इतने अच्छे लेखन के लिए बधाई स्वीकार करें...

मेरे ब्लॉग पर इस बार
अग्निपरीक्षा ....

ZEAL said...

पता नहीं किसने कब रोका
मेरी छाती पर भाला भोंका
खुद ही अपनी मरहम बन
दुख सारी सह जाता हूं...


Quite motivating !!

.

Parul said...

apni khamoshi se
kamjor ho pata nahi
kalam ki dhaar se
hi sab keh jata hoon :)
gud one!!

Majaal said...

बहुत अच्छे , लिखते रहिये ....

मो सम कौन ? said...

बहते रहिये, बंधु।

kshama said...

नहीं जानता मैं रुक जाना
बाधाओं से डर झुक जाना
मैं तो पानी की धारा जैसे
अक्सर ही बह जाता हूं.
Bahut khoob...lekin ant me kyon virodhabhas hai?

arvind said...

@parulji@kshamaji

aapke salaah ke anusaar maine jaruri sudhaar kar diya hai...sujhaav ke liye dhanyavaad.