Tuesday, November 9, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१० (व्यंग्य)

वह कहने लगे---"संस्कृत..?संस्कृत भाषा तो मृतक हो चुकी है. अब तो इंगलिश में ही लाईफ़ है" .मैंने उनके तर्कों को काटा----"लेकिन हमारी संस्कृति तो संस्कृत में ही है न...."उनका जवाब आया---"संस्कृति को बचाने के लिये ही इंगलिश का सहारा ले रहा हूं.जिस लेंग्वेज का डेथ हो चुका है वह हमारे कल्चर को फ़्रेश लाईफ़ कैसे दे सकती है ". मैंने दीनतापूर्वक याचना की---"मुहल्ले के लोग इंगलिश में पूजा करते हुए देखेंगे तो हमारी नाक कट जायेगी". वह बोले---"अब नाक बचाने के चक्कर में सांस लेना तो बंद नही कर देंगे. मैं तो कहता हूं कि नाक बचे या कटे सांस लेने में प्रोबलेम नहीं होना चाहिये". मेरे सारे तर्क ससुरजी ने काट दिये थे. वैसे भी उनके साथ तर्क करना ही बेकार है.

                                                        उन्होंने अपना कार्य चालू रखा और टिंकू से कहा----" अब संकल्प लो I tinku, under the direction of my grandfather swear to worship you for the welfare and good health of our family and the society beyond cast ,creed and nationality " टिंकू भी मजे से सही- सही मंत्रोच्चारण कर रहा था. उसे सही प्रनन्सिएसन करने को कहा गया था. श्रीमतीजी मिसेल ओबामा की तरह मुस्कुरा रही थी. अगरबत्ती की जगह मोर्टिन और दीप की जगह जीरो वाट का बल्ब जला दिये गये थे. ससुरजी ने मेरी श्रीमतीजी की ओर ईशारा किया. अच्छत (चावल के दाने) की जगह वह भात और इडली के साथ प्रस्तुत हुई. टिंकू को अगला मंत्र पढने को कहा गया---" Respected Sir and madom, now a days honesty, knowedge and arts are being saled but rice is wasted in F.C.I godowns and is available at Rs.2/kilo to the poorest for votes. So rice has no importance at all for you rich people. Hence i offer north indian boiled rice and south indian idlee. kindly give us boon to ramain north and south india united. "



उस समय तो मेरा मांथा शर्म से झुक गया जब लेडी विश्वकर्माजी को सिन्दूर की जगह लिपिस्टिक चढाया गया. मैंने भगवान विश्वकर्माजी की ओर देखा. जिंस टी-शर्ट और टोपी में उनकी पर्सनेलीटी तो खुल रही थी. फ़िर भी नाराज से दिख रहे थे .मानो कह रहे हों----" बेकार ही मुझे देव-लोक से मृत्यु-लोक बुलाते हो. टी-शर्ट और जिंस पहनने से मैं अच्छा ही लगता हूं अपमानित नहीं होता......लेकिन तुमलोग मेरे प्रति आस्था का भी बाजारीकरण कर देते हो. कभी अपनी नाक बचाने के लिये तो कभी पैसा कमाने के लिये, कभी वोट के लिये तो कभी भावनाओं को भङकाने के लिये तुमलोग मेरा सहारा लेते हो. मैं इससे अपमानित होता हूं.



अगले भाग मे सासुमाँ का आगमन ..                    क्रमशः

7 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

sundar vyangya

यश(वन्त) said...

समाज के बदलते परिवेश और वोट बैंक की राजनीती पर करारा व्यंग्य!

विवेक Call me Vish !! said...

bahut khoob
Jai Ho Mangalmay hO

Vijai Mathur said...

Desh ki ekta barkarar rakhne ki adbhut pranalee pesh ki hai tatha logon ke chhipe manobhavon ko bakhoobee ujagar kiya hai.

संजय भास्कर said...

ला-जवाब" जबर्दस्त!!

निर्मला कपिला said...

आज ही 9वँ भाग भी पढा बहुत ही उमदा व्यंग है। बधाई।

गिरीश बिल्लोरे said...

बहुत सुन्दर मज़ेदार
वाह