Monday, February 22, 2010

भ्रष्टतंत्र का बाबू साहेब

एक छोटी सी भूल भी आपकी नौकरी खा सकती है.विजिलेंस विभाग आज के समय में इतनी सशक्त हो गयी है कि बडे से बडे गुनहगारों को भी अभयदान दे सकती है और मानवीय गलतियों के लिये भी नौकरी से निकाल सकती है. यह बात छोटे-मोटे बाबू लोग विल्कुल नही समझते.कुछ दिनों पहले रोज की तरह बाबू टिकट काट रहा था. लोग पंक्ति मे खडे थे.तभी अचानक तीन लोग एक दुसरे के समानान्तर खडे होकर टिकट मांगने लगे. बाबू नें पहले तो एक-एक कर टिकट लेने को कहा फ़िर आग्रह करने पर तीनों से पैसे लेकर एक साथ टिकट देने को तैयार हो गया.अभी बाबू नें एक ही टिकट काटा था कि विजिलेंस का छापा पड गया.विजिलेंस ने पाया कि बाबू के पास टिकट के हिसाब से ज्यादा रुपये थे.प्राथमिकी दर्ज की गयी.जांच के दौरान बाबू अपने आप को निर्दोष साबित नहीं कर पाया.न ही किसी की सिफ़ारिश ली और न ही युनियन के नेताओं को बचाव हेतु मध्यस्थ बनाया.मामले की गंभीरता को देखते हुए बाबू को नौकरी से हटा दिया गया.

यदि वह नौकरी के दौरान भ्रष्ट रहा होता तो कुछ दिन घर पर बठकर भी रोटी-मक्खन खा सकता था,लेकिन ईमानदारी की कमाई मे बरकत कहां होती.......जो उसे घर बैठे रोटी मिल पाता.उसे एक विजिलेंस अधिकारी नें बताया था कि उनके उपर भी कुछ मामले निश्चित रुप से बनाते रहने का दबाब रहता है.काफ़ी मशक्कत करने के बाद विभाग नें उसे पदावनति कर नौकरी वापस कर दी.

बाबू ने नौकरी की दुसरी पारी काफ़ी शानदार ढंग से शुरु किया.वह बाबू से बाबू साहेब बन गये.कुछ ही दिनों में बाबू साहेब युनियन का नेता बन गया.विजिलेंस के साथ उनके संबंध मधुर हो गये.विभाग के सभी कर्मचारी और अधिकारी उससे प्रसन्न रहने लगे और कभी दो वक्त की रोटी के लिये तरसनेवाला अब निश्चिंत रहने लगा कि दो पुस्त तक यदि उसके घर में किसी को नौकरी न भी मिले तो भी वह आराम से रोटी और मक्खन खा सकता है.कुछ दिनों के बाद विजिलेंस सप्ताह मनाया गया.बाबू साहेब नें भी अपना भाषण पेश किया. उसने सभी विभागों के क्रिया-कलापों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और विभाग के प्रति लोगों की निष्ठा औए ईमानदारी की सराहना की.साथ ही साथ उसनें राष्ट्र के प्रगति में सभी लोगों के योगदान की चर्चा करते हुए विभिन्न उपलब्धियों हेतु बधाई दी.तालियों की गडगडाहट के बीच बाबू साहेब मंच से नीचे उतरकर सीधे अपने कार्यालय आ गये.पहले रिवोल्विंग कुर्सी को बांये हाथ से नचाया फ़िर उसे रोककर उसपर आराम से बैठ गये.

तभी एक आदमी मिलने आया.बात ही बात मे वह कहने लगा "बाबू साहेब ,प्रजातंत्र मे तो सबको अपनी बात कहने का हक है".अचानक पहले की कुछ बातें बाबू साहेब को याद आ गयी.बाबू साहेब कहने लगे----------"किताबी बातें मत करो.......प्रजातंत्र...? कौन सा प्रजातंत्र..? कैसा प्रजातंत्र....? हमारे देश मे तो भ्रष्टतंत्र चलता है.भ्रष्टों के द्वारा, भ्रष्टों के लिये और भ्रष्टों पर किया गया शासन भ्रष्टतंत्र.. सदाचार की जगह कदाचार, निष्ठा की जगह दलाली, शासन के बदले जुर्म, देश-भक्ति के बदले धोखा----यही हैं इस भ्रष्टतंत्र के गुण.इस तंत्र मे खाने-पीने का सामान मंहगा बिकता है, वोट ,न्याय, और भावनायें सस्ते मे बिक जाती है. इस तंत्र मे भ्रष्ट लोग महलों में रहते हैं, बांकी लोग झोपडी के कुत्ते (स्लमडाग) कहलाते हैं.इस तंत्र मे छिनकर खानेवालों को पांच सितारा होटल में ठहराया जाता है और मांगकर जिंदगी बितानेवालों को रेलवे प्लेटफ़ोर्म से भी खदेड दिया जाता है. इस तंत्र मे निर्लज्ज भ्रष्ट लोग चौराहे पर औरत के जिस्म की खरीददारी करते हैं और छे्डखानी के शिकार औरतें पुलिस और अदालत के लोगों के द्वारा न्याय के बदले अपना ईज्जत बांटनें के लिये विवश हो जाती हैं. इस तंत्र में ईमानदार बुकिंग क्लर्क बाबू कहलाता है और भ्रष्ट टिकट क्लर्क बाबू साहेब."

2 comments:

निर्मला कपिला said...

इस तंत्र में ईमानदार बुकिंग क्लर्क बाबू कहलाता है और भ्रष्ट टिकट क्लर्क बाबू साहेब." बिलकुल सही बात कही बहुत अच्छी लगी ये पोस्ट । शुभकामनायें

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बहुत खूब, धमाकेदार कहानी, प्रससंशनीय !!!!!