Thursday, February 18, 2010

स्वर्ग की यात्रा-टिकट

आखिर स्वर्ग किसे अच्छी नहीं लगेगी.स्वर्ग तो आखिर स्वर्ग ही है तभी तो लोग उसे स्वर्ग कहते हैं.स्वर्ग जाने के लिये बडे से बडे अपराधी भी कुछ न कुछ पुण्य का काम कर ही लेता है.मिला-जुलाकर सभी स्वर्ग की चाहत रखते हैं.......लेकिन स्वर्गानन्दजी की बात अलग थी.वह सभी इच्छुक लोगों को मुफ़्त स्वर्ग का टिकट देना चाहते थे,वैसे ही जैसे कभी-कभी रेलवे और दिल्ली की सीएन्जी बसें टिकट तो गण्तब्य की देते हैं लेकिन लोग मुफ़्त में स्वर्ग तक पहुंच जाते हैं.इस मामले मे बाबा स्वर्गानन्दजी अधिक उदार थे .स्वर्ग की यात्रा टिकट जारी करने का लाइसेंस तो आखिर भगवान ही दे सकते थे और आज के प्रोफ़ेसनल युग में बाबा के लिये कोई भी लाइसेंस लेना बांये हाथ का खेल था.घूस देना,मिठाई खिलाना,शराब पिलाना,कमीशन बांटना,चापलुसी करना आदि कई हथियारों का सफ़ल प्र्योग करने में उन्हें महारत हासिल था,लेकिन पहली बार उन्होनें भगवान को पटाने की कोशिस की और उनके सारे हथियार विफ़ल हो गये. आज के भ्रष्ट युग, क्षमा करें प्रोफ़ेसनल युग में जब मां भी बच्चों को डिब्बे मे बंद मिलावटी दुध ही पिलाती है,भगवान की ईमानदारी और न्याय करने की निष्ठा देखकर बाबा व्यथित हो गये.भगवान ने साफ़ संकेत दे दिया कि साधना और तपस्या के बिना लाइसेंस प्रदान नहीं किया जा सकता.कठोर साधना के बाद अचानक भगवान प्रगट हुए और बाबा स्वर्गानन्द जी की मनोकामना पुरी कर दी.मुफ़्त मे वाहन भी दिया गया,जिसपर बैठकर कोई भी स्वर्ग की यात्रा कर सकता था.

अब तो सिर्फ़ यात्रियों की जरुरत थी.बाबा सोच रहे थे कि सभी लोग कष्ट में ही जीवन बिता रहे है ऐसे में कौन स्वर्ग नहीं जाना चाहेगा.गरीब किसान, मजदूर,बूढे लोग,बेरोजगार नौजवान, पति और सास से पडेशान महिलायें--- सभी स्वर्ग जाना चाहेंगे.आखिर उन्हें दुख से मुक्ति जो मिलेगी.बाबा ने सबसे पहले एक गरीब किसान से स्वर्ग चलने को कहा.उसने जबाब दिया-"बाबा, अभी-अभी तो मैनें शादी किया है.एक बार एक बच्चे का बाप बन जाऊं उसके बाद चलुंगा.आप बुढे लोगों से क्यों नहीं कहते?" फ़िर उन्होंने एक वृद्ध से पुछा "दादा स्वर्ग चलेंगे?" वृद्ध ने जबाव दिया-" बेटे,यदि मैं स्वर्ग चला गया तो मेरे पोते-पोती को स्वर्ग कौन पहुंचायेगा? तुम नेतओं को स्वर्ग पहुंचाओ.उन्होंने तो सुख-भोग भी कर लिया है और किसी को उनकी जरुरत भी नही है." सलाह मानकर बाबा ने एक नेता से स्वर्ग चलने को कहा.नेताजी भी नहीं माने--"दो साल बाद चुनाव होना है.एक बार मंत्री बन जाने दो,फ़िर वादा करता हूं जहां कहोगे चलुंगा" बाबा समझ गये यह नेताजी के वायदे थे. नेताजी ने फ़िर कहा "तुम किसी पुलिसवाले को क्यों नहीं कहते ,वह तो वैसे भी नक्सलियों के गोली के शिकार होते रहते हैं".सो बाबा ने पुलिसवाले से भी बात की.पुलिस ने कहा " बाबा, पब्लिक की सुरक्षा के नाम पर आजकल अच्छी कमाई हो रही है.मेरे लिये तो हमारा देश ही स्वर्ग है.आप मीडियावाले से बात कीजिये वे समाचारों के लिये मुफ़्त मे भटकते रहते हैं.फ़िर बाबा स्वर्गानन्दजी नें एक पत्रकार से संपर्क किया.उनका जबाब था "हम यदि स्वर्ग चले गये तो दुनियां को खबर कौन देगा? फ़िर तो चन्द लोग सारी दुनियां को उल्लु बनाते रहेंगे.........और हमारी औकात आप नेता और पुलिस से कम मत आंकिये.हम कभी भी सच को झूठ और झूठ को सच बना सकते हैं.आजकल लेखकों और कवियों की हालत अच्छी नहीं है,उनकी किताबें कोई नहीं पढता".फ़िर लेखकों और कवियों सि भी पुछा गया. उनका जबाब था-"हमारे लिये नरक की कल्पना स्वर्ग के यथार्थ से अधिक प्रिय है बंधु."

सभी ओर से नाकारात्मक जबाब सुनकर बाबा व्यथित हो गये. उनका श्रम बेकार जा रहा था. उन्होंने इर से भगवान का आवाहन किया.भगवान बोले " वत्स कोई नही जाना चाहता तो तुम्ही चलो.बाबा बोले "नहीं प्रभु, मैं तो कदापि नहीं जाउंगा. एक मैं ही तो संसार का स्वरुप बदल सकता हूं."भगवान बोले-"वत्स मैं जानता था.स्वर्ग की यात्रा कोई नहीं करना चाहता. लोग गलत सोचते हैं कि संसार मे दुख ही दुख है.सच तो यह है कि संसार मे सुख ही सुख है.तभी तो मरने के बाद भी जब लोग स्वर्ग पहुंचते हैं पुनर्जन्म लेकर फ़िर से धरती पर आ जाते हैं.".

रचनाकार-
सोलोमन मार्टिन
सहायक सामग्री प्रबंधक
द.पु.म.रेल्वे,बिलासपुर.
छत्तीसगढ.

3 comments:

arvind said...

स्वर्ग की यात्रा कोई नहीं करना चाहता. लोग गलत सोचते हैं कि संसार मे दुख ही दुख है.सच तो यह है कि संसार मे सुख ही सुख है.तभी तो मरने के बाद भी जब लोग स्वर्ग पहुंचते हैं पुनर्जन्म लेकर फ़िर से धरती पर आ जाते हैं."......

बहुत अच्छा संदेश.शुभकामनायें

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बहुत सुन्दर, प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति, प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत बधाई!!!!!

ललित शर्मा said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति-
सब विधि के हाथ मे है।
आभार