Monday, April 6, 2026

 ।। मोर सपना: नेहक आजीविका ।। 

एकटा छोट सन मकान,
आ चाउरक एकटा दुकान,
खोलय लेल हम मोन बना लेलहुँ,
अपन परिश्रम सं तकदीर जगा लेलहुँ।
छत आ दीवारक संग,
पेटक चिंता सेहो करब,
मर्यादा सं जीयब हम,
नेहक रंग में संसार भरब।
साधारण अछि ई ख्वाइश,
मुदा एहि मे हमर प्राण अछि,
मिहनत कऽ सुगंध सँ,
मिथिलाक माटिक शान अछि।
अरविंद 06-04-2026

Friday, August 1, 2014

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Thursday, July 5, 2012

राजा और वीर




एक खडा है युद्ध-भूमि पर कुछ भी कब सुनता है.
एक हमारी पेट के खातिर माथा अपनी धुनता है.
रक्ततिलक के शौर्य चमक की अनदेखी कर दूं या
स्वर्ण मुकुट की आभा को शीष झुका सम्मान करूं.
मैं कवि किसका गुणगान करूं, मैं कवि किसका गुणगान करूं,


एक प्रचंड शक्ति सूर्य है , निकट जला देता है.
एक देता है पर जानें क्यों भाव बहुत लेता है.
अटल पराजय है फ़िर भी बादल सा गरजूं मैं
या होकर छोटा राजा का खुलकर अपमान करूं.
मैं कवि किसका गुणगान करूं, मैं कवि किसका गुणगान करूं,

शरहद पर लडनेवालों का क्या गीत कोई गाया है.
पर किस राजा को अपनी निंदा आजतलक भाया है.
वीरों के सम्मुख जाकर कायरता का माफ़ी मांगूं या
खुला नहीं जो कभी खजाना उसपर मैं अभिमान करूं.
मैं कवि किसका गुणगान करूं, मैं कवि किसका गुणगान करूं,

Tuesday, January 31, 2012

दिल अभी भी मिले नहीं हैं.


कह दो दिल से कैसे मानू

कि मन में तेरे गिले नहीं हैं.

हम साथ साथ भले बैठे हों

दिल अभी भी मिले नहीं हैं.



अब भी दबे हैं स्वर भावों के

छलक रहे हैं दर्द घावों के.

होठों पर दिखते हंसी नदारद

खुशियों के फ़ूल खिले नहीं हैं.

दिल अभी भी मिले नहीं हैं.



उद्घोष ही न हो विजय की

जीत का फ़िर अर्थ क्या है.?

भूल जायें अपनी शहादत

रण का फ़िर सार्थ क्या है?

खिंच गये थे जो दरारें

आज तक भी सिले नहीं हैं.

दिल अभी भी मिले नहीं हैं.



काल था वह हवा का झोंका

उजङा घर हम सबका अपना

याद है कि आग लगी थी

टूट गया था अपना सपना.

पर मर रही थी जो हर पल

आशाओं के पंख हिले नहीं हैं.

दिल अभी भी मिले नहीं हैं.

Friday, December 30, 2011

शुभकामनायें

शुभकामनायें

शुभ वर्ष 2012----------- मंगल वर्ष 2012--------------- नूतन वर्ष 2012

नई आशाएं, नयी योजनायें, नये प्रयास, नयी सफ़लता, नया जोश, नई मुस्कान, नया वर्ष बीस-बारह .


समृद्धशाली, गौरवपुर्ण, उज्ज्वल, सुखदायक, उर्जावान, विस्मयकारी, स्मृतिपुर्ण नव वर्ष बीस -बारह।



जीवन-मरण की सीमाओं मे बंधा हुआ नगण्य सा प्राणी मानव, काल-चक्र की द्रुतगति मे वीते वर्ष की परिधि बिंदु पर सांस लेता हुआ मानव, कालदेव की इच्छा-मात्र के अनुरूप अपने-अपने कर्तव्य एवम अधिकार के झंझावातों मे उलझा हुआ मानव और अन्य - प्राणियों की भांति अपनी लघुतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कठिनतम प्रयास करता हुआ मानव का जीवन नव वर्ष बीस बारह में मंगलमय हो.



कालदेव नव वर्ष बीस बारह के प्रत्येक क्षण आपके मुख-मंडल को दिवसदेव सूर्य की भांति तेजपूर्ण और कोमल पुष्प के समान प्रसन्नचित रखें. समय की धारा तरंगमयी सागर के लहरों की तरह आपके हृदय को तरंगित करें, रात्रि-राजन चंद्रदेव की तरह निर्मल करें, अमृतमयी गंगाजल की भांति पवित्र रखें और मदमस्त निर्झर-जल की भांति निश्छल बनायें--यही मेरी शुभकामनायें हैं.



देवाधिदेव महादेव जो प्रत्येक क्षण व प्रत्येक कण के सतत विनाशक हैं आपके सभी दुख-दर्द को नष्ट कर आपके जीवन के सभी विषों का पाण करें जिससे परमपिता ब्रह्मा नष्ट हुए प्रत्येक रिक्तियों में सुख-समृद्धि की नव-सृष्टि करें साथ ही साथ जग के पालक साक्षात नारायण आपका कल्याण करें. त्रिदेवों के परम आशिर्वाद से नव-वर्ष बीस-बारह में आपके जीवन में एक नयी शक्ति का उदय हो जिसके समक्ष आपकी शारिरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दूर्बलतायें स्वतः ही अपना पराभव स्वीकार करे---ये मेरी शुभकामनायें हैं.





दूर क्षितिज पर जहां अनन्त महासागर के तरंगित शीष अनंताकाश के स्थिर पांव का कामुक चुंबन करती है उसी गर्भ-बिन्दु से समस्त उर्जा के वाहक सूर्य के उदय के साथ ही काल चक्र का एक मजबूत स्तंभ विगत वर्ष के रूप में स्वर्णिम अतीत की ममतामयी गोद में समा गया है, उसी तरह निश्चय ही सुखद कालचक्र का अगला दृढ स्तंभ नववर्ष बीस-बारह सभी नूतनताओं को पूरी उर्जा के साथ स्वयं में ज्योति-स्वरूप समेटते हुए आपके समक्ष गौरव-पूर्ण भविष्य के रूप में प्रस्तुत हो रही है जो आपके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ज्योति फ़ैलाकर परम-सुख का निर्माण करे---ऐसी मेरी शुभकामनायें हैं.





निर्मल प्रकृति की प्रचंड शक्ति आपके स्वस्थ शरीर, साकारात्मक गुण , विवेकशील बुद्धि एवं धैर्यपुर्ण आत्मिक बलों में गुणोत्तर वृद्धि करते हुए आपके जीवन में ऐसी दिव्यता प्रदान करे कि स्वतः ही लोभ, स्वार्थ, दुराचार , रोग-व्याधि जैसी नाकारात्मक शक्तियां व दूर्बलतायें आपके महान व्यक्तित्व के समक्ष नतमस्तक होवें--यह मेरी शुभकामनायें हैं.





सभी दुख-दर्द एवं अन्य समस्यायें जो प्रकृत के नियम हुआ करते हैं उसमे काल के वक्ष पर आपके कर्मठ हाथों से आरेखित सुचित्र वैधानिक परिवर्तन करते हुए सुखद व सफ़ल परिणति देगी. नया वर्ष बीस बारह आपके जीवन की संभावनाओं को आपके हृदयस्थ आशाओं से कई गुणा अधिक बढाकर आपके जावन में तदनुरुप उपलब्धियों की अमृतमयी वृष्टि करे---यह मेरी शुभकामनायें हैं.



अपार संभावनाओं के संग नूतन आशायें नव ज्योति बनकर प्रातः-स्वरुप रश्मि-किरण के रूप मे प्रगट हो रही है.यह दिव्य किरण पूंज आपके अनन्त जीवन को सदा के लिये प्रकाशित करे साथ ही आप अनन्त ऊर्जा का अविरल संचार पाकर निर्मल चान्द की तरह युगों तक स्वयं एवं संसार के कल्यानार्थ प्रकाशवान हों.यह परम सत्य है कि क्षण क्षणभर का होता है ,नष्ट होना प्रकृत के नियम हैं परन्तु यह भी उतना ही सच है कि आपके चरण-चुंबन हेतु सृष्टि लगातार अनन्त क्षणो को सृजित करती है.भविष्य के गर्भ से लगातार जन्म ले रहे इन क्षणों में ईश्वर इतनी शक्ति दें कि आपके रज कणों से आशाओं के महलों का निर्माण हो ---नये वर्ष पर यह हमारी शुभकामनायें है.









फ़ूलों से सजी हो चमन की तरह

सितारों से सजी हो गगन की तरह

खूशबू इतनी कि फ़ूल फ़ींका लगे

मस्ती हो बसंती पवन की तरह.



आपका हर दिन होली गुजरे

आपकी हर रात दिवाली हो.

सुख इतनें हों कि क्या कहने

हर पल चेहरे पर लाली हो.



हम चाहते है यह नया वर्ष

आपके जीवन को दे उत्कर्ष

हर सपने पूरे हों जो चाह रहे.

मिले खुशियां हों अपार हर्ष



अरविन्द झा











Monday, December 26, 2011

सत्यनिष्ठा




नौकरी का आवेदन पत्र भेजने के सात साल बाद चन्द्राकर को साक्षात्कार के लिये बुलाया गया.अब उसे नौकरी की जरूरत नहीं थी क्योंकि वह बिजनेस करने लगा था , लेकिन अनुभव प्राप्त करने के लिये वह साक्षात्कार बोर्ड में उपस्थित हुआ.एक सदस्य ने पूछा..."इस पद के लिये आपमे कितनी काबिलियत है?" जबाव था---"सर यह पद आरक्षित है और मैं अकेला उम्मेदवार हूं. "दूसरे सदस्य ने पूछा---"आपको इस पद पर काफ़ी मेहनत करनी होगी.?"चन्द्राकर ने कहा--"सर मेहनत करने की मुझे आदत नहीं है...हां मैं चमचागिरी कर सकता हूं."तीसरे सदस्य ने कहा---"क्या आप विश्वास दिलायेंगे कि आप ईमानदारी से काम करेंगे ".उसने छूटते ही उत्तर दिया---"हां मैं यकीन दिलाता हूं कि भ्रष्टाचार से कमाये गये सभी रुपयों का हिसाब और कमीशन उपर के अधिकारी तक ईमानदारी से पहुंचा दूंगा."फ़िर बोर्ड के चेयर्मैन ने उसे यह कहते हुए बधाई दी कि उसका चयन कर लिया गया है.जाते समय चन्द्राकर यह जानना चाहता था कि उसके चयन का आधार क्या था.कुछ कहने के बदले चेयर्मैन ने उसके तरफ़ एक पुरानी पेपर जिसमे भारत का मानचित्र खींचा था और जिसके बीच मे एक जगह पर सत्यनिष्ठा लिखा हुआ था उसकी ओर बढा दिया.

Wednesday, October 19, 2011

कसौटी



पाप निकलता ही है.

पुण्य बचता ही है.

धर्म बहता ही है.

कर्म करता ही है.

गुण चमकता ही है.

बुराई छलकता ही है.

देखो कसता कसौटी पर

काल अटकता नहीं है.

Wednesday, October 12, 2011

मेरी कविता -2

सुबह ओंस की बूंदों से ,सबसे पहले मिलती है

सुनहली किरणों मे तो वह फ़ूलों सी खिलती है.

सूरज के संग आसमान में चढती है मेरी कविता

नये दिवस की नई कहानी गढती है मेरी कविता



रोज गगन में छू लेती है ऊंचाई की नयी बुलन्दी

जब भी होती है दोपहर में रोशनी से जुगलबन्दी

पूरी ताकत मेहनतकश में भरती है मेरी कविता

सूरज की गर्मीं से भी कब डरती है मेरी कविता.


न ही गिर जाने का दुख नहीं ढल जाने का गम

कर देती थकान वह पल भर में ही कितना कम

सांझ के अंधियारे में दीप सजाती है मेरी कविता

मुरझाये चेहरों पर संगीत बजाती है मेरी कविता.



Thursday, September 15, 2011

मेरी कविता.




शब्दों का ये जाल नहीं, मृदु-भाव मेरे हैं अंगूरी

रात की काली चादर पर दिखती है यह सिंदूरी.

अल्हङ सी नदिया के जैसी बहती है मेरी कविता.

फ़ूस के घर में रानी जैसी रहती है मेरी कविता.



पानी की रिम-झिम बूंदों से बात बहुत करती है

रहती है भूखे पेट भले , पर कभी नहीं मरती है

दिल के घर मन के बिस्तर सोती है मेरी कविता.

खुशियों के जोर ठहाकों में भी रोती है मेरी कविता.



सागर के खारे पानी में भी वह मय भर देती है

मरने वाले इंशानों को भी वह जिंदा कर देती है.

सन्नाटे में नाच - नाचकर गाती है मेरी कविता

टूटे दिल की गहराई तक जाती है मेरी कविता.

Monday, August 8, 2011

खुद



खुद ने खुदको किया पराजित

खुद ही खुद से हारा है.

खुद ने साथ दिया खुदको

खुद ने ही खुदको मारा है.



यह खुद की ही थी गर्जी

चलती रही खुद की मर्जी.

गैरों में होती ताकत तो

खुद क्यों खुद का सहारा है.

खुद ही खुद से हारा है.



खुद की एक बात बताता हूं.

यह सारा खेल खुदी का है.

मानो तो खुदा खुद में बैठा

वरना खुद खुद का कारा है.

खुद ही खुद से हारा है.



कई खुदों ने खुद से मिलकर

कहा साथ निवाहेंगे वे.

लेकिन फ़िर क्यों आज कब्र में

सिर्फ़ खुदी को गाङा है.

खुद ही खुद से हारा है.



क्रांतिदूत यह खुदा खूब है

जो खुद पत्थर की मूरत है.

मिला दिया जो सबको खुद में

सच्चे मजहब का नारा है.

खुद ही खुद से हारा है.

Thursday, July 28, 2011

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.

आंखों में उसकी दिखे सारा जग है.


मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.



नयनों में है उसकी गंगा की धारा

आंचल से देती वो जग को सहारा.

खुदा तो किसी को नहीं माफ़ करता

ममता की मूरत बहुत ही अलग है.

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.



गुरु मांगता शीष चरणों में अपने

पिता कहते पूरे करो मेरे सपने

पूजा मांगता नभ में बैठा विधाता

मां की जरुरत बहुत ही अलग है.

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.



वफ़ा करती है मेरी महबूब चंदा

रोटी के लिये है दुनियां में धंधा.

पल में रुलाना खुदा की है आदत

मैया की फ़ितरत बहुत ही अलग है.

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.

Thursday, July 21, 2011

तो मांगूं एक पत्ता भी.


मिले अगर कोई विशाल

तो मांगूं एक जर्रा भी.

हो घना यदि कोई दरख्त

तो मांगूं एक पत्ता भी.



दुख में भी जो साथ रहे

संग चलूं , मारूं ठहाका.

चुल्हा यदि जला दे तो

साथ क्यों न दूं हवा का.

दिखे कहीं भी शक्ति-पुंज

तो क्षमा-याचना मैं कर लूं.

निर्मल कर से स्पर्श करे

तो मानूं उसकी सत्ता भी.

हो घना यदि कोई दरख्त

तो मांगूं एक पत्ता भी.



देखूं लहराता भुजा वीर की

सहर्ष कटा लूं अपना सिर.

मिल जाये कोई सच्चा दिल

तो मानूं खुद को काफ़िर.

अग्नि-पथ पर साथ चले

तो संग चलूं जीवन भर मैं.

"क्रांतिदूत" पथ चलूं अकेला

भांङ में जाये जत्था भी.

हो घना यदि कोई दरख्त

तो मांगूं एक पत्ता भी.

Wednesday, July 13, 2011

यह इंसानों की बस्ती है.

सच नकाब में होता है , यहां नहीं नंगा कोई.

सबका दिल घायल घायल यहां नहीं चंगा कोई.

सच्चे प्यार - मोहब्बत पर नफ़रतों की गश्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.



बङे-बङे महलों के आगे सङकों पर बच्चे सोते हैं.

महलों में कितनी बेचैनी है ,वहां भी सारे रोते हैं.

रोटी बिकती मंहगी है पर बंदूकें काफ़ी सस्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.



सबके अपनें जात बने हैं सबका अपना मजहब है.

न कोई अपना कोई पराया , खुदी से ही मतलब है.

रुपयों में बिकता जिस्म है रुपयों से ही मस्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.



घर के दुधिया रौशन में अब चांद नहीं दिखता है.

मन के कारे बदरी में अब तो सूरज भी छिपता है.

नहीं जानता एक दिन सबकी डूबनेवाली किश्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.

Wednesday, June 29, 2011

मैं ,मेरी श्रीमतीजी और......( भाग-२१, व्यंग्य)



अब ससुरजी के सिवा और कोई नहीं था जो मेरी समस्या हल कर दे..मैं उनके पास गया ,पर जाते ही बिना कुछ सुने कहने लगे----" दामादजी अभी तक चार वेद और अठारह पुराण लिखे गये हैं. मैं उन्नीसवां पुराण लिख रहा हूं....जिसका नाम है भ्रष्ट-पुराण. आपको शुरुआत की पंक्तियां सुनाता हूं.---



लिखत व्यास हो मुदित देख मुख भक्त भ्रष्टण के

हर्षित गावत हरि-लीला, हर-लोभी, हरे-रुपयण के

भ्रष्टाचार - विरोधी जन-जन के सकुशल दमन के

हृदय-भाव भांपत कवि महा-भारत के जन-गण के.



व्यास उवाच

स्वर्ग-भूमि से महर्षि नारद भारत भूमि जावत है.

देव दनुज और नर-नारि सबहिं को भ्रष्ट पावत हैं.

लोक-सभा के केंटिन में सस्ता रस्गुल्ला खावत हैं.

प्रभु के लिये वहां से मंहगी पेप्सी-कोला लावत हैं.



अर्थ और भूगोल विविधता देख स्वं में खोवत हैं

सुनकर कथा काले धन की फ़ूट-फ़ूटकर रोवत हैं.

खाली पेट पंद्रह - रुपये का पानी पीकर सोवत हैं.

नर किन्नर पशु पक्षी सभ के दुख-गठरी ढोवत है.



न सहत जात नारद से तब खोपङिया तनिक घुमावत हैं.

स्वर्ग - लोक में नारायण को फ़ोनहिं से हाल सुनावत हैं.

वोट लीला का मानचित्र तब हर्षित हो प्रभु को दिखावत हैं.

एक-एक कर काले धन का डाटा पलभर में ही लिखावत हैं.



सुनकर व्यथा भारत माता की स्वयं नारायण रो रहा था.

नरक की तरह अर्थ पर भी अर्थ का अनर्थ हो रहा था.



नारायण उवाच



तेरे दुख को देख रहा हूं स्वर्ग लोक से.

हे नारद, होकर सहज निष्कर्ष बताओ.

पता है गैस-सिलिन्डर मंहगा हुआ है.

कैसे हुआ मुद्रास्फ़िति का उत्कर्ष बताओ.

संसद भवन स्वर्ग-लोक से भी दिखता है.

निर्धन जन करते कितना संघर्ष बताओ.

बलात्कार और हत्या की बातें रहने दो.

हो कोई अच्छी खबर तो सहर्ष बताओ.



नारद उवाच



नारायण नारायण कुछ भी सहज नहीं है.

कीचङ का सागर फ़ैला पर जलज नहीं है.

कंस और रावण घर घर में बैठे दिखते हैं.

धृत-राष्ट्र को हस्तिनापुर की गरज नहीं है.



(प्रिय ब्लोगर बंधुओं, भ्रष्ट-पुराण की रचना अभी जारी है.पूरा होने पर इसे अलग से प्रकाशित किया जायेगा. इस संबंध में आप सब के सुझाव सादर आमंत्रित हैं. कृपया सुझाव टिप्पणी या मेल- अथवा फ़ोन न-९७५२४७५४८१ पर भेजें.साकारात्मक सुझाव भेजनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को मेरी स्वरचित काव्य---"मां ने कहा था" भेंटस्वरुप निःशुल्क भेजा जायेगा.) क्रमश:

Tuesday, June 28, 2011

मैं ,मेरी श्रीमतीजी और......( भाग-२०, व्यंग्य)



मैंने समझाया----"लेकिन राज्य का विकास तो हो रहा है ना ?"

"अरे जीजे.....राज्य के विकास के चक्कर में अपुन का विकास तो रुक गया न. अपुन गांव जायेगा तो अपटी खेत में मारा जायेगा. अब तो सरकार रोजगार का गारंटी दे रहा है, अब अपुन के पिच्छु-पिच्छु कौन घूमेगा. उपर से नौकरी में भी उपर का इनकम बंद हो गयेला है. मुख्य-मंत्री बोलता है कि कोई घूस मांगता है तो उसके मूंह पे मूत दो, अपुन कोई शौचालय का टंकी थोङे ही है. उपर से मूतनेवाले के पास भी इमानदारी का सर्टिफ़िकेट तो है नहीं.नर-मूत्र के बदले गौ-मूत्र पिलाया जाता तो पी भी लेता."

मैंने चुटकी ली----"क्यों नहीं, जब गाय का चारा खा सकते हो तो गौ-मुत्र पीने में हर्ज ही क्या है." लेकिन वह गुस्सा गया, बोला----"जीजे.....गाय का चारा खाना मामुली बात है क्या..?...अपुन एक थाली में गाय का चारा रखता है कोई खा के दिखाये. चारे का चार दाना तो चबा नहीं पायेगा कि सारा का सारा दांत हाथ में आ जायेगा. एक तो अपुन लोग गाय का चारा खाया उपर से गौ माता को स्कूटर और बाईक से एक शहर से दूसरे शहर घुमाया....फ़िए भी पब्लिक नाराज है."

जिस तरह राजनेता लाचार पब्लिक को मूल मुद्दे से ध्यान हटाकर फ़ालतू बात करते हैं उसी तरह राजा मेरे साथ कर रहा था. बेकार इस तरह की बातों से फ़ायदा ही क्या था. मैंने सीधे पूछा----" तुम गांव जाओगे या नहीं?" मेरा प्रश्न तो द्वि-वैकल्पिक था लेकिन राजा का जवाब दीर्घ-उत्तरीय निकला----"अपुन देश का नागरिक है और पूरा देश अपुन का है. कोई माई का लाल अपुन को शहर से गांव नहीं भेज सकता. अपुन चाहेगा तो मुम्बई में रहेगा, चाहेगा तो दिल्ली में. दूसरी बात साला साधू हो या गुंडा जीजा पर उसका भी हक है. तीसरी बात हम टपोरी का वायलेन्स से उतना प्रोबलेम नहीं है जितना जेन्टलमेन लोगों के सायलेन्स से है. अपुन तो कहेगा कि हम लोग क्राईम करता है तो काहे को एसी जेल में रखकर गरमा-गरम पूरी खिलाता है, चुप रहनेवाले जेन्टलमेन लोगों को चौराहे पर चप्पल मारो...सब ठीक हो जायेगा." अब मुझसे सहा नहीं जा रहा था---"यानि कि भद्र-पुरुशों को दंडित किया जाये..?" उसने बीच में ही टोका----" नहीं, सबकुछ आंखों के सामने देखकर भी चुप रहनेवाले पावरलेस जेन्टलमेन को पनिश करो तो सब ठीक हो जायेगा. अपुन जैसा माइनोरिटी में रहनेवाला क्रिमिनल जुबान काट लेता है जबकि मेजोरिटी वाला जेन्टलमेन लोग जुबान खोलने में भी शरम करता है.कितना शरम की बात है जीजे."

सालेजी के जुबान से कोई बात निकल जाये और वह उसे जस्टिफ़ाई न कर दे ये कैसे हो सकता है.



क्रमशः अगले भाग मे ससुरजी का भ्रष्ट-पुराण

Friday, June 24, 2011

मैं ,मेरी श्रीमतीजी और......( भाग-१९, व्यंग्य)




राजा को घर से निकालना मामुली काम नहीं था, लेकिन प्रयास तो किया ही जा सकता था.मैंने सीधे तौर पर यह बात राजा से कहना उचित नहीं समझा क्योंकि उसकी भाषा ठीक नहीं है. स्वाभिमान की रक्षा के साथ-साथ सम्मान की भी रक्षा करनी थी.मैंने श्रीमतीजी को धीरे से समझाया------" सालेजी(राजा) का व्यवहार मुझे पसंद नहीं है"

"अपना व्यवहार ठीक रखोगे तो सब का व्यवहार पसंद आयेगा"

"उसने मेरे बेटे को चड्ढीलाल कहकर बेइज्जत किया है."

"तुम्हारा बेटा उसका भी भांजा है. वह चड्ढीलाल प्यार से बोला होगा."

"लेकिन उसके इस व्यवहार से मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंचा है."

" मेरे और मेरे माइके वालों से अच्छा संबंध चाहते हो तो स्वाभिमान से समझौता कर लो."

" लेकिन पिता के रुप में मेरा फ़र्ज बनता है कि बेटे का साथ दूं."

"पिता का फ़र्ज बच्चे की पढाई-लिखाई और देखभाल करना होता है न कि मामा-भांजे में कङुआहट पैदा करना"

वह एक तरफ़ चाकू से सब्जी काट रही थी तो दूसरी तरफ़ बङी बेरहमी से मेरे सटीक तर्कों के टुकङे कर रही थी.अब तर्कों के बदले सीधी बात कहना ही उचित था----"अपने भई राजा से कह दो कि बोरिया-बिस्तर समेटकर गांव चला जाये."

" बिल्कुल नहीं. मैं ऐसा नहीं कर सकती और तुम्हें भी ऐसा नहीं करने दुंगी. खबरदार जो इस तरह की बात जुबां पर लाये"

मैं जान रहा था कि राजा ने अपनी प्यारी बहना को बाबागिरि से कमाये नोटों की गड्डी थमा दी थी. अर्थ अनर्थ कर रहा था. फ़िर मैं थोङा सा इमोशनल टच देकर श्रीमती जी को पक्ष में करना चाहा---" तुम तो मुझे पति-परमेश्वर कहती हो फ़िर भी मेरी बात नहीं मानोगी?"

" पति तो परमेश्वर होता ही है लेकिन भाई भी भगवान होता है. तुम कैसे भी इमोशनल अत्याचार कर मुझे अपने भाई के खिलाफ़ नहीं कर सकते."

इमोशन तो मेरी श्रीमतीजी में कूट-कूटकर भरी हुई है लेकिन मायकेवालों के लिये.रुपये के बल पर राजा मेरे घर में राज कर रहा था. तभी टिंकू अपने दोनो हाथों से एक-एक आइस्क्रीम खाते हुए हमारे पास आया और मम्मी से कहने लगा---" मम्मी, मामाजी मुझे बहुत प्यार करते हैं, देखो न दो-दो आइसक्रीम दिया है". श्रीमतीजी ने पूछा---" तो फ़िर पापा से मामा की शिकायत क्यों की ?"

" पापा से तो मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि मामाजी मुझे प्यार से चड्ढीलाल बुलाते हैं."

जब मेरा बेटा ही दो आइसक्रीम के बदले अपना ईमान बेच लिया था तो अर्थ का इससे बढकर अनर्थ क्या हो सकता था. इस तरह के छोटे-छोटे कमीशन के चक्कर में तो लोग देश तक से गद्दारी कर देते हैं, पिता-पुत्र के संबंध का मोल ही क्या है ?.उपर से श्रीमतीजी मेरी तरफ़ आंखों में क्रोध और दया भाव को मिक्स करते हुए देख रही थी. वह तनिक जोर से बोली---"क्या कहूं तुझे....अपने ही घर की खुशी तुमसे देखी नहीं जाती?...राजा को बेईज्जत कर घर भेजने जैसा अनर्थ करवाना चाहते थे मुझसे.?" तभी बीच में राजा आ टपका---" कौन सा अनर्थ करवाना चाहते थे बहना, मुझे बता.". मैंने हालात को सम्हालना चाहा---"मैंने चाय बनाने के लिये.....बोला तो बोली कि अनर्थ करवाना चाहते थे"

" जीजे... अपुन तेरे को समझा देता है......अभी दो बजे दिन में चाय का टाईम है क्या ? ऐसा बोल के तुम किसी औरत को टोर्चर करेगा तो सीधा फ़ोर-नाइन्टी के मामले में अन्दर जायेगा.......और तू चिन्ता मत कर बहना, मेरे ढाई किलो के हाथ की कलाई पर जो राखी बांधा है न तुमने...उसकी कसम कोई भी टोर्चर करे तो अपुन को बताना"

श्रीमतीजी राजा की बातों से ज्यादा ही उत्साहित हो रही थी. भाई के प्रति स्नेह ने आंखों मे सैलाब भी ला दिया था. वह भाइ के कलाई को हाथ में लेकर गाना गाने लगी-------

"भैया मेरे , राखी के बंधन को निभाना.

.लगा दे अपने जीजा को ठिगाना, ठिगाना"

अपनी बहन की आंखों में आंसू देखकर राजा की आंखों से अंगारे टपकने लगे. स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा तो दूर अब तो जान बचाना भी मुश्किल लग रहा था. अब आत्म-रक्षार्थ सच बोल देना ही ठीक था----

" ऐसी कोई बात नहीं है राजा. मैं चाहता था कि तुम गांव (बिहार) चले जाओ"

"ऐसा क्यों बोल रहा है जीजे. अपुन कुछ भी कर सकता है लेकिन गांव नहीं जा सकता"

"गांव क्यों नहीं जा सकते?"

"काहे कि अपने यहां का सरकार बदल गया है. नया सरकार में अपहरण और फ़िरौती का धंधा पूरा चौपट हो गया है. लालटेन बुझाकर लोग अब बिजली जलाता है. साला चोरी करना भी पोसिबुल नहीं रह गया है. उपर से पुलिस और कोर्ट इतना टाईट हो गया है कि जितना भी अपराधिक किसिम का जेन्टल्मेन लोग है उसे जेल में ठूस देता है. पहले का फ़ालतू लोग भी अब नौकरी करने लगा है. रैला भी निकालना बंद हो गया है. पहले रोड पे बाईक चलाता था तो फ़िलम के स्टंट जैसा लगता था, अब जब हेमा-मालिनी डोकरिया हो गयी है तब जाके रोड चिकना हुआ है. सबसे बङका प्रोबलेम तो एडुकेशन डिपार्टमेंट में हुआ है, जिस स्कूल में अपनी भैंसिया रहती थी उसमे टीचर लोगों को भेज दिया है आ बच्चा सबको सायकिल दे दिया है.सायकिल के चक्कर मे लङका आ लङकी लोग गाय बकरी चराना ही बंद कर दिया है. गाय-बकरी सब खुल्ला घूम रहा है---सारा फ़सल बरबाद हो रहा है. पहले फ़सल तो बचता था भले ही लोग गैया का चारा खा जाता था"



Monday, June 20, 2011

मानसून



एक अरसा गया कल वो आयी थी घर

वह छिटकती रही प्रेम के पात पर,

मैं हंसा जा रहा , वो बरसती रही.

मैं पिया जा रहा , वो तरसती रही.



एक मौसम वो थी खूब तरसा था मैं

प्रेम बूंदें बिना कितना झुलसा था मैं.

सोचा , बेवफ़ा अब नहीं आयेगी.

ये सूखी जमीं उसको क्यों भायेगी?

रात भर जिस्म से वह फ़िसलती रही.

मैं जमा जा रहा वह पिघलती रही.



पहले चांद को ढक अंधेरा किया

बन बिजली गजब वो बखेरा किया.

सोचकर रुक गयी वो मेरी चाहतें.

मैं था सोया हुआ दे गयी आहटें.

छम-छम बूंद सी वो छमकती रही.

प्यारी - पाजेब सी वो छनकती रही.

Wednesday, April 27, 2011

चुप्पी



बीच चौराहे पर दो-तीन गुंडों ने सेठ की गाङी रोक दी और अंधा-धुंध फ़ायरिंग की. सेठ वहीं ढेर हो गया. तभी किसी ने पुलिस को सूचना दी. पुलिस आयी और पूछताछ करने लगी. इंसपेक्टर ने कहा--- " बीच चौराहे पर किसी को गोली मारी गयी और किसी ने नहीं देखा ? ये कैसे हो सकता है ? कोई तो सच-सच बताओ कि गोली किसने चलायी." अपराधी तो वहां से भाग चुके थे पर किसी भद्र-जन ने अपनी चुप्पी नहीं तोङी. तभी एक अस्सी साल का बूढा सामने आकर कहा....."Gentleman such offens is niver committed  due to the violence of bad people but the silence of good people    (ऐसे अपराध गिने-चुने बुरे लोगों की हिसा की वजह से नहीं बल्कि ढेर सारे अच्छे लोगों की चुप्पी की वजह से होती है.)

Thursday, April 21, 2011

तुम दूर ही रहो.





मेरे निकट मत आना.

बेईमानी की बदबू से

दम घुटेंगे तुम्हारे.

चमकते चिकने चेहरे की

बदसूरत और टेढी-मेढी

झूठी रेखाएं

साफ़-साफ़ दिख जायेंगी.

भावनाओं और विचारों की

हत्या करनेवाले हाथ

खून से इस तरह रंगे मिलेंगे

कि निशान भी नहीं देख सकोगे

ईंसानों की भाग्य-रेखा का.

अपने छोटे से पेट के लिये

चट कर चुका हूं

कुरान की आयतों को.

छोटे से मांसल गुल्ली से

मूत चुका हूं

गीता के श्लोकों पर.

नहीं देख पाओगे

लाखों कोशिकाओं के बीच

की लम्बी दरारें.

नहीं झेल पाओगे

खूबसूरत मांसल जिस्म के

बीच की नर-कंकाल को.

बिल्कुल नहीं सह पाओगे

यह कि तुम

मेरे दिल में नहीं ठहर सकते

इसका कई बार पोस्टमार्टम हो चुका है.

Monday, April 18, 2011

सेक्स,प्यार,स्वाभिमान और पतन

सेक्स




विशाल पेंङ के

मोटे डन्टल के चारो ओर

हरी, परपोषी, अबला

लताओं का चिपक जाना

और धीरे-धीरे

वृक्ष के विशाल रस-भंडार को

चूस लेना.



प्यार



बूढे-घने दरख्तों के बीच

पतले युवा पेंङ का

संकीर्ण खाली जगह से

मूंह निकालकर

सुनहली किरणों को

कामुक होकर छूना.



स्वाभिमान



तना के निचले हिस्से

की झुकी हुई डालियों के

काट दिये जाने के बाद

अपना भविष्य जानते हुए भी

मुख्य सिरा का

उपर आसमान की ओर

बेअटक देखना.



पतन



विशाल पेङ की

खूबसूरत, गगनचुंबी

हरी पत्तियों का

सूखकर रंग बदल जाना

फ़िर कुछ ही देर में

स्वतः गिरकर

उबङ-खाबङ जमीन से

चिपक जाना