Friday, January 22, 2010

चांद

मां बाजरे की रोटी पका रही थी.कच्चे लकडी के जलने से घर में धुआं फ़ैल चुका था.चारपाई पर पिताजी लेटे हुए थे.दस साल की बच्ची चुपके से घर से निकल पडी.आज पुर्णीमा की रात है.साहब के घर कविजन आए होंगे.कविताऎं गाऎंगे और पुरी-जलेबी खाऎंगे.उसे भी खाने को मिलेगा-यह सोचकर वह चुपके से साहब के कमरे मे आकर खडी हो गयी.एक कवि ने कहा "मेरे मह्बुब की तरह यह चांद भी खुबसुरत लग रहा है. इसक रंग भी उसके होठों की तरह लाल है."
तभी उसकी मां चिल्लाती हुई आई और उसके बालों को पकडकर खीचने लगी."उधर तेरा बाप बीमार है,घर मे खाने को कुछ भी नही है और इधर तु साहेब लोगों की कविता सुन रही है." फ़िर उसने खिडकी से झांकते हुए पुनम की चांद को देखा और कहने लगी "देखो तो आज ये चांद कितना बदसुरत लग रहा है,इसका रंग गर्म तवे की तरह लाल है."

2 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

.... बेहतरीन !!!!!

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

adbhutaas...

maine kal hui bloggers meeting kee charcha apne blog par kee hai... kripya aa kar kuchh sudhaar karein...

http://ab8oct.blogspot.com/