गीत-१, वह तेरी कहानी कहती है.
शिव तेरी जटा से गंगा की जो धारा बहती है, वह तेरी कहानी कहती है.
गिर पर्वत से सागर की लहरों से जो मिलती है वह तेरी कहानी कहती है.
कलकल धारा के शब्द नहीं
वह भाव हृदय के हैं तेरे.
आकार नहीं जल के होते
शायद श्वरूप हैं ये तेरे .
जग के पापों से भरकर भी जो निर्मल रहती है वह तेरी कहानी कहती है.
शिव तेरी जटा से गंगा की जो धारा बहती है, वह तेरी कहानी कहती है.
नहीं अलग होने का दुख
न ही मिलन की है खुशियां.
न ही सपनें नभ छूने के
है तल में ही उसकी दुनियां.
यमुना से पलभर के लिये जो संगम करती है वह तेरी कहानी कहती है.
शिव तेरी जटा से गंगा की जो धारा बहती है, वह तेरी कहानी कहती है.
कोई जो पथ उसका रोके
तो समझो उसका खैर नहीं
है इतनी विशाल उसकी छाती
है किसी जीव से वैर नहीं
मैलों से पीकर विष चुपचाप सहा जो करती है वह तेरी कहानी कहती है.
शिव तेरी जटा से गंगा की जो धारा बहती है, वह तेरी कहानी कहती है.
गीत-२, आज नहीं देखुंगी नाच तेरी भोले.
आज नहीं देखुंगी नाच तेरी भोले.
मेरी शपथ है जो आंख तुने खोले.
गरदन में तेरी है सांपों की माला
डरती बहुत है मेरी दुनियां आला
नांचोगे तुम तो छिप जाउंगी मैं
एक हाथ डमरु है एक हाथ भाला
तेरी पद-चापों से धरती भी डोले.
आज नहीं देखुंगी नाच तेरी भोले.
एक बूंद टपका तो जल जायेंगे सब
है कंठ तेरे या विष का है सागर.
खुली जो जटा तो खुलेगा खजाना
गंगा समेटे हो जैसे हो गागर.
आंखें हैं तेरी या आग के गोले.
आज नहीं देखुंगी नाच तेरी भोले.
शमसान में नांचते प्रेत सारे
कहते सभी हैं वे दास तुम्हारे
रुक जाती है तब हवा का भी बहना
जलता नहीं सुर्य छाते अंधेरे.
इससे तो अच्छा है और तु सो ले.
आज नहीं देखुंगी नाच तेरी भोले.
गीत-३, शिव पी के भांग भंगियाय गया.
मत पूछो आज क्या हाल भया
शिव पी के भांग भंगियाय गया.
एक चोर घुसा था मंदिर में
शिव पर गंगाजल डाल दिया.
संतुष्ट हुए भोले-शिव-शंकर
उसको धन का आशीष दिया.
भोले ने सबको सुलाय दिया
वह मूरत शिव की चुराय गया
शिव पी के भांग भंगियाय गया.
वह मूरत थी छोटी लेकिन
बढने लगी शिव की काया.
मूरत बढती थी कण-कण
हजार गुणा उसकी माया.
शिव भक्त के भाव चढाय गया
बुड्ढा इतना सठियाय गया
शिव पी के भांग भंगियाय गया.
वह बंद किया शिव को घर में
शिव का बढना फ़िर भी न रुका
वह चाहा शिव को नीलाम करे
पर मूरत न कोई खरीद सका
पागल बाबा खिसियाय गया
उस चोर को खुद में समाय गया.
शिव पी के भांग भंगियाय गया.
उस चोर ने जब आंखें खोली
खुद को शिव में ही वह पाया
जग शिव में कण-कण में शिव
माया में शिव-शिव में माया.
शिव चोर को साधु बनाय गया
उसे भक्ति का पाठ पढाय गया.
शिव पी के भांग भंगियाय गया
Wednesday, January 19, 2011
Friday, January 7, 2011
मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१६ (व्यंग्य)
चाहता तो नहीं था पर प्रतीक्षा जरूर कर रहा था उस घङी की जब मेरी साली और सालेजी पधारनेवाले थे.महिने भर पहले ही उनके आने का प्रोग्राम तय हो गया था, लेकिन जब दिल से इच्छा न हो और इन्तजार करना पङे तो महिने भर का समय मिनटों में कट जाता है. वे दोनों घर पर पधार चुके थे. पहले सालीजी का परिचय करवाता हूं. वह चिन्टी के नाम से जानी जाती हैं और सालेजी की संज्ञा राजा है. चिन्टी में मूलतः स्तनधारी वर्ग के लक्षण तो हैं ही ,उपर से परिस्थिति वश उभयचर और सरीसृप वर्ग के गुण भी परिलक्षित होते हैं. वह मोडर्न हैं और प्रगतिशील सोच रखती हैं. पर्दा-प्रथा के इतनी विरोधी हैं कि शरीर का बारह आना हिस्सा आसानी से दृष्टिगोचर हो जाता है. बांकी बचे शरीर के चौथाई हिस्से को भी इतने टाइट कपङों से ढकती हैं कि हवा का एक अणु भी उन हिस्सों को टच नहीं कर सकती. उनमें एक गुण यह भी है कि वह हर किसी से बात करती है. किसी को यदि भाव नहीं देती है तो नींचा भी नहीं समझती. खुले विचार की हैं....यही वजह है कि मैं थोङा सा डरा हुआ था. खूबसूरत लङकियों को गिद्ध की तरह देखना तो मर्दों का स्वभाव होता है. न ही मैं चिन्टी जी को अपने सौन्दर्य को ढकने की सलाह दे सकता हूं और न ही मर्दों के स्वभाव में परिवर्तन की आशा कर सकता हूं. सालीजी भी हैं मिलनसार स्वभाव की...जिसका गलत फ़ायदा उठाकर आस-परोस के लोग उनसे घुलने-मिलने की कोशिस करेंगे और ऐसे व्यवहार करेंगे जैसे वह पूरे मुहल्ले की साली हो...मैं कैसे न डरूं..?
आज सबेरे की बात है. मैं बिस्तर पर लेटा था .वह मोर्निंग टी लेकर आयी और मुझे जगाते हुए कहा---"गुड मोर्निंग जीजू....".मैं जगा तो लगा जैसे सपने देख रहा होऊं.इससे पहले रोज सबेरे एक सा चेहरा देखते-देखते थक गया था. नींद तो पहले भी खुल जाया करती थी लेकिन डर से. पर चिन्टीजी के नरम-नरम हाथों से गरम-गरम चाय के साथ मोर्निंग शेक-अप और विशेज सचमुच सपनों जैसा ही था. आंख खुली तो उनका खूबसूरत मेक-अप वाला चेहरा लाजवाब दिख रहा था. मैं तो देखते ही रह गया पर हाथ की ऊंगली चाय की तरफ़ बढने लगी...पर उसने झट से मेरी ऊंगली पकङकर अपनी ओर खींच लिया और प्यार से बोली----" पहले दो ग्लास पानी फ़िर चाय----और कल से दो के बदले तीन ग्लास पानी और नो चाय." वह इतने प्यार से बोल रही थी कि मैं मना नहीं कर सका. दो ग्लास पानी पी लेने के बाद पेट फ़ुटबाल की तरह लग रहा था. इससे पहले की वह पंक्चर होता सोचा खुद वाल्व को दवाकर प्रेशर कम कर लिया जाये. मैं फ़टाफ़ट चाय पीकर शौचालय की ओर निकलने लगा. वह बोली---" जीजू मैं मोर्निंग वाक करने जा रही हूं.." मैंने डरते हुए सवाल किया-----" मोर्निंग वाक इन आधे कपङों में...?" उसने निडर होकर सीधा जवाब दिया----"जीजू यदि पूरे कपङे पहनकर मोर्निंग वाक करुंगी तो आक्सीजन बोडी के भीतर कैसे जायेगा..?. मैं ज्यादा समझाता तो वह शायद और भी कपङे कम कर देती सो चुप ही रहा.
मैं जैसे ही फ़्रेश हुआ मन में एक डर सा पैदा हो गया. मुहल्लेवालों को अच्छी तरह जानता हूं. मैं फ़्रेश होकर पार्क की ओर निकल पङा. वह पार्क जो मोर्निंग के समय नोर्मली खाली ही रहता है आज मुहल्ले के लोगों से खचा-खच भरा हुआ था. चिंटीजी आगे-आगे ज्यादा स्पीड से वाक कर रही थी बांकी मुहल्लेवाले धीरे-धीरे टहल रहे थे. खुद धनन्जय बाबू तबले जैसी तोंद लेकर इस प्रयास में तेज चलने की कोशिस कर रहे थे कि किसी तरह चिन्टी के नजदीक पहुंच सकें. वह पांच सौ मीटर परिधि के पार्क के पांच चक्कर लगायी और वापस घर चली गयी. मैंने धनन्जय बाबू से पूछा---" आप कबसे मोर्निंग वाक करने लगे..?". उन्होंने शरमाते हुए कहा---" बस आज यूं ही मन किया".. मैं तो समझ ही रहा था कि आज सुबह में टहलने का उनका मन क्यों किया. कुछ देर के बाद मैं भी घर पहुंचा और गुस्से को खुद में समेटते हुए चिन्टीजी से पूछा---" चिन्टीजी ये तमाशा करने की क्या जरुरत थी..?". वह मुस्कुराते हुए बोली---"जीजू सुबह में टहलना तमाशा थोङे ही होता है.". मैंने समझाया--- " टहलना तमाशा नहीं होता लेकिन मुहल्ले के सारे जेन्ट्स जो आपको फ़ोलो कर रहे थे वह तमाशा जरूर था.. आपको नहीं पता है कि ये जेन्ट्स (मर्द लोग) वो वाले जेन्ट्स (राक्षस) हैं . ये सभी आपको घुर-घुर कर देख रहे थे.." वह बोली----" जीजू अब मैं बच्ची नहीं हूं सब बात जानती हूं....लेकिन मैं तो इन सबसे...आपसे भी मोर्निंग वाक करवा रही थी. यह हेल्थ के लिये बहुत जरूरी है."
मैं भी मान गया चिन्टीजी की सोच को. मैंने कहा----चिन्टीजी सचमुच आप बहुत प्यारी हैं. बहुत बढिया सोचती हैं. आपके विचारों को मैं दाद देता हूं.". खुले तौर पर प्रशंसा सुनकर वह थोङा गुस्सा और थोङी खुशी को मिक्स करते हुए बिना आंसू और दर्दवाली स्टाइल में रोते हुए सिर्फ़ इतना बोली---- " जी.........जू.........आप भी न.." तब तक श्रीमती जी आ गयीं-----" क्यों तंग करते हो मेरी चिन्टी को..?"
मैंने कहा---" अरे मैं तो प्रशंसा कर रहा था...मैं तो इनकी सोच को दाद दे रहा था...". वह बिगङ गयी--- " देखो जी....किसी को भी दाद ,खाज, खुजली देने की जरुरत नहीं है..ये फ़ैलनेवाली बिमारियां होती है."
...."क्या तुम भी सोचती हो...मैं ये दाद नहीं वो दाद दे रहा था "
...." ये दाद...वो दाद क्या होता है. दाद तो एक ही होता है न..?"
...." डार्लिंग मुझे सफ़ाई तो देने दो कि मैं कौन सा दाद दे रहा था ?"
...." सफ़ाई होती तो तुम्हें दाद थोङे ही होता....और किसी तरह हो भी गया तो उसे बांटने की जरुरत नहीं है. दाद की दवा ले आओ".
तब तक ससुरजी भी आ गये और वह अपनी प्रतिकृया न दें यह कैसे हो सकता था---"किस को दाद हो गया?" उनको उत्तर देने से अच्छा था कि मंच छोङकर नेपथ्य की ओर निकल जाना. मैं वहां से खिसक लिया..श्रीमतीजी कहने लगी----"आपके दामादजी को दाद हो गया है". चिन्टी समझाने लगी---" अरे दीदी, जीजू मेरे विचार से खुश होकर मुझे दाद दे रहे थे.". ससुरजी बोले---" खुशी से या नाराज होकर दाद का प्रसार करना अच्छी बात नहीं है. यह बहुत ही खतरनाक बिमारी है जो भ्रष्टाचार की तरह जब फ़ैलती है तो फ़ैलती ही चली जाती है. सरकार ने भी हैजा , चेचक , पोलियो आदि संक्रामक रोगों से बचाव के लिये लोगों को टीके लगवाती है. एड्स जैसी जानलेवा बिमारी भले ही बढती चली गयी हो अवेयरनेस तो करवा ही रही है. सर्दी जुकाम जैसी रोगों से बचाव के लिये स्वयं मलायका अरोङा जैसी हस्तियां झंडू बाम बन जाती है. उनके विचारों से तो ऐसा लगता है कि यदि किसी को एक बार भी छींक आ गयी तो वह छींकनेवाले डार्लिंग के सामने झंडूबाम बनकर प्रस्तुत हो जायेंगी. उनका नृत्य तो इतना एश्योर कर ही रही है. तभी मीडियावाले लगातार दाद की तरह फ़ैलनेवाली बिमारी करप्शन पर ध्यान फ़ोकस न करते हुए सारा कन्सेन्ट्रेशन विश्व के सबसे बङे प्रजातंत्र के छोटे-मोटे छींकों पर उङेल रही है. दाद और करप्शन को भले ही पब्लिसीटी नहीं मिल रही है फ़िर भी अन्दर ही अन्दर ये बिमारियां इतनी फ़ैल चुकी है कि पूरा का पूरा गुप्त प्रक्षेत्र ही डेन्जर जोन में आ गया है. देश के महान नेतागण और तथाकथित भद्रपुरुष खुद ही इन रोगों से ग्रस्त हैं सो इन्हें निर्मूल करना तो काफ़ी मुश्किल है...हां यदि वे खुलकर अपनी बिमारियों को दिखायें अर्थात पारदर्शिता लायें तो संभवतः प्रसार तो रुक ही जायेगी."
ससुरजी का भाषण जारी रहा----" जहां तक दाद और करप्शन के रोकथाम की बात है तो सबसे पहले रोगी दुष्कर्म करना बंद कर दें जब तक स्वयं इन रोगों से छुटकारा न मिल जाये...ये रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्पर्श होते ही तेजी से फ़ैलता है. दूसरी बात सरकार यह नियम बना दे कि दाद और करप्शन बाले हिस्से पर हाथ फ़ेरने के बाद बिना हाथ धोये सिस्टम के दूसरे हिस्से को टच न करें. ऐसी ही गलती के कारण दाद और करप्शन दिल्ली के राजपथ से मुम्बई के दलाल स्ट्रीट तक फ़ैल गयी. जब मीडियावाले खबर लेने पहुंचे तो निर्दोष होते हुए भी बेचारे इन रोगों के चपेट में आ गये. प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ में जंग क्या लगी कि देखते ही देखते कोई भी खंभा सोलिड न रहा. बढिया होगा सरकार दाद और करप्शन के रोकथाम के लिये कोई टीका इजाद करवाये. इसी टीके से बांकी सभी बिमारियां काबू में आ जायेगी."
जैसे ही ससुरजी ने अपना शोर्ट स्पीच बंद किया, लोकसभा की तरह तालियों की गङगङाहट से मेरा रेलवे क्वार्टर गूंजने लगा. मैं तो दूसरे कक्ष में माथा पीट रहा था. ससुरजीने मुझे माथा पीटते देखकर मेरी श्रीमतीजी को कहा---" दामादजी से कहो कि पहले हाथ को साफ़ पानी में साबुन से धो लें फ़िर माथा पीटें क्योंकि दाद और करप्शन जैसी बिमारियां हेड तक जब पहुंचती है तो पूरे सिस्टम को बरबाद कर देती है फ़िर आदमी हो या देश बचाना मुश्किल होता है.."
क्रमशः
आज सबेरे की बात है. मैं बिस्तर पर लेटा था .वह मोर्निंग टी लेकर आयी और मुझे जगाते हुए कहा---"गुड मोर्निंग जीजू....".मैं जगा तो लगा जैसे सपने देख रहा होऊं.इससे पहले रोज सबेरे एक सा चेहरा देखते-देखते थक गया था. नींद तो पहले भी खुल जाया करती थी लेकिन डर से. पर चिन्टीजी के नरम-नरम हाथों से गरम-गरम चाय के साथ मोर्निंग शेक-अप और विशेज सचमुच सपनों जैसा ही था. आंख खुली तो उनका खूबसूरत मेक-अप वाला चेहरा लाजवाब दिख रहा था. मैं तो देखते ही रह गया पर हाथ की ऊंगली चाय की तरफ़ बढने लगी...पर उसने झट से मेरी ऊंगली पकङकर अपनी ओर खींच लिया और प्यार से बोली----" पहले दो ग्लास पानी फ़िर चाय----और कल से दो के बदले तीन ग्लास पानी और नो चाय." वह इतने प्यार से बोल रही थी कि मैं मना नहीं कर सका. दो ग्लास पानी पी लेने के बाद पेट फ़ुटबाल की तरह लग रहा था. इससे पहले की वह पंक्चर होता सोचा खुद वाल्व को दवाकर प्रेशर कम कर लिया जाये. मैं फ़टाफ़ट चाय पीकर शौचालय की ओर निकलने लगा. वह बोली---" जीजू मैं मोर्निंग वाक करने जा रही हूं.." मैंने डरते हुए सवाल किया-----" मोर्निंग वाक इन आधे कपङों में...?" उसने निडर होकर सीधा जवाब दिया----"जीजू यदि पूरे कपङे पहनकर मोर्निंग वाक करुंगी तो आक्सीजन बोडी के भीतर कैसे जायेगा..?. मैं ज्यादा समझाता तो वह शायद और भी कपङे कम कर देती सो चुप ही रहा.
मैं जैसे ही फ़्रेश हुआ मन में एक डर सा पैदा हो गया. मुहल्लेवालों को अच्छी तरह जानता हूं. मैं फ़्रेश होकर पार्क की ओर निकल पङा. वह पार्क जो मोर्निंग के समय नोर्मली खाली ही रहता है आज मुहल्ले के लोगों से खचा-खच भरा हुआ था. चिंटीजी आगे-आगे ज्यादा स्पीड से वाक कर रही थी बांकी मुहल्लेवाले धीरे-धीरे टहल रहे थे. खुद धनन्जय बाबू तबले जैसी तोंद लेकर इस प्रयास में तेज चलने की कोशिस कर रहे थे कि किसी तरह चिन्टी के नजदीक पहुंच सकें. वह पांच सौ मीटर परिधि के पार्क के पांच चक्कर लगायी और वापस घर चली गयी. मैंने धनन्जय बाबू से पूछा---" आप कबसे मोर्निंग वाक करने लगे..?". उन्होंने शरमाते हुए कहा---" बस आज यूं ही मन किया".. मैं तो समझ ही रहा था कि आज सुबह में टहलने का उनका मन क्यों किया. कुछ देर के बाद मैं भी घर पहुंचा और गुस्से को खुद में समेटते हुए चिन्टीजी से पूछा---" चिन्टीजी ये तमाशा करने की क्या जरुरत थी..?". वह मुस्कुराते हुए बोली---"जीजू सुबह में टहलना तमाशा थोङे ही होता है.". मैंने समझाया--- " टहलना तमाशा नहीं होता लेकिन मुहल्ले के सारे जेन्ट्स जो आपको फ़ोलो कर रहे थे वह तमाशा जरूर था.. आपको नहीं पता है कि ये जेन्ट्स (मर्द लोग) वो वाले जेन्ट्स (राक्षस) हैं . ये सभी आपको घुर-घुर कर देख रहे थे.." वह बोली----" जीजू अब मैं बच्ची नहीं हूं सब बात जानती हूं....लेकिन मैं तो इन सबसे...आपसे भी मोर्निंग वाक करवा रही थी. यह हेल्थ के लिये बहुत जरूरी है."
मैं भी मान गया चिन्टीजी की सोच को. मैंने कहा----चिन्टीजी सचमुच आप बहुत प्यारी हैं. बहुत बढिया सोचती हैं. आपके विचारों को मैं दाद देता हूं.". खुले तौर पर प्रशंसा सुनकर वह थोङा गुस्सा और थोङी खुशी को मिक्स करते हुए बिना आंसू और दर्दवाली स्टाइल में रोते हुए सिर्फ़ इतना बोली---- " जी.........जू.........आप भी न.." तब तक श्रीमती जी आ गयीं-----" क्यों तंग करते हो मेरी चिन्टी को..?"
मैंने कहा---" अरे मैं तो प्रशंसा कर रहा था...मैं तो इनकी सोच को दाद दे रहा था...". वह बिगङ गयी--- " देखो जी....किसी को भी दाद ,खाज, खुजली देने की जरुरत नहीं है..ये फ़ैलनेवाली बिमारियां होती है."
...."क्या तुम भी सोचती हो...मैं ये दाद नहीं वो दाद दे रहा था "
...." ये दाद...वो दाद क्या होता है. दाद तो एक ही होता है न..?"
...." डार्लिंग मुझे सफ़ाई तो देने दो कि मैं कौन सा दाद दे रहा था ?"
...." सफ़ाई होती तो तुम्हें दाद थोङे ही होता....और किसी तरह हो भी गया तो उसे बांटने की जरुरत नहीं है. दाद की दवा ले आओ".
तब तक ससुरजी भी आ गये और वह अपनी प्रतिकृया न दें यह कैसे हो सकता था---"किस को दाद हो गया?" उनको उत्तर देने से अच्छा था कि मंच छोङकर नेपथ्य की ओर निकल जाना. मैं वहां से खिसक लिया..श्रीमतीजी कहने लगी----"आपके दामादजी को दाद हो गया है". चिन्टी समझाने लगी---" अरे दीदी, जीजू मेरे विचार से खुश होकर मुझे दाद दे रहे थे.". ससुरजी बोले---" खुशी से या नाराज होकर दाद का प्रसार करना अच्छी बात नहीं है. यह बहुत ही खतरनाक बिमारी है जो भ्रष्टाचार की तरह जब फ़ैलती है तो फ़ैलती ही चली जाती है. सरकार ने भी हैजा , चेचक , पोलियो आदि संक्रामक रोगों से बचाव के लिये लोगों को टीके लगवाती है. एड्स जैसी जानलेवा बिमारी भले ही बढती चली गयी हो अवेयरनेस तो करवा ही रही है. सर्दी जुकाम जैसी रोगों से बचाव के लिये स्वयं मलायका अरोङा जैसी हस्तियां झंडू बाम बन जाती है. उनके विचारों से तो ऐसा लगता है कि यदि किसी को एक बार भी छींक आ गयी तो वह छींकनेवाले डार्लिंग के सामने झंडूबाम बनकर प्रस्तुत हो जायेंगी. उनका नृत्य तो इतना एश्योर कर ही रही है. तभी मीडियावाले लगातार दाद की तरह फ़ैलनेवाली बिमारी करप्शन पर ध्यान फ़ोकस न करते हुए सारा कन्सेन्ट्रेशन विश्व के सबसे बङे प्रजातंत्र के छोटे-मोटे छींकों पर उङेल रही है. दाद और करप्शन को भले ही पब्लिसीटी नहीं मिल रही है फ़िर भी अन्दर ही अन्दर ये बिमारियां इतनी फ़ैल चुकी है कि पूरा का पूरा गुप्त प्रक्षेत्र ही डेन्जर जोन में आ गया है. देश के महान नेतागण और तथाकथित भद्रपुरुष खुद ही इन रोगों से ग्रस्त हैं सो इन्हें निर्मूल करना तो काफ़ी मुश्किल है...हां यदि वे खुलकर अपनी बिमारियों को दिखायें अर्थात पारदर्शिता लायें तो संभवतः प्रसार तो रुक ही जायेगी."
ससुरजी का भाषण जारी रहा----" जहां तक दाद और करप्शन के रोकथाम की बात है तो सबसे पहले रोगी दुष्कर्म करना बंद कर दें जब तक स्वयं इन रोगों से छुटकारा न मिल जाये...ये रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्पर्श होते ही तेजी से फ़ैलता है. दूसरी बात सरकार यह नियम बना दे कि दाद और करप्शन बाले हिस्से पर हाथ फ़ेरने के बाद बिना हाथ धोये सिस्टम के दूसरे हिस्से को टच न करें. ऐसी ही गलती के कारण दाद और करप्शन दिल्ली के राजपथ से मुम्बई के दलाल स्ट्रीट तक फ़ैल गयी. जब मीडियावाले खबर लेने पहुंचे तो निर्दोष होते हुए भी बेचारे इन रोगों के चपेट में आ गये. प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ में जंग क्या लगी कि देखते ही देखते कोई भी खंभा सोलिड न रहा. बढिया होगा सरकार दाद और करप्शन के रोकथाम के लिये कोई टीका इजाद करवाये. इसी टीके से बांकी सभी बिमारियां काबू में आ जायेगी."
जैसे ही ससुरजी ने अपना शोर्ट स्पीच बंद किया, लोकसभा की तरह तालियों की गङगङाहट से मेरा रेलवे क्वार्टर गूंजने लगा. मैं तो दूसरे कक्ष में माथा पीट रहा था. ससुरजीने मुझे माथा पीटते देखकर मेरी श्रीमतीजी को कहा---" दामादजी से कहो कि पहले हाथ को साफ़ पानी में साबुन से धो लें फ़िर माथा पीटें क्योंकि दाद और करप्शन जैसी बिमारियां हेड तक जब पहुंचती है तो पूरे सिस्टम को बरबाद कर देती है फ़िर आदमी हो या देश बचाना मुश्किल होता है.."
क्रमशः
Thursday, December 30, 2010
शुभ वर्ष बीस-ग्यारह की शुभकामनायें
शुभ वर्ष बीस-ग्यारह------- मंगल वर्ष बीस-ग्यारह------- नूतन वर्ष बीस-ग्यारह
नई आशाएं, नयी योजनायें, नये प्रयास, नयी सफ़लता, नया जोश, नई मुस्कान, नया वर्ष बीस-ग्यारह
समृद्धशाली, गौरवपुर्ण, उज्ज्वल, सुखदायक, उर्जावान, विस्मयकारी, स्मृतिपुर्ण नव वर्ष बीस -ग्यारह।
जीवन-मरण की सीमाओं मे बंधा हुआ नगण्य सा प्राणी मानव, काल-चक्र की द्रुतगति मे वीते वर्ष की परिधि बिंदु पर सांस लेता हुआ मानव, कालदेव की इच्छा-मात्र के अनुरूप अपने-अपने कर्तव्य एवम अधिकार के झंझावातों मे उलझा हुआ मानव और अन्य प्राणियों की भांति अपनी लघुतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कठिनतम प्रयास करता हुआ मानव का जीवन नव वर्ष बीस ग्यारह मे मंगलमय हो.
कालदेव नव वर्ष बीस ग्यारह के प्रत्येक क्षण आपके मुख-मंडल को दिवसदेव सुर्य की भांति तेजपूर्ण और कोमल पुष्प के समान प्रसन्नचित रखें. समय की धारा तरंगमयी सागर के लहरों की तरह आपके हृदय को तरंगित करें, रात्रि-राजन चंद्रदेव की तरह निर्मल करें, अमृतमयी गंगाजल की भांति पवित्र रखें और मदमस्त निर्झर-जल की भांति निश्छल बनायें--यही मेरी शुभकामनायें हैं.
देवाधिदेव महादेव जो प्रत्येक क्षण व प्रत्येक कण के सतत विनाशक हैं आपके सभी दुख-दर्द को नष्ट कर आपके जीवन के सभी विषों का पाण करें जिससे परमपिता ब्रह्मा नष्ट हुए प्रत्येक रिक्तियों में सुख-समृद्धि की नव-सृष्टि करें साथ ही साथ जग के पालक साक्षात नारायण आपका कल्याण करें. त्रिदेवों के परम आशिर्वाद से नव-वर्ष बीस-ग्यारह में आपके जीवन में एक नयी शक्ति का उदय हो जिसके समक्ष आपकी शारिरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दूर्बलतायें स्वतः ही अपना पराभव स्वीकार करे---ये मेरी शुभकामनायें हैं.
दूर क्षितिज पर जहां अनन्त महासागर के तरंगित शीष अनंताकाश के स्थिर पांव का कामुक चुंबन करती है उसी गर्भ-बिन्दु से समस्त उर्जा के वाहक सूर्य के उदय के साथ ही काल चक्र का एक मजबूत स्तंभ विगत वर्ष के रूप में स्वर्णिम अतीत की ममतामयी गोद में समा गया है, उसी तरह निश्चय ही सुखद कालचक्र का अगला दृढ स्तंभ नववर्ष बीस-ग्यारह सभी नूतनताओं को पूरी उर्जा के साथ स्वयं में ज्योति-स्वरूप समेटते हुए आपके समक्ष गौरव-पूर्ण भविष्य के रूप में प्रस्तुत हो रही है जो आपके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्योति फ़ैलाकर परम-सुख का निर्माण करे---ऐसी मेरी शुभकामनायें हैं.
निर्मल प्रकृति की प्रचंड शक्ति आपके स्वस्थ शरीर, साकारात्मक गुण , विवेकशील बुद्धि एवं धैर्यपुर्ण आत्मिक बलों में गुणोत्तर वृद्धि करते हुए आपके जीवन में ऐसी दिव्यता प्रदान करे कि स्वतः ही लोभ, स्वार्थ, दुराचार , रोग-व्याधि जैसी नाकारात्मक शक्तियां व दूर्बलतायें आपके मेहान व्यक्तित्व के समक्ष नतमस्तक होवें--यह मेरी सुभकामनायें हैं.
सभी दुख-दर्द एवं अन्य समस्यायें जो प्रकृत के नियम हुआ करते हैं उसमे काल के वक्ष पर आपके कर्मठ हाथों से आरेखित सुचित्र वैधानिक परिवर्तन करते हुए सुखद व सफ़ल परिणति देगी. नया वर्ष बीस ग्यारह आपके जीवन की संभावनाओं को आपके हृदयस्थ आशाओं से कई गुणा अधिक बढाकर आपके जावन में तदनुरुप उपलब्धियों की अमृतमयी वृष्टि करे---यह मेरी शुभकामनायें हैं.
नई आशाएं, नयी योजनायें, नये प्रयास, नयी सफ़लता, नया जोश, नई मुस्कान, नया वर्ष बीस-ग्यारह
समृद्धशाली, गौरवपुर्ण, उज्ज्वल, सुखदायक, उर्जावान, विस्मयकारी, स्मृतिपुर्ण नव वर्ष बीस -ग्यारह।
जीवन-मरण की सीमाओं मे बंधा हुआ नगण्य सा प्राणी मानव, काल-चक्र की द्रुतगति मे वीते वर्ष की परिधि बिंदु पर सांस लेता हुआ मानव, कालदेव की इच्छा-मात्र के अनुरूप अपने-अपने कर्तव्य एवम अधिकार के झंझावातों मे उलझा हुआ मानव और अन्य प्राणियों की भांति अपनी लघुतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कठिनतम प्रयास करता हुआ मानव का जीवन नव वर्ष बीस ग्यारह मे मंगलमय हो.
कालदेव नव वर्ष बीस ग्यारह के प्रत्येक क्षण आपके मुख-मंडल को दिवसदेव सुर्य की भांति तेजपूर्ण और कोमल पुष्प के समान प्रसन्नचित रखें. समय की धारा तरंगमयी सागर के लहरों की तरह आपके हृदय को तरंगित करें, रात्रि-राजन चंद्रदेव की तरह निर्मल करें, अमृतमयी गंगाजल की भांति पवित्र रखें और मदमस्त निर्झर-जल की भांति निश्छल बनायें--यही मेरी शुभकामनायें हैं.
देवाधिदेव महादेव जो प्रत्येक क्षण व प्रत्येक कण के सतत विनाशक हैं आपके सभी दुख-दर्द को नष्ट कर आपके जीवन के सभी विषों का पाण करें जिससे परमपिता ब्रह्मा नष्ट हुए प्रत्येक रिक्तियों में सुख-समृद्धि की नव-सृष्टि करें साथ ही साथ जग के पालक साक्षात नारायण आपका कल्याण करें. त्रिदेवों के परम आशिर्वाद से नव-वर्ष बीस-ग्यारह में आपके जीवन में एक नयी शक्ति का उदय हो जिसके समक्ष आपकी शारिरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दूर्बलतायें स्वतः ही अपना पराभव स्वीकार करे---ये मेरी शुभकामनायें हैं.
दूर क्षितिज पर जहां अनन्त महासागर के तरंगित शीष अनंताकाश के स्थिर पांव का कामुक चुंबन करती है उसी गर्भ-बिन्दु से समस्त उर्जा के वाहक सूर्य के उदय के साथ ही काल चक्र का एक मजबूत स्तंभ विगत वर्ष के रूप में स्वर्णिम अतीत की ममतामयी गोद में समा गया है, उसी तरह निश्चय ही सुखद कालचक्र का अगला दृढ स्तंभ नववर्ष बीस-ग्यारह सभी नूतनताओं को पूरी उर्जा के साथ स्वयं में ज्योति-स्वरूप समेटते हुए आपके समक्ष गौरव-पूर्ण भविष्य के रूप में प्रस्तुत हो रही है जो आपके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्योति फ़ैलाकर परम-सुख का निर्माण करे---ऐसी मेरी शुभकामनायें हैं.
निर्मल प्रकृति की प्रचंड शक्ति आपके स्वस्थ शरीर, साकारात्मक गुण , विवेकशील बुद्धि एवं धैर्यपुर्ण आत्मिक बलों में गुणोत्तर वृद्धि करते हुए आपके जीवन में ऐसी दिव्यता प्रदान करे कि स्वतः ही लोभ, स्वार्थ, दुराचार , रोग-व्याधि जैसी नाकारात्मक शक्तियां व दूर्बलतायें आपके मेहान व्यक्तित्व के समक्ष नतमस्तक होवें--यह मेरी सुभकामनायें हैं.
सभी दुख-दर्द एवं अन्य समस्यायें जो प्रकृत के नियम हुआ करते हैं उसमे काल के वक्ष पर आपके कर्मठ हाथों से आरेखित सुचित्र वैधानिक परिवर्तन करते हुए सुखद व सफ़ल परिणति देगी. नया वर्ष बीस ग्यारह आपके जीवन की संभावनाओं को आपके हृदयस्थ आशाओं से कई गुणा अधिक बढाकर आपके जावन में तदनुरुप उपलब्धियों की अमृतमयी वृष्टि करे---यह मेरी शुभकामनायें हैं.
Tuesday, December 28, 2010
देश की आशा---बाबा रामदेव
हाल ही में हुए बिहार के चुनाव परिणाम निश्चय ही विकास के लिये वोट की कहानी कहती है. यह परिणाम बिहार कि लोगों की समझदारी का पर्याप्त सबूत भी देती है.इस बात का कहीं कोई विरोधाभास नहीं है कि मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार ने भाजपा के सहयोग से विगत पांच वर्षों में अच्छा कार्य किया है. इसी बात को मानते हुए जनमत उनके पक्ष में रही...लेकिन एक दूसरी बात जो बाहर आयी है वह यह है कि केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी अर्थात कांग्रेस को बिहार की जनता ने नकार दिया है. बिहार की जनता ने किसी पार्टी विशेष को वोट न देकर "सुशासन" के पक्ष में अपना मत दिया. यही बात देश की राजनीति को एक नयी दिशा देगी.
बहुत हद तक केन्द्रिय सरकार भ्रष्टाचार, मंहगाई, बेरोजगारी, नक्सलवाद,आतंकवाद, गरीबी आदि सभी समस्याओं को हल करने में असफ़ल रही है. वहीं इन मुद्दों पर विपक्ष भी सफ़लतापूर्वक अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रही है. विशेषकर भ्रष्टाचार तो दीमक की तरह लगता है पूरे देश को खोखला कर के ही दम लेगी. इस मामले में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका संदेहास्पद लगती है.
२० वीं सदी की बात करें तो महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानन्द नें तत्कालीन समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का जो निर्वाह किया था उसे कोई भी भारतीय कैसे भूल सकता है. राजनीति के शिखर पर होते हुए भी बापू कभी भी राजनीतिज्ञ नहीं रहे उसी तरह स्वामी विवेकानन्द राजनेता नहीं होते हुए भी जनमानस के बीच ख्याति प्राप्त युवा के रूप में प्रतिष्ठित बने रहे. इन दोनो व्यक्तित्वों की यह खाशियत थी कि वे निस्वार्थ भाव से जनमानस के प्रति समर्पित रहे और उन्हें तदनुरुप सम्मान भी मिलता रहा.
आज परिस्थितियां उतनी प्रतिकूल नहीं है...पर हां यदि यूं ही नीतिगत भूलें होती रही तो स्थिति बहुत ज्यादा बिगङ भी सकती है. ऐसे में जब सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच का अन्तर काफ़ी कम लग रहा है और दोनों जनता जनार्दन के लिये अग्राह्य हो रहे हैं तो निश्चय ही एक आशा की किरण भी दिख रही है. भले ही यह आशा की किरण मीडिया से दूर आस्था और संस्कार चैनल तक ही सिमटी हुई दिख रही है.... लेकिन है वह आशा की किरण जिसके पास भ्रष्टाचार , बेरोजगारी, साम्प्रदायिकता , नक्सलवाद, गरीबी...आदि सभी समस्याओं के समाधान के साथ-साथ राष्ट्र-गौरव ,स्वाभिमान और स्वास्थ की भी चिंतायें है. वह गांधी की तरह निस्वार्थ और विवेकानन्द की तरह मेधावी और तेजपूर्ण है.....हां वह महापुरुष है बाबा रामदेव....शायेद देश की आशा...बाबा रामदेव.
बहुत हद तक केन्द्रिय सरकार भ्रष्टाचार, मंहगाई, बेरोजगारी, नक्सलवाद,आतंकवाद, गरीबी आदि सभी समस्याओं को हल करने में असफ़ल रही है. वहीं इन मुद्दों पर विपक्ष भी सफ़लतापूर्वक अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रही है. विशेषकर भ्रष्टाचार तो दीमक की तरह लगता है पूरे देश को खोखला कर के ही दम लेगी. इस मामले में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका संदेहास्पद लगती है.
२० वीं सदी की बात करें तो महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानन्द नें तत्कालीन समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का जो निर्वाह किया था उसे कोई भी भारतीय कैसे भूल सकता है. राजनीति के शिखर पर होते हुए भी बापू कभी भी राजनीतिज्ञ नहीं रहे उसी तरह स्वामी विवेकानन्द राजनेता नहीं होते हुए भी जनमानस के बीच ख्याति प्राप्त युवा के रूप में प्रतिष्ठित बने रहे. इन दोनो व्यक्तित्वों की यह खाशियत थी कि वे निस्वार्थ भाव से जनमानस के प्रति समर्पित रहे और उन्हें तदनुरुप सम्मान भी मिलता रहा.
आज परिस्थितियां उतनी प्रतिकूल नहीं है...पर हां यदि यूं ही नीतिगत भूलें होती रही तो स्थिति बहुत ज्यादा बिगङ भी सकती है. ऐसे में जब सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच का अन्तर काफ़ी कम लग रहा है और दोनों जनता जनार्दन के लिये अग्राह्य हो रहे हैं तो निश्चय ही एक आशा की किरण भी दिख रही है. भले ही यह आशा की किरण मीडिया से दूर आस्था और संस्कार चैनल तक ही सिमटी हुई दिख रही है.... लेकिन है वह आशा की किरण जिसके पास भ्रष्टाचार , बेरोजगारी, साम्प्रदायिकता , नक्सलवाद, गरीबी...आदि सभी समस्याओं के समाधान के साथ-साथ राष्ट्र-गौरव ,स्वाभिमान और स्वास्थ की भी चिंतायें है. वह गांधी की तरह निस्वार्थ और विवेकानन्द की तरह मेधावी और तेजपूर्ण है.....हां वह महापुरुष है बाबा रामदेव....शायेद देश की आशा...बाबा रामदेव.
Sunday, December 12, 2010
चांद को थोङी गुमां तो होगी ही.
क्योंकि बैठा है आसमानों पर चांद को थोङी गुमां तो होगी ही.
करती रौशन है वो जमाने को हाल फ़िर खुशनुमा तो होगी ही.
मेरा तो दिल है एक समन्दर सा आग होता नहीं है इस दिल में
उसके दिल में है आग की लपटें फ़िर भी थोङी धुआं तो होगी ही.
खुद से मैं पूछता ही रहता हूं , कितनी चाहत है उसके सीने में
वो तो चुपचाप रहा करती है , आंखों में कुछ जुबां तो होगी ही.
मैं तो खुद पर यकीं नहीं करता फ़िर भी उसपर मुझे भरोसा है
रहती है वो सफ़ेद चादर में , पर दाग भी बदनुमा तो होगी ही.
भीङ में होकर भी कितना तनहा हूं तेरी चाहत ही मेरा साथी है
तू भी रहती अकेली हो घर में , पर कोई रहनुमा तो होगी ही
करती रौशन है वो जमाने को हाल फ़िर खुशनुमा तो होगी ही.
मेरा तो दिल है एक समन्दर सा आग होता नहीं है इस दिल में
उसके दिल में है आग की लपटें फ़िर भी थोङी धुआं तो होगी ही.
खुद से मैं पूछता ही रहता हूं , कितनी चाहत है उसके सीने में
वो तो चुपचाप रहा करती है , आंखों में कुछ जुबां तो होगी ही.
मैं तो खुद पर यकीं नहीं करता फ़िर भी उसपर मुझे भरोसा है
रहती है वो सफ़ेद चादर में , पर दाग भी बदनुमा तो होगी ही.
भीङ में होकर भी कितना तनहा हूं तेरी चाहत ही मेरा साथी है
तू भी रहती अकेली हो घर में , पर कोई रहनुमा तो होगी ही
Thursday, December 9, 2010
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
यौन-रण में वीर जैसा
मैं भी होता हूं स्खलित
जानवर जैसा ही कामुक
उनके जैसा ही पतित
एड्स से सबको बचाने
बिंदास कंडोम बोलता हूं.
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
है जिन्दगी लंबी बहुत
रोटी सबकी है जरुरत
प्यार -मोहब्बत -सेक्स
तो है इंसां कि फ़ितरत
तेरे जैसा अश्लील मैं भी
कविदिल की राज खोलता हूं
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
लानत है उस लेखनी पर
जो कलम सच को न उगले
काम गर आजाद हो तो
एड्स दुनियां को न उगले
कंडोम लगा मैं काम के लिये
निर्भय अवसर ढूंढता हूं
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
मैं भी होता हूं स्खलित
जानवर जैसा ही कामुक
उनके जैसा ही पतित
एड्स से सबको बचाने
बिंदास कंडोम बोलता हूं.
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
है जिन्दगी लंबी बहुत
रोटी सबकी है जरुरत
प्यार -मोहब्बत -सेक्स
तो है इंसां कि फ़ितरत
तेरे जैसा अश्लील मैं भी
कविदिल की राज खोलता हूं
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
लानत है उस लेखनी पर
जो कलम सच को न उगले
काम गर आजाद हो तो
एड्स दुनियां को न उगले
कंडोम लगा मैं काम के लिये
निर्भय अवसर ढूंढता हूं
हां मैं कंडोम बेचता हूं.
Monday, December 6, 2010
मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१५ (व्यंग्य)
मैंने कहा----"मैं........कुत्ते की तरह भौंक रहा था...? " वह मुस्कुरते हुए बोली----" और नहीं तो क्या....मां कहती है औरतों का जीवन उसी दिन सफ़ल माना जाता है जिस दिन उसका पति कुत्तों की तरह भौंकने लगे...क्योंकि बार्किंग डोग सेल्डम बाइट इफ़ ही बार्क्स ही विल नोट बिट यू. नाव यू आर सेफ़ अन्ड सकसेस्फ़ुल...". मुझसे रहा न गया ----"मुझे पागल मत करो.."
----"मजाक छोङो जी आपने तो सुहागरात में ही कहा था कि आप मेरे प्यार मे पागल हो.."
----" तो...? तो क्या मैं पागल था..?"
-----"नहीं जी, उस दिन तो आपने झूठ बोला था....लेकिन मेरे इतने साल के तपस्या से आज वह बात सच हुई है"
-----"....हां...तब मैं तुम्हारे प्यार में पागल था....और आज...." श्रीमतीजी ने झट से मेरे मुंह पर हथेली रख दी.
-----"कुछ भी मत बोलो मैं जानती हूं कि सभी मर्द महबूबा के प्यार में पागल हो जाते हैं. लेकिन सच का पागल तो वही होता है जो महबूबा से शादी कर लेता है.और एक बार शादी करने के बाद तो वह बेचारा पागल कम्पलीट पागल हो जाता है....पेरफ़ेक्सन आ जाता है.......प्यार में इससे बढकर पागलपन क्या होगा.." अब मुझसे न रहा गया.
-----" देखो..तुम ठीक से बात करो...प्यार की चासनी लगा कर मीठी छुरी से गले मत रेतो....मैं अपनी सुहागरात के हर स्टेटमेंट को वापस लेता हूं क्योंकि वह रात मेरे लाईफ़ की सबसे अशुभ रात थी और तुम मीडिया की तरह उस रात की हर बात को तोङ-मरोङकर पेश करती हो."
----"भला मैं ऐसा क्यों करुंगी."
----" क्योंकि मैं भ्रष्टाचार से पैसे कमाकर भरा हुआ सूटकेश नहीं देता.."
----" भूख लगने पर तो तुम जानवरों का चारा भी खा जाते हो मैं नहीं जानती क्या.."
----" कब खाया मैं जानवरों का चारा...?..कोई यकीन नहीं करेगा...सभी जानते हैं कि मैं कितना ईमानदार हूं.
----" सुहागरात से ही ऐसा बोलते रहे हो...जबकि ये नहीं जानते कि तुम्हारी इमानदारी पर विश्वास करके ही मैंने तुम्हें दिल दिया था.. नेताओं की तरह घरियाली आंसू बहाकर कितने वादे किये थे तुमने....."
------" वादे किये थे तो क्या...."
-------" जानती हूं सारे वादे चुनावी थे....कौन सी तुम्हारी सरकार गिरनेवाली है जो वादे याद रक्खोगे."
वह जोली मूड में थी---ये औरतों का एक विशेष मूड होता है जिसमें वह भीतर से खुश होती है पर बाहर से खुश न होने का नाटक करते हुए एमोशनल अटेक करती है ताकि वह और कुछ हासिल कर सके...ऐसे में यदि पुरुष थोङा भी इधर-उधर करे तो इमोसनल अत्याचार का आरोप लगाती है.
मध्यान्तर----
----"मजाक छोङो जी आपने तो सुहागरात में ही कहा था कि आप मेरे प्यार मे पागल हो.."
----" तो...? तो क्या मैं पागल था..?"
-----"नहीं जी, उस दिन तो आपने झूठ बोला था....लेकिन मेरे इतने साल के तपस्या से आज वह बात सच हुई है"
-----"....हां...तब मैं तुम्हारे प्यार में पागल था....और आज...." श्रीमतीजी ने झट से मेरे मुंह पर हथेली रख दी.
-----"कुछ भी मत बोलो मैं जानती हूं कि सभी मर्द महबूबा के प्यार में पागल हो जाते हैं. लेकिन सच का पागल तो वही होता है जो महबूबा से शादी कर लेता है.और एक बार शादी करने के बाद तो वह बेचारा पागल कम्पलीट पागल हो जाता है....पेरफ़ेक्सन आ जाता है.......प्यार में इससे बढकर पागलपन क्या होगा.." अब मुझसे न रहा गया.
-----" देखो..तुम ठीक से बात करो...प्यार की चासनी लगा कर मीठी छुरी से गले मत रेतो....मैं अपनी सुहागरात के हर स्टेटमेंट को वापस लेता हूं क्योंकि वह रात मेरे लाईफ़ की सबसे अशुभ रात थी और तुम मीडिया की तरह उस रात की हर बात को तोङ-मरोङकर पेश करती हो."
----"भला मैं ऐसा क्यों करुंगी."
----" क्योंकि मैं भ्रष्टाचार से पैसे कमाकर भरा हुआ सूटकेश नहीं देता.."
----" भूख लगने पर तो तुम जानवरों का चारा भी खा जाते हो मैं नहीं जानती क्या.."
----" कब खाया मैं जानवरों का चारा...?..कोई यकीन नहीं करेगा...सभी जानते हैं कि मैं कितना ईमानदार हूं.
----" सुहागरात से ही ऐसा बोलते रहे हो...जबकि ये नहीं जानते कि तुम्हारी इमानदारी पर विश्वास करके ही मैंने तुम्हें दिल दिया था.. नेताओं की तरह घरियाली आंसू बहाकर कितने वादे किये थे तुमने....."
------" वादे किये थे तो क्या...."
-------" जानती हूं सारे वादे चुनावी थे....कौन सी तुम्हारी सरकार गिरनेवाली है जो वादे याद रक्खोगे."
वह जोली मूड में थी---ये औरतों का एक विशेष मूड होता है जिसमें वह भीतर से खुश होती है पर बाहर से खुश न होने का नाटक करते हुए एमोशनल अटेक करती है ताकि वह और कुछ हासिल कर सके...ऐसे में यदि पुरुष थोङा भी इधर-उधर करे तो इमोसनल अत्याचार का आरोप लगाती है.
मध्यान्तर----

