Wednesday, March 24, 2010

भ्रष्टाचार

भयंकर घाव से पीडित था वह,
पांव सड चुका था,
अस्थियों मे दर्द था,
रक्त दुषित हो चला था.
एक दिन मुर्छित सा आया.
उपचार करो, याचना लाया.
मैने पूछा, कौन हो तुम?
मुझे कहो क्यों मौन हो तुम?

मैं एक समाज हूं,
मानवता और ईमान,
मेरी संताने हैं.
मानवता मृत्यु शैया पर पडा है,
निधन का रोना रो रहा है.
उसे देखकर ईमान से न रहा गया.
वह भी रोग से ग्रसित हो गया.
मैने संतानो को तडपते देखा,
लचार, निराश, पराधीन.......
मेरा दर्द संतानो ने दिया है मुझे.

मैं जानता हूं,
तुम मेरा उपचार नहीं करोगे.
क्योंकि
मेरी नजर में तुम्हारी औकात
एक शिशु के शिश्न की तरह है.
जिसका उपयोग उसकी नजर मे
मुत्र करने के सिवा कुछ भी नहींहै.
न ही ढकने से औकात बढती है.
न ही नग्न रहने से घटती है

लेकिन,
यदि उपचार न किये,
तो मेरी बिमाडी--भ्रष्टाचार
तुम सबको निगल जायेगी.
मैं तो बूढा होकर भी
जिंदा रहुंगा.
मगर तुम
जीकर भी मरते रहोगे.

14 comments:

ललित शर्मा said...

तुम्हारी नजर मे मेरी औकात
एक शिशु के शिश्न की तरह है.

वाह!क्या अंदाज है कहने का?

Dr Satyajit Sahu said...

nice one

दिगम्बर नासवा said...

समाज में फैली इन बुराइयों का इलाज बेहद ज़रूरी है ... इससे पहले की वे लाइलाज हो जाएँ ... इंसान को जागना होगा ....

Babli said...

अद्भुत सुन्दर रचना लिखा है आपने ! समाज में हो रहे सारी घटनाओं को आपने बखूबी शब्दों में पिरोया है! हर एक शब्द दिल को छू गयी और सच्चाई पर आधारित आपकी ये शानदार रचना प्रशंग्सनीय है! इस उम्दा प्रस्तुती के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

रश्मि प्रभा... said...

मैं एक समाज हूं,
मानवता और ईमान,
मेरी संताने हैं.
मानवता मृत्यु शैया पर पडा है,
निधन का रोना रो रहा है.
उसे देखकर ईमान से न रहा गया.
वह भी रोग से ग्रसित हो गया.
मैने संतानो को तडपते देखा,
लचार, निराश, पराधीन.......
मेरा दर्द संतानो ने दिया है मुझे.
samaj ki durdasha ko bakhoobi ubhaara hai, bhawpravan rachna

श्याम कोरी 'उदय' said...

तुम्हारी नजर मे मेरी औकात
एक शिशु के शिश्न की तरह है.
जिसका उपयोग उसकी नजर मे
मुत्र करने के सिवा कुछ भी नहींहै.
न ही ढकने से औकात बढती है.
न ही नग्न रहने से घटती है
....बेहतरीन अभिव्यक्ति,प्रसंशनीय रचना,बधाई!!!!

रंजना said...

सटीक और प्रभावशाली रचना....

बेचैन आत्मा said...

बेहतरीन--धारदार पंक्तियों से सजी जरूरी कविता के लिए बधाई।

न जाने क्यों मैं इन पंक्तियों से सीधे वार करने का समर्थक हूँ--

मैं जानता हूं,
तुम मेरा उपचार नहीं करोगे.
क्योंकि
मेरी नजर में तुम्हारी औकात
एक शिशु के शिश्न की तरह है.
जिसका उपयोग
मुत्र करने के सिवा कुछ भी नहींहै.
न ही ढकने से औकात बढती है.
न ही नग्न रहने से घटती है
----आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

चंदन कुमार झा said...

आक्रोशित करती मन को कुरेदती अच्छी रचना ।

मुझे कहीं कहीं टंकण की त्रुटियां नजर आयी-

पीडित = पीड़ित
सड = सड़
मानवता मृत्यु शैया पर पडा है = मानवता मृत्यु शैया पर पड़ी है
निधन का रोना रो रहा है = निधन का रोना रो रही है
बिमाडी = बिमारी
मैने = मैंने
मै= मैं
ढकने = ढ़कने


कृप्या अनुरोध है कि अन्यथा न लेंगे । आभार

arvind said...

chandan,.....sorry.
trutiyo ki or dhyan dilane ke liye bahut -2 dhanyabaad.

arvind said...

Respected devendraji(vaichain aatma)kshama karen ,aapki baato se spast nahi ho paya ki aap sabdo ke viruddh vaar karana chahate hai yaa sabdo ke saath(in favour).main apni baat rakhane ke liye kahana chaahata hu ki saabdik arth ko chhodakar bhaavaarth par jaayen.pls isme aslilata nahi hai,shaayed aap aisa soch rahe hai.

aap jaise great writers jab virodh karate hai to acchaa lagata hai ki aapne mujhe is kaabil samajha.Aapse mujhe bahut seekhanaa hai our aapka virodh mujhe bahut kuch sikhaata hai yeh kabhi bhatakane nahi detaa. dhanyabaad.

Shekhar kumawat said...

bahut achi kavita he bhai saheb


http://kavyawani.blogspot.com


shekhar kumawat

बेचैन आत्मा said...

अरे नहीं मैं शब्दों के विरूद्ध नहीं हूँ। न ही इनमें कोई अश्लीलता है। मै शायद ठीक से समझा नहीं सका जो मैं कहना चाहता हूँ।
आपने लिखा-तुम्हारी नजर मे मेरी औकात
मैने लिखा-मेरी नजर में तुम्हारी औकात
---बस यही फर्क है। मुझे लगा कि समाज मुझसे क्यों कहेगा तुम्हारी नज़र में मेरे औकात वह तो हमसे सीघे कहेगा कि मेरी नज़र में तुम्हारी औकात--बारीक सा फर्क है।
--मैं विरोध या प्रशंसा नहीं जानता । कविता पढने के बाद जो भाव मन में आता है लिख देता हूँ।़
--अन्यथा न लें।

arvind said...

aapne bilkul sahi kaha hai. maine accordingly edit kar diya hai.