Friday, January 7, 2011

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१६ (व्यंग्य)

चाहता तो नहीं था पर प्रतीक्षा जरूर कर रहा था उस घङी की जब मेरी साली और सालेजी पधारनेवाले थे.महिने भर पहले ही उनके आने का प्रोग्राम तय हो गया था, लेकिन जब दिल से इच्छा न हो और इन्तजार करना पङे तो महिने भर का समय मिनटों में कट जाता है. वे दोनों घर पर पधार चुके थे. पहले सालीजी का परिचय करवाता हूं. वह चिन्टी के नाम से जानी जाती हैं और सालेजी की संज्ञा राजा है. चिन्टी में मूलतः स्तनधारी वर्ग के लक्षण तो हैं ही ,उपर से परिस्थिति वश उभयचर और सरीसृप वर्ग के गुण भी परिलक्षित होते हैं. वह मोडर्न हैं और प्रगतिशील सोच रखती हैं. पर्दा-प्रथा के इतनी विरोधी हैं कि शरीर का बारह आना हिस्सा आसानी से दृष्टिगोचर हो जाता है. बांकी बचे शरीर के चौथाई हिस्से को भी इतने टाइट कपङों से ढकती हैं कि हवा का एक अणु भी उन हिस्सों को टच नहीं कर सकती. उनमें एक गुण यह भी है कि वह हर किसी से बात करती है. किसी को यदि भाव नहीं देती है तो नींचा भी नहीं समझती. खुले विचार की हैं....यही वजह है कि मैं थोङा सा डरा हुआ था. खूबसूरत लङकियों को गिद्ध की तरह देखना तो मर्दों का स्वभाव होता है. न ही मैं चिन्टी जी को अपने सौन्दर्य को ढकने की सलाह दे सकता हूं और न ही मर्दों के स्वभाव में परिवर्तन की आशा कर सकता हूं. सालीजी भी हैं मिलनसार स्वभाव की...जिसका गलत फ़ायदा उठाकर आस-परोस के लोग उनसे घुलने-मिलने की कोशिस करेंगे और ऐसे व्यवहार करेंगे जैसे वह पूरे मुहल्ले की साली हो...मैं कैसे न डरूं..?



आज सबेरे की बात है. मैं बिस्तर पर लेटा था .वह मोर्निंग टी लेकर आयी और मुझे जगाते हुए कहा---"गुड मोर्निंग जीजू....".मैं जगा तो लगा जैसे सपने देख रहा होऊं.इससे पहले रोज सबेरे एक सा चेहरा देखते-देखते थक गया था. नींद तो पहले भी खुल जाया करती थी लेकिन डर से. पर चिन्टीजी के नरम-नरम हाथों से गरम-गरम चाय के साथ मोर्निंग शेक-अप और विशेज सचमुच सपनों जैसा ही था. आंख खुली तो उनका खूबसूरत मेक-अप वाला चेहरा लाजवाब दिख रहा था. मैं तो देखते ही रह गया पर हाथ की ऊंगली चाय की तरफ़ बढने लगी...पर उसने झट से मेरी ऊंगली पकङकर अपनी ओर खींच लिया और प्यार से बोली----" पहले दो ग्लास पानी फ़िर चाय----और कल से दो के बदले तीन ग्लास पानी और नो चाय." वह इतने प्यार से बोल रही थी कि मैं मना नहीं कर सका. दो ग्लास पानी पी लेने के बाद पेट फ़ुटबाल की तरह लग रहा था. इससे पहले की वह पंक्चर होता सोचा खुद वाल्व को दवाकर प्रेशर कम कर लिया जाये. मैं फ़टाफ़ट चाय पीकर शौचालय की ओर निकलने लगा. वह बोली---" जीजू मैं मोर्निंग वाक करने जा रही हूं.." मैंने डरते हुए सवाल किया-----" मोर्निंग वाक इन आधे कपङों में...?" उसने निडर होकर सीधा जवाब दिया----"जीजू यदि पूरे कपङे पहनकर मोर्निंग वाक करुंगी तो आक्सीजन बोडी के भीतर कैसे जायेगा..?. मैं ज्यादा समझाता तो वह शायद और भी कपङे कम कर देती सो चुप ही रहा.

मैं जैसे ही फ़्रेश हुआ मन में एक डर सा पैदा हो गया. मुहल्लेवालों को अच्छी तरह जानता हूं. मैं फ़्रेश होकर पार्क की ओर निकल पङा. वह पार्क जो मोर्निंग के समय नोर्मली खाली ही रहता है आज मुहल्ले के लोगों से खचा-खच भरा हुआ था. चिंटीजी आगे-आगे ज्यादा स्पीड से वाक कर रही थी बांकी मुहल्लेवाले धीरे-धीरे टहल रहे थे. खुद धनन्जय बाबू तबले जैसी तोंद लेकर इस प्रयास में तेज चलने की कोशिस कर रहे थे कि किसी तरह चिन्टी के नजदीक पहुंच सकें. वह पांच सौ मीटर परिधि के पार्क के पांच चक्कर लगायी और वापस घर चली गयी. मैंने धनन्जय बाबू से पूछा---" आप कबसे मोर्निंग वाक करने लगे..?". उन्होंने शरमाते हुए कहा---" बस आज यूं ही मन किया".. मैं तो समझ ही रहा था कि आज सुबह में टहलने का उनका मन क्यों किया. कुछ देर के बाद मैं भी घर पहुंचा और गुस्से को खुद में समेटते हुए चिन्टीजी से पूछा---" चिन्टीजी ये तमाशा करने की क्या जरुरत थी..?". वह मुस्कुराते हुए बोली---"जीजू सुबह में टहलना तमाशा थोङे ही होता है.". मैंने समझाया--- " टहलना तमाशा नहीं होता लेकिन मुहल्ले के सारे जेन्ट्स जो आपको फ़ोलो कर रहे थे वह तमाशा जरूर था.. आपको नहीं पता है कि ये जेन्ट्स (मर्द लोग) वो वाले जेन्ट्स (राक्षस) हैं . ये सभी आपको घुर-घुर कर देख रहे थे.." वह बोली----" जीजू अब मैं बच्ची नहीं हूं सब बात जानती हूं....लेकिन मैं तो इन सबसे...आपसे भी मोर्निंग वाक करवा रही थी. यह हेल्थ के लिये बहुत जरूरी है."



मैं भी मान गया चिन्टीजी की सोच को. मैंने कहा----चिन्टीजी सचमुच आप बहुत प्यारी हैं. बहुत बढिया सोचती हैं. आपके विचारों को मैं दाद देता हूं.". खुले तौर पर प्रशंसा सुनकर वह थोङा गुस्सा और थोङी खुशी को मिक्स करते हुए बिना आंसू और दर्दवाली स्टाइल में रोते हुए सिर्फ़ इतना बोली---- " जी.........जू.........आप भी न.." तब तक श्रीमती जी आ गयीं-----" क्यों तंग करते हो मेरी चिन्टी को..?"

मैंने कहा---" अरे मैं तो प्रशंसा कर रहा था...मैं तो इनकी सोच को दाद दे रहा था...". वह बिगङ गयी--- " देखो जी....किसी को भी दाद ,खाज, खुजली देने की जरुरत नहीं है..ये फ़ैलनेवाली बिमारियां होती है."

...."क्या तुम भी सोचती हो...मैं ये दाद नहीं वो दाद दे रहा था "

...." ये दाद...वो दाद क्या होता है. दाद तो एक ही होता है न..?"

...." डार्लिंग मुझे सफ़ाई तो देने दो कि मैं कौन सा दाद दे रहा था ?"

...." सफ़ाई होती तो तुम्हें दाद थोङे ही होता....और किसी तरह हो भी गया तो उसे बांटने की जरुरत नहीं है. दाद की दवा ले आओ".

तब तक ससुरजी भी आ गये और वह अपनी प्रतिकृया न दें यह कैसे हो सकता था---"किस को दाद हो गया?" उनको उत्तर देने से अच्छा था कि मंच छोङकर नेपथ्य की ओर निकल जाना. मैं वहां से खिसक लिया..श्रीमतीजी कहने लगी----"आपके दामादजी को दाद हो गया है". चिन्टी समझाने लगी---" अरे दीदी, जीजू मेरे विचार से खुश होकर मुझे दाद दे रहे थे.". ससुरजी बोले---" खुशी से या नाराज होकर दाद का प्रसार करना अच्छी बात नहीं है. यह बहुत ही खतरनाक बिमारी है जो भ्रष्टाचार की तरह जब फ़ैलती है तो फ़ैलती ही चली जाती है. सरकार ने भी हैजा , चेचक , पोलियो आदि संक्रामक रोगों से बचाव के लिये लोगों को टीके लगवाती है. एड्स जैसी जानलेवा बिमारी भले ही बढती चली गयी हो अवेयरनेस तो करवा ही रही है. सर्दी जुकाम जैसी रोगों से बचाव के लिये स्वयं मलायका अरोङा जैसी हस्तियां झंडू बाम बन जाती है. उनके विचारों से तो ऐसा लगता है कि यदि किसी को एक बार भी छींक आ गयी तो वह छींकनेवाले डार्लिंग के सामने झंडूबाम बनकर प्रस्तुत हो जायेंगी. उनका नृत्य तो इतना एश्योर कर ही रही है. तभी मीडियावाले लगातार दाद की तरह फ़ैलनेवाली बिमारी करप्शन पर ध्यान फ़ोकस न करते हुए सारा कन्सेन्ट्रेशन विश्व के सबसे बङे प्रजातंत्र के छोटे-मोटे छींकों पर उङेल रही है. दाद और करप्शन को भले ही पब्लिसीटी नहीं मिल रही है फ़िर भी अन्दर ही अन्दर ये बिमारियां इतनी फ़ैल चुकी है कि पूरा का पूरा गुप्त प्रक्षेत्र ही डेन्जर जोन में आ गया है. देश के महान नेतागण और तथाकथित भद्रपुरुष खुद ही इन रोगों से ग्रस्त हैं सो इन्हें निर्मूल करना तो काफ़ी मुश्किल है...हां यदि वे खुलकर अपनी बिमारियों को दिखायें अर्थात पारदर्शिता लायें तो संभवतः प्रसार तो रुक ही जायेगी."



ससुरजी का भाषण जारी रहा----" जहां तक दाद और करप्शन के रोकथाम की बात है तो सबसे पहले रोगी दुष्कर्म करना बंद कर दें जब तक स्वयं इन रोगों से छुटकारा न मिल जाये...ये रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्पर्श होते ही तेजी से फ़ैलता है. दूसरी बात सरकार यह नियम बना दे कि दाद और करप्शन बाले हिस्से पर हाथ फ़ेरने के बाद बिना हाथ धोये सिस्टम के दूसरे हिस्से को टच न करें. ऐसी ही गलती के कारण दाद और करप्शन दिल्ली के राजपथ से मुम्बई के दलाल स्ट्रीट तक फ़ैल गयी. जब मीडियावाले खबर लेने पहुंचे तो निर्दोष होते हुए भी बेचारे इन रोगों के चपेट में आ गये. प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ में जंग क्या लगी कि देखते ही देखते कोई भी खंभा सोलिड न रहा. बढिया होगा सरकार दाद और करप्शन के रोकथाम के लिये कोई टीका इजाद करवाये. इसी टीके से बांकी सभी बिमारियां काबू में आ जायेगी."



जैसे ही ससुरजी ने अपना शोर्ट स्पीच बंद किया, लोकसभा की तरह तालियों की गङगङाहट से मेरा रेलवे क्वार्टर गूंजने लगा. मैं तो दूसरे कक्ष में माथा पीट रहा था. ससुरजीने मुझे माथा पीटते देखकर मेरी श्रीमतीजी को कहा---" दामादजी से कहो कि पहले हाथ को साफ़ पानी में साबुन से धो लें फ़िर माथा पीटें क्योंकि दाद और करप्शन जैसी बिमारियां हेड तक जब पहुंचती है तो पूरे सिस्टम को बरबाद कर देती है फ़िर आदमी हो या देश बचाना मुश्किल होता है.."



क्रमशः

9 comments:

यशवन्त माथुर said...

बहुत बढ़िया

'उदय' said...

... shaandaar-jaandaar !!

सुज्ञ said...

"क्योंकि दाद और करप्शन जैसी बिमारियां हेड तक जब पहुंचती है"

ससुर जी का शानदार निष्कर्ष

संजय भास्कर said...

..."क्या तुम भी सोचती हो...मैं ये दाद नहीं वो दाद दे रहा था "
...ला-जवाब" जबर्दस्त!!

निर्मला कपिला said...

लाजवाब व्यंग लिखते हैं अर्विन्द जी। लगता है इस पर एक किताब पूरी करके ही दम लेंगे। बधाई औए शुभकामनायें।

दीप्ति शर्मा said...

bahut sunder
is bar mere blog par

" मै "
kabhi samaye nikal kar aaye

ZEAL said...

एक और शानदार और जानदार व्यंग !
बधाई।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच मजा आ गया।

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पति को वश में करने का उपाय।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अरविंद भाई, मजा आ गया। अगली कडी की प्रतीक्षा।

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कादेरी भूत और उसका परिवार।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।