Wednesday, January 20, 2010

मयखाना और मोहब्बत

जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.

लोग यहां आते हैं , खूब आंसु बहाते हैं.
शराब के पैमाने मे मिलाकर पी जाते है.
गम कम नही होता,दर्द बढता ही जाता है.
दिल-जलों ने तो शराब की कीमतें बढायी है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.

बिना जाने ही गैरों को अपना बनाते हैं.
सैकडो वादे करते हैं,हजारो कसमे खाते हैं
मिले जो वक्त फ़ुरसत की तो सपने सजाते हैं
कभी सूरज उगाते हैं, कभी चंदा बनाते हैं
मगर जब आंख खुलती है नजारा और होता है
इस खेल मे हर सख्श ने बस जख्म खायी है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.

मोहब्बत और मयखाने के रिश्ते बताते है.
मजा दोनो मे आता है, नशा दोनो पिलाते है
शुरुआत मे दोनो जगह कहकहे लगाते हैं
मगर जब अन्त आता है तो लडखडाते हैं
फ़र्क इतना है कि शराब कभी धोखा नही देता,
और मोहब्बत के खून मे सिर्फ़ बेवफ़ाई है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.

4 comments:

अजय कुमार said...

इश्क और शराब का अच्छा मिलान कराया है

निर्मला कपिला said...

फ़र्क इतना है कि शराब कभी धोखा नही देता,
और मोहब्बत के खून मे सिर्फ़ बेवफ़ाई है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.
बहुत सही कहा है मगर श्राब भी तो धोखा दे जाती है सेहत बिगाड कर दोनो बेवफा हैं शुभकामनायें

arvind said...

शराब कभी धोखा नही देता,ऎसा कहने का तात्पर्य यह है कि शराब जो कुछ भी करता है वह सबको पहले से पता है.यह बुडा है लेकिन मोहब्बत की तरह बेवफ़ा नही.

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।