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Friday, August 1, 2014

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Wednesday, June 29, 2011

मैं ,मेरी श्रीमतीजी और......( भाग-२१, व्यंग्य)



अब ससुरजी के सिवा और कोई नहीं था जो मेरी समस्या हल कर दे..मैं उनके पास गया ,पर जाते ही बिना कुछ सुने कहने लगे----" दामादजी अभी तक चार वेद और अठारह पुराण लिखे गये हैं. मैं उन्नीसवां पुराण लिख रहा हूं....जिसका नाम है भ्रष्ट-पुराण. आपको शुरुआत की पंक्तियां सुनाता हूं.---



लिखत व्यास हो मुदित देख मुख भक्त भ्रष्टण के

हर्षित गावत हरि-लीला, हर-लोभी, हरे-रुपयण के

भ्रष्टाचार - विरोधी जन-जन के सकुशल दमन के

हृदय-भाव भांपत कवि महा-भारत के जन-गण के.



व्यास उवाच

स्वर्ग-भूमि से महर्षि नारद भारत भूमि जावत है.

देव दनुज और नर-नारि सबहिं को भ्रष्ट पावत हैं.

लोक-सभा के केंटिन में सस्ता रस्गुल्ला खावत हैं.

प्रभु के लिये वहां से मंहगी पेप्सी-कोला लावत हैं.



अर्थ और भूगोल विविधता देख स्वं में खोवत हैं

सुनकर कथा काले धन की फ़ूट-फ़ूटकर रोवत हैं.

खाली पेट पंद्रह - रुपये का पानी पीकर सोवत हैं.

नर किन्नर पशु पक्षी सभ के दुख-गठरी ढोवत है.



न सहत जात नारद से तब खोपङिया तनिक घुमावत हैं.

स्वर्ग - लोक में नारायण को फ़ोनहिं से हाल सुनावत हैं.

वोट लीला का मानचित्र तब हर्षित हो प्रभु को दिखावत हैं.

एक-एक कर काले धन का डाटा पलभर में ही लिखावत हैं.



सुनकर व्यथा भारत माता की स्वयं नारायण रो रहा था.

नरक की तरह अर्थ पर भी अर्थ का अनर्थ हो रहा था.



नारायण उवाच



तेरे दुख को देख रहा हूं स्वर्ग लोक से.

हे नारद, होकर सहज निष्कर्ष बताओ.

पता है गैस-सिलिन्डर मंहगा हुआ है.

कैसे हुआ मुद्रास्फ़िति का उत्कर्ष बताओ.

संसद भवन स्वर्ग-लोक से भी दिखता है.

निर्धन जन करते कितना संघर्ष बताओ.

बलात्कार और हत्या की बातें रहने दो.

हो कोई अच्छी खबर तो सहर्ष बताओ.



नारद उवाच



नारायण नारायण कुछ भी सहज नहीं है.

कीचङ का सागर फ़ैला पर जलज नहीं है.

कंस और रावण घर घर में बैठे दिखते हैं.

धृत-राष्ट्र को हस्तिनापुर की गरज नहीं है.



(प्रिय ब्लोगर बंधुओं, भ्रष्ट-पुराण की रचना अभी जारी है.पूरा होने पर इसे अलग से प्रकाशित किया जायेगा. इस संबंध में आप सब के सुझाव सादर आमंत्रित हैं. कृपया सुझाव टिप्पणी या मेल- अथवा फ़ोन न-९७५२४७५४८१ पर भेजें.साकारात्मक सुझाव भेजनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को मेरी स्वरचित काव्य---"मां ने कहा था" भेंटस्वरुप निःशुल्क भेजा जायेगा.) क्रमश:

Tuesday, June 28, 2011

मैं ,मेरी श्रीमतीजी और......( भाग-२०, व्यंग्य)



मैंने समझाया----"लेकिन राज्य का विकास तो हो रहा है ना ?"

"अरे जीजे.....राज्य के विकास के चक्कर में अपुन का विकास तो रुक गया न. अपुन गांव जायेगा तो अपटी खेत में मारा जायेगा. अब तो सरकार रोजगार का गारंटी दे रहा है, अब अपुन के पिच्छु-पिच्छु कौन घूमेगा. उपर से नौकरी में भी उपर का इनकम बंद हो गयेला है. मुख्य-मंत्री बोलता है कि कोई घूस मांगता है तो उसके मूंह पे मूत दो, अपुन कोई शौचालय का टंकी थोङे ही है. उपर से मूतनेवाले के पास भी इमानदारी का सर्टिफ़िकेट तो है नहीं.नर-मूत्र के बदले गौ-मूत्र पिलाया जाता तो पी भी लेता."

मैंने चुटकी ली----"क्यों नहीं, जब गाय का चारा खा सकते हो तो गौ-मुत्र पीने में हर्ज ही क्या है." लेकिन वह गुस्सा गया, बोला----"जीजे.....गाय का चारा खाना मामुली बात है क्या..?...अपुन एक थाली में गाय का चारा रखता है कोई खा के दिखाये. चारे का चार दाना तो चबा नहीं पायेगा कि सारा का सारा दांत हाथ में आ जायेगा. एक तो अपुन लोग गाय का चारा खाया उपर से गौ माता को स्कूटर और बाईक से एक शहर से दूसरे शहर घुमाया....फ़िए भी पब्लिक नाराज है."

जिस तरह राजनेता लाचार पब्लिक को मूल मुद्दे से ध्यान हटाकर फ़ालतू बात करते हैं उसी तरह राजा मेरे साथ कर रहा था. बेकार इस तरह की बातों से फ़ायदा ही क्या था. मैंने सीधे पूछा----" तुम गांव जाओगे या नहीं?" मेरा प्रश्न तो द्वि-वैकल्पिक था लेकिन राजा का जवाब दीर्घ-उत्तरीय निकला----"अपुन देश का नागरिक है और पूरा देश अपुन का है. कोई माई का लाल अपुन को शहर से गांव नहीं भेज सकता. अपुन चाहेगा तो मुम्बई में रहेगा, चाहेगा तो दिल्ली में. दूसरी बात साला साधू हो या गुंडा जीजा पर उसका भी हक है. तीसरी बात हम टपोरी का वायलेन्स से उतना प्रोबलेम नहीं है जितना जेन्टलमेन लोगों के सायलेन्स से है. अपुन तो कहेगा कि हम लोग क्राईम करता है तो काहे को एसी जेल में रखकर गरमा-गरम पूरी खिलाता है, चुप रहनेवाले जेन्टलमेन लोगों को चौराहे पर चप्पल मारो...सब ठीक हो जायेगा." अब मुझसे सहा नहीं जा रहा था---"यानि कि भद्र-पुरुशों को दंडित किया जाये..?" उसने बीच में ही टोका----" नहीं, सबकुछ आंखों के सामने देखकर भी चुप रहनेवाले पावरलेस जेन्टलमेन को पनिश करो तो सब ठीक हो जायेगा. अपुन जैसा माइनोरिटी में रहनेवाला क्रिमिनल जुबान काट लेता है जबकि मेजोरिटी वाला जेन्टलमेन लोग जुबान खोलने में भी शरम करता है.कितना शरम की बात है जीजे."

सालेजी के जुबान से कोई बात निकल जाये और वह उसे जस्टिफ़ाई न कर दे ये कैसे हो सकता है.



क्रमशः अगले भाग मे ससुरजी का भ्रष्ट-पुराण

Friday, June 24, 2011

मैं ,मेरी श्रीमतीजी और......( भाग-१९, व्यंग्य)




राजा को घर से निकालना मामुली काम नहीं था, लेकिन प्रयास तो किया ही जा सकता था.मैंने सीधे तौर पर यह बात राजा से कहना उचित नहीं समझा क्योंकि उसकी भाषा ठीक नहीं है. स्वाभिमान की रक्षा के साथ-साथ सम्मान की भी रक्षा करनी थी.मैंने श्रीमतीजी को धीरे से समझाया------" सालेजी(राजा) का व्यवहार मुझे पसंद नहीं है"

"अपना व्यवहार ठीक रखोगे तो सब का व्यवहार पसंद आयेगा"

"उसने मेरे बेटे को चड्ढीलाल कहकर बेइज्जत किया है."

"तुम्हारा बेटा उसका भी भांजा है. वह चड्ढीलाल प्यार से बोला होगा."

"लेकिन उसके इस व्यवहार से मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंचा है."

" मेरे और मेरे माइके वालों से अच्छा संबंध चाहते हो तो स्वाभिमान से समझौता कर लो."

" लेकिन पिता के रुप में मेरा फ़र्ज बनता है कि बेटे का साथ दूं."

"पिता का फ़र्ज बच्चे की पढाई-लिखाई और देखभाल करना होता है न कि मामा-भांजे में कङुआहट पैदा करना"

वह एक तरफ़ चाकू से सब्जी काट रही थी तो दूसरी तरफ़ बङी बेरहमी से मेरे सटीक तर्कों के टुकङे कर रही थी.अब तर्कों के बदले सीधी बात कहना ही उचित था----"अपने भई राजा से कह दो कि बोरिया-बिस्तर समेटकर गांव चला जाये."

" बिल्कुल नहीं. मैं ऐसा नहीं कर सकती और तुम्हें भी ऐसा नहीं करने दुंगी. खबरदार जो इस तरह की बात जुबां पर लाये"

मैं जान रहा था कि राजा ने अपनी प्यारी बहना को बाबागिरि से कमाये नोटों की गड्डी थमा दी थी. अर्थ अनर्थ कर रहा था. फ़िर मैं थोङा सा इमोशनल टच देकर श्रीमती जी को पक्ष में करना चाहा---" तुम तो मुझे पति-परमेश्वर कहती हो फ़िर भी मेरी बात नहीं मानोगी?"

" पति तो परमेश्वर होता ही है लेकिन भाई भी भगवान होता है. तुम कैसे भी इमोशनल अत्याचार कर मुझे अपने भाई के खिलाफ़ नहीं कर सकते."

इमोशन तो मेरी श्रीमतीजी में कूट-कूटकर भरी हुई है लेकिन मायकेवालों के लिये.रुपये के बल पर राजा मेरे घर में राज कर रहा था. तभी टिंकू अपने दोनो हाथों से एक-एक आइस्क्रीम खाते हुए हमारे पास आया और मम्मी से कहने लगा---" मम्मी, मामाजी मुझे बहुत प्यार करते हैं, देखो न दो-दो आइसक्रीम दिया है". श्रीमतीजी ने पूछा---" तो फ़िर पापा से मामा की शिकायत क्यों की ?"

" पापा से तो मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि मामाजी मुझे प्यार से चड्ढीलाल बुलाते हैं."

जब मेरा बेटा ही दो आइसक्रीम के बदले अपना ईमान बेच लिया था तो अर्थ का इससे बढकर अनर्थ क्या हो सकता था. इस तरह के छोटे-छोटे कमीशन के चक्कर में तो लोग देश तक से गद्दारी कर देते हैं, पिता-पुत्र के संबंध का मोल ही क्या है ?.उपर से श्रीमतीजी मेरी तरफ़ आंखों में क्रोध और दया भाव को मिक्स करते हुए देख रही थी. वह तनिक जोर से बोली---"क्या कहूं तुझे....अपने ही घर की खुशी तुमसे देखी नहीं जाती?...राजा को बेईज्जत कर घर भेजने जैसा अनर्थ करवाना चाहते थे मुझसे.?" तभी बीच में राजा आ टपका---" कौन सा अनर्थ करवाना चाहते थे बहना, मुझे बता.". मैंने हालात को सम्हालना चाहा---"मैंने चाय बनाने के लिये.....बोला तो बोली कि अनर्थ करवाना चाहते थे"

" जीजे... अपुन तेरे को समझा देता है......अभी दो बजे दिन में चाय का टाईम है क्या ? ऐसा बोल के तुम किसी औरत को टोर्चर करेगा तो सीधा फ़ोर-नाइन्टी के मामले में अन्दर जायेगा.......और तू चिन्ता मत कर बहना, मेरे ढाई किलो के हाथ की कलाई पर जो राखी बांधा है न तुमने...उसकी कसम कोई भी टोर्चर करे तो अपुन को बताना"

श्रीमतीजी राजा की बातों से ज्यादा ही उत्साहित हो रही थी. भाई के प्रति स्नेह ने आंखों मे सैलाब भी ला दिया था. वह भाइ के कलाई को हाथ में लेकर गाना गाने लगी-------

"भैया मेरे , राखी के बंधन को निभाना.

.लगा दे अपने जीजा को ठिगाना, ठिगाना"

अपनी बहन की आंखों में आंसू देखकर राजा की आंखों से अंगारे टपकने लगे. स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा तो दूर अब तो जान बचाना भी मुश्किल लग रहा था. अब आत्म-रक्षार्थ सच बोल देना ही ठीक था----

" ऐसी कोई बात नहीं है राजा. मैं चाहता था कि तुम गांव (बिहार) चले जाओ"

"ऐसा क्यों बोल रहा है जीजे. अपुन कुछ भी कर सकता है लेकिन गांव नहीं जा सकता"

"गांव क्यों नहीं जा सकते?"

"काहे कि अपने यहां का सरकार बदल गया है. नया सरकार में अपहरण और फ़िरौती का धंधा पूरा चौपट हो गया है. लालटेन बुझाकर लोग अब बिजली जलाता है. साला चोरी करना भी पोसिबुल नहीं रह गया है. उपर से पुलिस और कोर्ट इतना टाईट हो गया है कि जितना भी अपराधिक किसिम का जेन्टल्मेन लोग है उसे जेल में ठूस देता है. पहले का फ़ालतू लोग भी अब नौकरी करने लगा है. रैला भी निकालना बंद हो गया है. पहले रोड पे बाईक चलाता था तो फ़िलम के स्टंट जैसा लगता था, अब जब हेमा-मालिनी डोकरिया हो गयी है तब जाके रोड चिकना हुआ है. सबसे बङका प्रोबलेम तो एडुकेशन डिपार्टमेंट में हुआ है, जिस स्कूल में अपनी भैंसिया रहती थी उसमे टीचर लोगों को भेज दिया है आ बच्चा सबको सायकिल दे दिया है.सायकिल के चक्कर मे लङका आ लङकी लोग गाय बकरी चराना ही बंद कर दिया है. गाय-बकरी सब खुल्ला घूम रहा है---सारा फ़सल बरबाद हो रहा है. पहले फ़सल तो बचता था भले ही लोग गैया का चारा खा जाता था"



Monday, March 14, 2011

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१८ (व्यंग्य)



राजा ने अपना प्रवचन जारी रखा----"वोही हनुमान जब बङा हुआ तो रावन का लंका जो सोना का बना हुआ था, जलाकर राख कर दिया. यानि कि पीला-धन को काला-धन बना दिया. तब का रावण भले घमंडी था लेकिन कलियुग के रावण के माफ़िक काला धन नहीं रखता था इसलिये उसका लंका सोने का था. भले ही हनुमानजी ने रावण का पीला धन को काला धन में बदल दिया लेकिन उस टाइम का राम लंका के उस काला-धन को ईंडिया नहीं ला सका. अपुन उम्मीद करता है कि कलियुग का देव बाबा रामदेव स्विस बैंक में रखा हुआ काला-धन इंडिया ले आयेगा. वैसे अपुन हनुमानजी पे बोल रहा है तो एक बात बता देता है कि तब के राम और आज का रामदेव के बीच का मेजर डिफ़रेन्स येही है कि त्रेता का राम बल-बुद्धि और विद्या के धनी वानर पे भरोसा करता था जबकि कलियुग का बाबा रामदेव वानर के बदले दुष्ट-नर पर भरोसा करता है."



राजा को खुद नहीं पता था कि उसने रामचरितमानस से रामदेवचरितमानस की ओर टर्न ले लिया था. फ़िर भी सौ चूहे खाकर हज की यात्रा का निर्णय लेना ही बहुत बङी बात होती है.अपराधिक प्रवृति का व्यक्ति यदि प्रवचन दे रहा था तो यह बहुत बङी बात थी, भले ही वह भगवान राम के बदले बाबा रामदेव को ही क्यों न प्रवचन का विषय बना ले.उसका प्रवचन निरन्तर रहा-------" कलियुग का बाबा रामदेव कालाधन को पीलाधन तो बनायेगा ही. उपर से बाबा ये भी बोलता है कि अपुन के देश में जहां खुशहाली और समृद्धि का नाली भी नहीं बहता है वहां खुशियों की गंगा बहायेगा. शराब ,तम्बाकू , गुटखा के उत्पादन और प्रसार को रोकेगा. एक-एक आदमी के किडनी और लीवर को दुरुस्त करेगा. भले ही ये सब करते-करते करोङो बेईमानो का हार्ट ब्रेक कर जाये लेकिन लोक-सभा में सैकङो इमानदारों को जरूर पहुंचायेगा. यानी कि सीधी बात------


भ्रष्टाचार को शिष्टाचार पढायेगा

कालाधन को पीलाधन बनायेगा

विदेशी के बदले स्वदेशी चलायेगा.

विलेन्टाइन डे के बदले बसंत-पंचमी मनायेगा.

मल्लिका शेरावत को सलवार-सूट पहनायेगा.

अंग्रेजियत को हिन्दी सिखायेगा

राम-राज्य से रोम-राज्य भगायेगा."


तभी मेरा दस साल का बेटा टिंकू बोल पङा----"मामा प्रवचन सुना रहे हो या कविता गा रहे हो ?" राजा को भांजा का विरोध बर्दाश्त नहीं हुआ----" चुप रह चड्ढीलाल. तू क्या बोलेगा. तू भी सत्ता पक्ष के सांसद की तरह बात करने लगा है. अच्छी बात प्रवचन से कहूं या कविता गाकर.....बात सही है तो सही है.-----भक्तों---इसी तरह कलियुग के देवता बाबा रामदेव का भी छोटे कद का बच्चा जैसा लोग विरोध करता है कि बाबा योग के साथ-साथ राजनीति काहे को करता है. काहे को बेईमान लोगों के चेहरे का नकाब उठाता है. काहे को गङे मुर्दे को जमीन से निकालता है---लेकिन बाबा रामदेव अपुन के जैसे ताल ठोकता है. गङे मुर्दे को जमीन से निकालता है--पोस्टमार्टम करने को. ओ पोस्टमार्टम करेगा और जांच करेगा कि कुछ जिन्दा और मुर्दा लोग कैसे पुरे देश का किडनी और लीवर बर्बाद कर दिया. ओ तो गनीमत है कि अपुन के देश का हार्ट इतना मजबूत है कि अभी भी बोडी दुरुस्त काम कर रहा है. उपर से बाबा है तो बांकी पार्ट भी ठीक हो जायेगा. जब बाबा अपने पेट को सटकाता है तो उसका थ्री-डाइमेन्सनल पेट टू-डाइमेन्सनल प्लेन बन जाता है. जरूर ही ओ नेताओं और बेईमानों का बढा हुआ मल्टी-डाइमेन्सनल पेट को प्लेन बना देगा.अपुन अब आज का प्रवचन बंद करता है कल बाबा रामदेव के माफ़िक योगासन सिखायेगा"



लोगों के जाते समय भक्तों के चढावे से पूजा की थाल रुपयों से भर गयी थी. श्रीमतीजी, ससुरजी, सासू-मां, चिन्टी और खुद राजा उसे देखकर आत्म-विभोर हो रहे थे. मैं चाहकार भी खुश कैसे हो सकता था. जब से प्रवचन शुरु हुआ था मां लक्ष्मी घर में रोज पधार रही थी और सारा श्रेय मेरे साला राजा को मिल रहा था. मैं तो अपने घर में ही परायों सा महसूस कर रहा था. लेकिन आज मेरा बेटा टिन्कू भी नाराज दिख रहा था. उसने अपने दुख का राज मेरे सामने प्रगट किया---"पापा...आज सबके सामने मामाजी ने फ़िर से मुझे चड्ढीलाल कहकर पुकारा" . मेरे दिल में जल रहे आग को घी की जरुरत थी जिसे मेरे बेटे ने फ़्री में सप्लाई कर दिया था. राजा के प्रवचन को रुकवाने का एक मजबूत काट मुझे मिल गया था. मैंने टिंकू को समझाया ---- " अब देख बेटा....किस तरह मैं तुम्हारे मामा का प्रवचन भी बंद करवाता हूं और बोरिया-बिस्तर समेंटकर गांव भी भिजवाता हूं. उसने तुम्हारे साथ-साथ मेरे स्वाभिमान को भी ठेंस पहुंचाया है."



क्रमशः

Monday, February 7, 2011

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१७ (व्यंग्य)




इधर साला एक अजीब योजना पर कार्य कर रहा था. योजना क्या मैं तो कहता हूं साजिश रच रहा था कि किस तरह मेरी बची-खुची इज्जत को सुपुर्दे खाक किया जाये. मैंने उसके आने के साथ ही उसे बता दिया था कि चोरी, डकैती, अपहरण आदि व्यवसाय जो वह गांव में चलाया करता था ...नहीं चलेगा. कहने लगा----" जीजे , ये सब काम अपुन का प्रोफ़ेशन नहीं है. अपुन का प्रोफ़ेशन तो क्लर्क की नौकरी है जिससे उपरवाला अपुन को छप्पर फ़ाङ के देता है. एक नम्बर और दो नम्बर का इनकम तो अपुन को नौकरी से ही हो जाता है. बाहर का धंधा तो अपुन का शौक है जीजे. लेकिन अपुन महिन दो महिने के छुट्टी पे आयेला है तो किच्छु तो करेगा ?". मैने भी उसी के लहजे में समझाया----" आयेला है तो अच्छी बात है पर चोरी, डकैती, अपहरण ये सब इधर नहीं चलेला है. इधर घर के बांकी लोगों की तरह घर में ही रहना है भले है संयुख राष्ट्र के माफ़िक इटिंग मिटिंग और चिटिंग करते रहो ." वह मान गया----" ठीक है जीजे. अपुन घर से बाहर निकलेगा ही नहीं बट घर में फ़्री होके रहेगा....मस्ती करेगा...जो जी चाहे करेगा." मैंने फ़िर टोका---" नो मेरे घर में रहना है तो ओबामा की तरह रहोगे तो ठीक यदि ओसामा की तरह रहोगे तो मैं तुम्हें गलत काम करने से रोकने के लिये जरूरी स्टेप्स भी उठाउंगा और जरूरी कनुनी कारवाई भी

करुंगा ". मेरी बात पर वह अंगुठा दिखाकर यूं हंसने लगा जैसे वह सचमुच ओसामा बिन लादेन हो. मैंने भी किसी लाचार की तरह उसके सामने हाथ जोङ लिये..



वह भले ही विचार और भाषा की दृष्टि से अपराधिक प्रवृति का है लेकिन भावुक बहुत है. रोने लगा और कहने लगा----"जीजे अपुन एश्योर करता है कुछ भी गलत नहीं करेगा. आपके क्वार्टर के बाहर के खाली एरिया में एक मां का मंदिर बनायेगा और पूजा करेगा, गरीब पब्लिक को प्रवचन सुनायेगा." "प्रवचन ?"--- मेरे मुह से अचानक ही यह शब्द निकल गया. न ही राजा (मेरा साला) का आध्यात्म से कभी लगाव रहा है और न ही उसकी भाषा कभी डिसिप्लिन्ड रही है----" मैं तुमको प्रवचन के लिये अलाउ नहीं कर सकता." तभी श्रीमतीजी आकर चिल्लाने लगी---" क्यों अलाउ नहीं कर सकते ? तुम जो नेताओं की तरह आलतू-फ़ालतू का भाषण झाङते रहते हो , उससे तो अच्छा है कि राजा साधु-महात्माओं की तरह प्रवचन देगा". मैंने पूछा---"राजा प्रवचन देगा..? क्या बोलेगा?" अब जवाब देने के लिये चिंटीजी हाजिर थी-----" जो प्रवचन देगा वही निर्णय लेगा कि उसे क्या बोलना है...इस मामले में जीजू आपको दखल नहीं देना चाहिये". मैंने अपना स्टैंड रखा----

" मेरा मतलब है उनकी भाषा संयमित नहीं है.". तभी सासुमां मेरी श्रीमतीजी के कानों में फ़ुसफ़ुसायी----" प्रवचन की भाषा नहीं भाव देखे जाते हैं. राजा के विचार अच्छे हैं भाषा से क्या फ़र्क पङता है?." श्रीमतीजी ने अपनी माताश्री के फ़ूंक को आवर्धित स्वर में दुहराया. मैं समझ गया बहुमत साला के फ़ेवर में था. बहुमत यदि गदहे के साथ हो तो भी बहुमत का सम्मान करना ही पङता है. मैं कर ही क्या सकता था लेकिन सुप्रिम पावर यानी की ससुरजी यदि मेरी बातों का समर्थन कर देते और वीटो लगा देते तो बात अभी भी बन सकती थी.



ऐसा सोच ही रहा था कि ससुरजी आ टपके और बोलना प्रारंभ किया-----" किसी व्यक्ति की भाषा व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसे असंयमित माना जाये. मैं को अपुन या किया है को करेला है बोल देने मात्र से भाषा असंयमित नहीं हो जाती. अश्लील शब्द या गाली- गलौज नहीं करनेवाले प्रत्येक व्यक्ति की भाषा संयमित ही मानी जायेगी वशर्ते अपनी बातों से वह दूसरे को कष्ट न पहुंचाये. दूसरी बात प्रवचन देने का अधिकार या सुनने का राइट प्रत्येक व्यक्ति को है. तीसरी बात यह मामला आस्था और आध्यात्म से जुङा हुआ है इसके विरोध का सीधा अर्थ है आस्था को चोट पहुंचाना जो अमानवीय और दंडनीय है"-----ससुरजी के तीन बातों से ही मैं सब-कुछ समझ गया अन्यथा तीन के बदले वह तीस बातें भी सुना सकते थे. मैंने हामी भर दी. फ़िर भी बाद-विवादों से दूर रहने और मर्यादित भाषा का प्रयोग करने का आग्रह मैंने कर ही दिया. राजा बोलने लगा----" अपुन वाद-विवाद काहे को करेगा, अपुन राजनीति का टोपिक ही नहीं उठायेगा. स्विस बैंक से लाखो-करोङो रुपये लाने का बात छेङेगा लेकिन देश के भीतर करोङो-करोङो रुपये के काले धन के बारे में कुछ भी नहीं बोलेगा. अपुन देश के चन्द गिने-चुने भ्रष्ट लोगों का विरोध करेगा लेकिन निन्यानवे प्रतिशत इंडियन के दिमाग में घुस चुके भ्रष्टाचार के कीङे का जिक्र तक नहीं करेगा. देश के सबसे बङे भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों, व्यवसायिकों--सबसे हस्ताक्षर करवा कर राष्ट्रपति को भेजेगा कि स्विस बैंक का काला धन वापस कंट्री के कालाबाजारियों को सौंप दें, "----कुछ रुककर फ़िर बोला----"अपुन राष्ट्रपति के पास ही लिस्ट भेजेगा.काहे कू ?...पुच्छो ." "राष्ट्रपति के पास ही क्यों भेजोगे.?"-----मैंने पूछ ही दिया. कहने लगा----" काहे कि अपुन जानता है कि अपुन के कंट्री में राष्ट्रपति का पोस्ट रबङ स्टाम्प होता है. इधर-उधर करके प्राइम मिनिस्टर के पास भेज भी दिया तो वो कौन सा कमाल कर देगा----वो भी तो पपेट (कठपुतली) है.हा...हा...हा...." .



अगले दिन पूजा के उपरान्त प्रवचन के लिये दरबार सजा दिये गये और मेरा साला राजा प्रवचन देने लगा----------" भक्तों. आज अपुन बजरंगबली के बारे में डिस्कस करेगा. जब ओ काफ़ी छोटा था उसी टाइम से एरोप्लेन के माफ़िक आकाश में फ़्लाइट मारता था. जहां खङा होता था उसी पोजीशन से बिना किसी हवाई-अड्डे के सेफ़ फ़्लाइट मारता था. आज के अविएशन डिपार्टमेंट के जैसे एक्सीडेंट नहीं होता था उससे. एक बार तो लम्बा फ़्लाइट मारके सूरज को ही पूरा का पूरा निगल लिया जैसे मिनिस्टर लोग पूरा का पूरा खजाना निगल लेता है....लेकिन उस समय का प्राइम-मिनिस्टर इन्द्र कठपुतली नहीं था जो सारा खेल देखता रहता. पगङी के बदले मुकुट जरूर पहनता था और कृपाण के बदले वज्र रखता था लेकिन किसी औरत के ईशारे पर नहीं चलता था. खुद राइट आदमी नहीं था लेकिन जेन्युन लीडर था---गलत बात उसे पसंद नहीं था. उसने बजरंगबली की ओर वज्र फ़ेंका. अब उसका वज्र केरोसीन आयल से तो चलता नहीं था जिसमें मिलावट होता, हनुमानजी के पिछुआरे में लगा और बेबी हनुमान वैसे ही बेहोश हो गया जैसे मंहगाई की मार से गरीब पब्लिक बेहोश हो जाता है. उसकी मदर को जब पता चला तो मत पूछो क्या हुआ. महगे लाल टमाटर की तरह दूर्लभ दिखनेवाले बजरंगबली के सामने आकर उसकी मां ऐसे रोने लगी मानो उसकी आंखों के सामने मंहगे प्याज काटकर डाल दिया गया हो. जो औरत हाइट पर बैठकर सिर्फ़ पियोर एयर पीया करती थी भ्रष्ट सिस्टम का पोल्युटेड वाटर पीकर रह गयी. आज की तरह बिना कोई इन्क्वायरी कमिटी बिठये इन्नोसेंट हुनुमान को पनिश कर दिया गया था".......मैंने देखा सभी श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गयी थी.

क्रमशः

Friday, January 7, 2011

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१६ (व्यंग्य)

चाहता तो नहीं था पर प्रतीक्षा जरूर कर रहा था उस घङी की जब मेरी साली और सालेजी पधारनेवाले थे.महिने भर पहले ही उनके आने का प्रोग्राम तय हो गया था, लेकिन जब दिल से इच्छा न हो और इन्तजार करना पङे तो महिने भर का समय मिनटों में कट जाता है. वे दोनों घर पर पधार चुके थे. पहले सालीजी का परिचय करवाता हूं. वह चिन्टी के नाम से जानी जाती हैं और सालेजी की संज्ञा राजा है. चिन्टी में मूलतः स्तनधारी वर्ग के लक्षण तो हैं ही ,उपर से परिस्थिति वश उभयचर और सरीसृप वर्ग के गुण भी परिलक्षित होते हैं. वह मोडर्न हैं और प्रगतिशील सोच रखती हैं. पर्दा-प्रथा के इतनी विरोधी हैं कि शरीर का बारह आना हिस्सा आसानी से दृष्टिगोचर हो जाता है. बांकी बचे शरीर के चौथाई हिस्से को भी इतने टाइट कपङों से ढकती हैं कि हवा का एक अणु भी उन हिस्सों को टच नहीं कर सकती. उनमें एक गुण यह भी है कि वह हर किसी से बात करती है. किसी को यदि भाव नहीं देती है तो नींचा भी नहीं समझती. खुले विचार की हैं....यही वजह है कि मैं थोङा सा डरा हुआ था. खूबसूरत लङकियों को गिद्ध की तरह देखना तो मर्दों का स्वभाव होता है. न ही मैं चिन्टी जी को अपने सौन्दर्य को ढकने की सलाह दे सकता हूं और न ही मर्दों के स्वभाव में परिवर्तन की आशा कर सकता हूं. सालीजी भी हैं मिलनसार स्वभाव की...जिसका गलत फ़ायदा उठाकर आस-परोस के लोग उनसे घुलने-मिलने की कोशिस करेंगे और ऐसे व्यवहार करेंगे जैसे वह पूरे मुहल्ले की साली हो...मैं कैसे न डरूं..?



आज सबेरे की बात है. मैं बिस्तर पर लेटा था .वह मोर्निंग टी लेकर आयी और मुझे जगाते हुए कहा---"गुड मोर्निंग जीजू....".मैं जगा तो लगा जैसे सपने देख रहा होऊं.इससे पहले रोज सबेरे एक सा चेहरा देखते-देखते थक गया था. नींद तो पहले भी खुल जाया करती थी लेकिन डर से. पर चिन्टीजी के नरम-नरम हाथों से गरम-गरम चाय के साथ मोर्निंग शेक-अप और विशेज सचमुच सपनों जैसा ही था. आंख खुली तो उनका खूबसूरत मेक-अप वाला चेहरा लाजवाब दिख रहा था. मैं तो देखते ही रह गया पर हाथ की ऊंगली चाय की तरफ़ बढने लगी...पर उसने झट से मेरी ऊंगली पकङकर अपनी ओर खींच लिया और प्यार से बोली----" पहले दो ग्लास पानी फ़िर चाय----और कल से दो के बदले तीन ग्लास पानी और नो चाय." वह इतने प्यार से बोल रही थी कि मैं मना नहीं कर सका. दो ग्लास पानी पी लेने के बाद पेट फ़ुटबाल की तरह लग रहा था. इससे पहले की वह पंक्चर होता सोचा खुद वाल्व को दवाकर प्रेशर कम कर लिया जाये. मैं फ़टाफ़ट चाय पीकर शौचालय की ओर निकलने लगा. वह बोली---" जीजू मैं मोर्निंग वाक करने जा रही हूं.." मैंने डरते हुए सवाल किया-----" मोर्निंग वाक इन आधे कपङों में...?" उसने निडर होकर सीधा जवाब दिया----"जीजू यदि पूरे कपङे पहनकर मोर्निंग वाक करुंगी तो आक्सीजन बोडी के भीतर कैसे जायेगा..?. मैं ज्यादा समझाता तो वह शायद और भी कपङे कम कर देती सो चुप ही रहा.

मैं जैसे ही फ़्रेश हुआ मन में एक डर सा पैदा हो गया. मुहल्लेवालों को अच्छी तरह जानता हूं. मैं फ़्रेश होकर पार्क की ओर निकल पङा. वह पार्क जो मोर्निंग के समय नोर्मली खाली ही रहता है आज मुहल्ले के लोगों से खचा-खच भरा हुआ था. चिंटीजी आगे-आगे ज्यादा स्पीड से वाक कर रही थी बांकी मुहल्लेवाले धीरे-धीरे टहल रहे थे. खुद धनन्जय बाबू तबले जैसी तोंद लेकर इस प्रयास में तेज चलने की कोशिस कर रहे थे कि किसी तरह चिन्टी के नजदीक पहुंच सकें. वह पांच सौ मीटर परिधि के पार्क के पांच चक्कर लगायी और वापस घर चली गयी. मैंने धनन्जय बाबू से पूछा---" आप कबसे मोर्निंग वाक करने लगे..?". उन्होंने शरमाते हुए कहा---" बस आज यूं ही मन किया".. मैं तो समझ ही रहा था कि आज सुबह में टहलने का उनका मन क्यों किया. कुछ देर के बाद मैं भी घर पहुंचा और गुस्से को खुद में समेटते हुए चिन्टीजी से पूछा---" चिन्टीजी ये तमाशा करने की क्या जरुरत थी..?". वह मुस्कुराते हुए बोली---"जीजू सुबह में टहलना तमाशा थोङे ही होता है.". मैंने समझाया--- " टहलना तमाशा नहीं होता लेकिन मुहल्ले के सारे जेन्ट्स जो आपको फ़ोलो कर रहे थे वह तमाशा जरूर था.. आपको नहीं पता है कि ये जेन्ट्स (मर्द लोग) वो वाले जेन्ट्स (राक्षस) हैं . ये सभी आपको घुर-घुर कर देख रहे थे.." वह बोली----" जीजू अब मैं बच्ची नहीं हूं सब बात जानती हूं....लेकिन मैं तो इन सबसे...आपसे भी मोर्निंग वाक करवा रही थी. यह हेल्थ के लिये बहुत जरूरी है."



मैं भी मान गया चिन्टीजी की सोच को. मैंने कहा----चिन्टीजी सचमुच आप बहुत प्यारी हैं. बहुत बढिया सोचती हैं. आपके विचारों को मैं दाद देता हूं.". खुले तौर पर प्रशंसा सुनकर वह थोङा गुस्सा और थोङी खुशी को मिक्स करते हुए बिना आंसू और दर्दवाली स्टाइल में रोते हुए सिर्फ़ इतना बोली---- " जी.........जू.........आप भी न.." तब तक श्रीमती जी आ गयीं-----" क्यों तंग करते हो मेरी चिन्टी को..?"

मैंने कहा---" अरे मैं तो प्रशंसा कर रहा था...मैं तो इनकी सोच को दाद दे रहा था...". वह बिगङ गयी--- " देखो जी....किसी को भी दाद ,खाज, खुजली देने की जरुरत नहीं है..ये फ़ैलनेवाली बिमारियां होती है."

...."क्या तुम भी सोचती हो...मैं ये दाद नहीं वो दाद दे रहा था "

...." ये दाद...वो दाद क्या होता है. दाद तो एक ही होता है न..?"

...." डार्लिंग मुझे सफ़ाई तो देने दो कि मैं कौन सा दाद दे रहा था ?"

...." सफ़ाई होती तो तुम्हें दाद थोङे ही होता....और किसी तरह हो भी गया तो उसे बांटने की जरुरत नहीं है. दाद की दवा ले आओ".

तब तक ससुरजी भी आ गये और वह अपनी प्रतिकृया न दें यह कैसे हो सकता था---"किस को दाद हो गया?" उनको उत्तर देने से अच्छा था कि मंच छोङकर नेपथ्य की ओर निकल जाना. मैं वहां से खिसक लिया..श्रीमतीजी कहने लगी----"आपके दामादजी को दाद हो गया है". चिन्टी समझाने लगी---" अरे दीदी, जीजू मेरे विचार से खुश होकर मुझे दाद दे रहे थे.". ससुरजी बोले---" खुशी से या नाराज होकर दाद का प्रसार करना अच्छी बात नहीं है. यह बहुत ही खतरनाक बिमारी है जो भ्रष्टाचार की तरह जब फ़ैलती है तो फ़ैलती ही चली जाती है. सरकार ने भी हैजा , चेचक , पोलियो आदि संक्रामक रोगों से बचाव के लिये लोगों को टीके लगवाती है. एड्स जैसी जानलेवा बिमारी भले ही बढती चली गयी हो अवेयरनेस तो करवा ही रही है. सर्दी जुकाम जैसी रोगों से बचाव के लिये स्वयं मलायका अरोङा जैसी हस्तियां झंडू बाम बन जाती है. उनके विचारों से तो ऐसा लगता है कि यदि किसी को एक बार भी छींक आ गयी तो वह छींकनेवाले डार्लिंग के सामने झंडूबाम बनकर प्रस्तुत हो जायेंगी. उनका नृत्य तो इतना एश्योर कर ही रही है. तभी मीडियावाले लगातार दाद की तरह फ़ैलनेवाली बिमारी करप्शन पर ध्यान फ़ोकस न करते हुए सारा कन्सेन्ट्रेशन विश्व के सबसे बङे प्रजातंत्र के छोटे-मोटे छींकों पर उङेल रही है. दाद और करप्शन को भले ही पब्लिसीटी नहीं मिल रही है फ़िर भी अन्दर ही अन्दर ये बिमारियां इतनी फ़ैल चुकी है कि पूरा का पूरा गुप्त प्रक्षेत्र ही डेन्जर जोन में आ गया है. देश के महान नेतागण और तथाकथित भद्रपुरुष खुद ही इन रोगों से ग्रस्त हैं सो इन्हें निर्मूल करना तो काफ़ी मुश्किल है...हां यदि वे खुलकर अपनी बिमारियों को दिखायें अर्थात पारदर्शिता लायें तो संभवतः प्रसार तो रुक ही जायेगी."



ससुरजी का भाषण जारी रहा----" जहां तक दाद और करप्शन के रोकथाम की बात है तो सबसे पहले रोगी दुष्कर्म करना बंद कर दें जब तक स्वयं इन रोगों से छुटकारा न मिल जाये...ये रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्पर्श होते ही तेजी से फ़ैलता है. दूसरी बात सरकार यह नियम बना दे कि दाद और करप्शन बाले हिस्से पर हाथ फ़ेरने के बाद बिना हाथ धोये सिस्टम के दूसरे हिस्से को टच न करें. ऐसी ही गलती के कारण दाद और करप्शन दिल्ली के राजपथ से मुम्बई के दलाल स्ट्रीट तक फ़ैल गयी. जब मीडियावाले खबर लेने पहुंचे तो निर्दोष होते हुए भी बेचारे इन रोगों के चपेट में आ गये. प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ में जंग क्या लगी कि देखते ही देखते कोई भी खंभा सोलिड न रहा. बढिया होगा सरकार दाद और करप्शन के रोकथाम के लिये कोई टीका इजाद करवाये. इसी टीके से बांकी सभी बिमारियां काबू में आ जायेगी."



जैसे ही ससुरजी ने अपना शोर्ट स्पीच बंद किया, लोकसभा की तरह तालियों की गङगङाहट से मेरा रेलवे क्वार्टर गूंजने लगा. मैं तो दूसरे कक्ष में माथा पीट रहा था. ससुरजीने मुझे माथा पीटते देखकर मेरी श्रीमतीजी को कहा---" दामादजी से कहो कि पहले हाथ को साफ़ पानी में साबुन से धो लें फ़िर माथा पीटें क्योंकि दाद और करप्शन जैसी बिमारियां हेड तक जब पहुंचती है तो पूरे सिस्टम को बरबाद कर देती है फ़िर आदमी हो या देश बचाना मुश्किल होता है.."



क्रमशः

Monday, December 6, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१५ (व्यंग्य)

मैंने कहा----"मैं........कुत्ते की तरह भौंक रहा था...? " वह मुस्कुरते हुए बोली----" और नहीं तो क्या....मां कहती है औरतों का जीवन उसी दिन सफ़ल माना जाता है जिस दिन उसका पति कुत्तों की तरह भौंकने लगे...क्योंकि बार्किंग डोग सेल्डम बाइट इफ़ ही बार्क्स ही विल नोट बिट यू. नाव यू आर सेफ़ अन्ड सकसेस्फ़ुल...". मुझसे रहा न गया ----"मुझे पागल मत करो.."

----"मजाक छोङो जी आपने तो सुहागरात में ही कहा था कि आप मेरे प्यार मे पागल हो.."

----" तो...? तो क्या मैं पागल था..?"

-----"नहीं जी, उस दिन तो आपने झूठ बोला था....लेकिन मेरे इतने साल के तपस्या से आज वह बात सच हुई है"

-----"....हां...तब मैं तुम्हारे प्यार में पागल था....और आज...." श्रीमतीजी ने झट से मेरे मुंह पर हथेली रख दी.

-----"कुछ भी मत बोलो मैं जानती हूं कि सभी मर्द महबूबा के प्यार में पागल हो जाते हैं. लेकिन सच का पागल तो वही होता है जो महबूबा से शादी कर लेता है.और एक बार शादी करने के बाद तो वह बेचारा पागल कम्पलीट पागल हो जाता है....पेरफ़ेक्सन आ जाता है.......प्यार में इससे बढकर पागलपन क्या होगा.." अब मुझसे न रहा गया.

-----" देखो..तुम ठीक से बात करो...प्यार की चासनी लगा कर मीठी छुरी से गले मत रेतो....मैं अपनी सुहागरात के हर स्टेटमेंट को वापस लेता हूं क्योंकि वह रात मेरे लाईफ़ की सबसे अशुभ रात थी और तुम मीडिया की तरह उस रात की हर बात को तोङ-मरोङकर पेश करती हो."

----"भला मैं ऐसा क्यों करुंगी."

----" क्योंकि मैं भ्रष्टाचार से पैसे कमाकर भरा हुआ सूटकेश नहीं देता.."

----" भूख लगने पर तो तुम जानवरों का चारा भी खा जाते हो मैं नहीं जानती क्या.."

----" कब खाया मैं जानवरों का चारा...?..कोई यकीन नहीं करेगा...सभी जानते हैं कि मैं कितना ईमानदार हूं.

----" सुहागरात से ही ऐसा बोलते रहे हो...जबकि ये नहीं जानते कि तुम्हारी इमानदारी पर विश्वास करके ही मैंने तुम्हें दिल दिया था.. नेताओं की तरह घरियाली आंसू बहाकर कितने वादे किये थे तुमने....."

------" वादे किये थे तो क्या...."

-------" जानती हूं सारे वादे चुनावी थे....कौन सी तुम्हारी सरकार गिरनेवाली है जो वादे याद रक्खोगे."



वह जोली मूड में थी---ये औरतों का एक विशेष मूड होता है जिसमें वह भीतर से खुश होती है पर बाहर से खुश न होने का नाटक करते हुए एमोशनल अटेक करती है ताकि वह और कुछ हासिल कर सके...ऐसे में यदि पुरुष थोङा भी इधर-उधर करे तो इमोसनल अत्याचार का आरोप लगाती है.



मध्यान्तर----

Wednesday, December 1, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१४ (व्यंग्य)

कुत्तों का नसीब तो देखिये कि खूबसूरत मैडम लोग उसे कारों में अपने साथ घुमाती हैं और मुफ़्त में पप्पी भी देती है.अकेले होते हुए भी वह गृहस्थ जीवन का आनन्द उठाता है.आजकल तो ईंसानों में भी कुत्तापन नामका रोग पाया जाने लगा है. जिसमें कुत्तापन जितना ज्यादा वह उतना ही महान, उतना ही बङा और उतना ही उंचा. जिसमें कुत्तापन नहीं है वह बेचारा गरीब बनकर कुत्तों सी जिन्दगी जी रहा है. मुझे तो लगता है जल्दी ही कुत्तो को पूरा सम्मान मिलने लगेगा क्योंकि लगभग सभी क्षेत्रों मे उनका वर्चस्व स्थापित हो रहा है.



आज-कल तो कुत्तों के लिये स्वर्णिम युग चल रहा है. आज यदि शोले जैसी पिक्चर बनायी गयी तो वही वीरू जो कहता था--"कुत्ते मैं तुम्हारा खून पी जाउंगा" अब बदल सा जायेगा. आज तो वीरू भी उतना ही कुत्ता है जितना कि गब्बर और एक कुत्ता कभी भी दूसरे कुत्ता का खून नहीं पीता. आज का वीरू प्यार से कहेगा---" कुत्ते...इधर आओ कुत्ते. बैठो...मेरे पास बैठो. डरो मत मैं कुछ नहीं करुंगा क्योंकि मैं भी तुम्हारी तरह एक आम कुत्ता हूं...तुम्हारे ही जाति का, तुम्हारे ही मजहब का कुत्ता. दल बदल जाने से कुत्ता शेर नहीं हो जाता डरो मत. अब किस बसंती के लिये मैं तुमसे लङूं. अब तो बसंती भी कुतिया बन गयी है. हम कुत्ते तो कमसे कम बफ़ादार होते हैं कुतिया तो अक्सर बेवफ़ा ही होती है. उसके लिये वीरू और गब्बर में क्या फ़र्क...?"



अब तो शोले की जगह हथगोले चलते हैं कुत्तों की तरह जीनेवाले लोग कुत्तों की तरह विचारवान लोगों से लङ रहे है और वह युद्ध-भूमि है नक्सलवाद, मंहगायी, भ्रष्टाचार. मंहगाइ डायन बन चुकी है, भ्रष्टाचार दीमक, आतंकवाद पिशांच बनी हुई है और नक्सलवाद तो सिर्फ़ गले रेतना जानती है. इस सब के चक्कर में आम जनता कुत्तों की तरह जीने के लिये वाध्य है. अब तो स्थिति ऐसी आ चुकी है कि गुरु-शिष्य परम्परा में भी जब चेला गुरू को "कुक्कुराय नमः " कहकर पांव छूएंगे और गुरू "श्वानो भवः " का आशिर्वाद देंगे.अब लङकियां अपने ब्वायफ़्रेंड के बारे में कहा करेंगी---"वो देखने में बहुत ही अच्छा है बिल्कुल कुत्ते की तरह और वह कुत्ते की तरह मुझे प्यार भी बहुत करता है." औरतें अपने पति से कहा करेंगी---"देखोजी मेरा दामाद बिल्कुल कुत्ते की तरह होना चाहिये जैसे तुम हो.." और पति भी अपनी पत्नी को वचन देगा कि चाहे जो भी हो जाये वह कुत्ते की तरह वफ़ादार बना रहेगा.



क्या जमाना आ गया है. शेरों को संरक्षण दिया गया और संख्या बढ रही है कुत्तों की. शेर तो लुप्त होते जा रहे हैं. अब तो जंगलों में भी वह सुरक्षित नहीं है.समाज और साहित्य ने तो शेरों को पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया है. मैं तो कहता हूं बहुमत के आधार पर कुत्ता को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दे दिया जाये. हर कोई कुत्तों की तरह भोंकना चालू करे फ़िर तो सबकी मौज है. चलिये खुद से शुरुआत करते है.".....भौं...भौ............" श्रीमतीजी ने बीच में ही टोका----" क्या हो गया जी कुत्ते की तरह भौंक क्यों रहे हैं....मैंने ऐसी कौन सी गलती कर दी जो अपने असली रुप में आ गये ?"





क्रमशः

Monday, November 29, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१३ (व्यंग्य)

गुस्से से ही सही मेरे हिसाब से डाक्टर साहब ने दवा बता ही दिया था. मैं खुशी से उछलते हुए वापस आने लगा. तभी डाक्टर साहब बोले-----"ज्यादा उछलो मत. मैं अपनी पत्नी पर सभी विषाणु और विष विरोधी दवाओं का प्रयोग कर चुका हूं. इससे मर्ज और बढ ही जाता है.". क्षण भर में ही मेरी खुशी गहरे दुख में तब्दील हो गयी. मैं भाव विभोर होकर सासू मां की वह कविता गाने लगा---दिवाली नागिन चंद्रमा

दिन प्रकाश आग

शाम को परेशान होकर चुप-चाप घर आया तो श्रीमतीजी ने पूछ ही दिया---" कहां घूम रहे थे तीन घंटे से ?" मेरे मुंह से सिर्फ़ इतना निकल पाया---"वैसे ही ".तभी सासूमां ने श्रीमतीजी के कानों में हल्की सी फ़ूंक मारी. मैं सिर्फ़ "दिमाग" शब्द ही सुन पाया. उस शब्द के सफ़िक्स और प्रीफ़िक्स के बारे में अनुमान लगाकर सोच में पङ गया.



कुछ देर के बाद साबूदाने जैसी होम्योपेथिक दवा की गोलियां बिना गिने हुए खाकर सो गया. ऐसे समय में जब काफ़ी टेंशन में होता हूं होम्योपेथिक दवा ही लेता हूं क्योंकि होम्योपेथिक चिकित्सा यदि स्वास्थ मे सुधार नहीं लाती तो बिगाङती भी नहीं है. कहते हैं कोम्युनिज्म की तरह होम्योपैथ भी रसिया, जर्मनी और चायना से भारत आया और इसका प्रभाव भी एक जैसा ही है. एक ने देश की राजनीति को मारा तो दूसरे ने आम आदमी के स्वास्थ को कभी सुधरने नहीं दिया. तभी तो विपक्ष की पार्टी विशुद्ध भारतीय आयुर्वेदिक लक्ष्मण बुटी खाकर राम-लक्ष्मण के मंदिर बनाती फ़िरती है और सत्ताधारी दल इटली से मंगाकर मंहगे एलोपेथिक दवा खा-खाकर देश चला रही है.जिस सिस्टम को लकवा मार चुकी है उसी पोलियो की खुराक पिला रही है. छोटे- छोटे घाव को भी ओपरेशन से ही ठीक करती है. पहले छोटा ओपरेशन फ़िर बङा ओपरेशन. यदि मरीज थीक नहीं हुआ तो बिमारी के बदले रोगी को ही उपर पहुंचा देती है. आजकल देश में ऐसी ही इटालियन एलोपेथी चल रही हैं.



लेकिन मेरी समस्या दूसरी थी. यह राष्ट्रीय होते हुए भी घरेलू समस्या थी.जबकि मंहगाई, बेरोजगारी, जमाखोरी, मिलावट...आदि घरेलू समस्या भी राष्ट्रीय पहचान बना चुकी है. खैर मेरे लिये तो मेरी पत्नी के कानों में पङनेवाली सासू मां की फ़ूंक सभी राष्ट्रीय समस्याओं से भी जटिल थी.लेकिन चिंतन के सिवा कोई रास्ता भी नहीं बचा था. मेरी आत्मा रो-रोकर कह रही थी कि शिघ्र ही मेरे ससुरालवालों के चलते मेरे जीवन में भू-चाल आनेवाला था.तभी अचानक मेरे सामने पङी टेबुल हिलने लगी----"कितनी देर से चिल्ला रही हूं कहां खोए रहते हो..?"-----श्रीमतीजी की रोबदार आवाज ने भूचाल तो ला ही दिया था. अब भूमिगत होने तक ऐसे भूचाल तो आते ही रहेंगे. लगता है जिस दिन शिव-लिंग के समक्ष विवाह किया उसी दिन ब्रह्माजी ने श्वान-लिंग से मेरा भाग्य लिखा था.न न न...ब्रह्माजी ब्रह्मचारी होकर ऐसे गिरे हुए गृहस्थ जीवन की कल्पना कैसे कर सकते हैं ?. हो सकता है किसी कुत्ते के साथ मेरा भाग्य लेख अदला-बदली हो गयी हो. तभी तो विवाहित होते हुए भी कुत्तों सा जीवनजी रहा हूं और कुत्ते जन्नत की सैर कर रहे हैं.



क्रमशः

Friday, November 26, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१२ (व्यंग्य)

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१२ (व्यंग्य)


उनकी काव्य-प्रतिभा का यह मामुली उदाहरण था.दीवाली की रात जब मेरी सासू मां ने अपनी बेटी के कानों में फ़ूंक मारा उसी वक्त मां लक्ष्मी मेरे घर से रूठकर चली गयी. अब चुंकी मां लक्ष्मी का फ़्लाइट इमानदारों के घर दीवाली के र्प्ज ही लैंड करता है इसलिये सोच लिया हूं कि आगामी दिवाली सासू मां या श्रीमतीजी में से किसी एक के साथ ही मनाउंगा...क्योंकि लगातार दो बार यदि लक्ष्मी मैया घर से रूठकर लौटीं तो अगली बार से हर बार दिवाली के दिन वह अपना फ़्लैट कैंसिल कर लिया करेंगी.वैसे उस दिवाली की रात जो आधी बात मैंने सुनीं उसे कविता की तरह लिख तो लिया पर समझ न पाया. हां इतना कन्फ़र्म था कि मामला पारिवारिक नहीं है.यह बात इतिहास या विज्ञान से भी नहीं था.यह चाहे भूगोल या फ़िलोस्फी से हो सकता था. अतः किसी भी तरह से पूछना अनुचित नहीं था. कविता ऐसे बनी थी------दिवाली...नागिन...चंद्रमा

दिन...प्रकाश......आग



लजाते हुए शिष्टतापूर्वक श्रीमतीजी से पूछा कि मेरी सासू मां के मुखारबिन्दु से उनकी सुकर्णों किस प्रकार की अमृतवर्षा की गयी थी तो शब्दार्थ ये समझाया गया कि....दिवाली की रात नागिन की तरह काली होती है जिसमें चंद्रमा भी नहीं दिखते जबकि दिन में प्रकाश फ़ैला होता है जिसे आग की तरह जलनेवाला सूर्य पैदा करता है. इसे शब्दार्थ के बदले गद्यानुवाद समझा जाये. भावार्थ मैं आज तक नहीं समझ पाया आप कहां से समझेंगे. उनके फ़ूंक का भावार्थ समझने का प्रयास भी मत कीजिये. मैं यह सोचकर कि बहुत गूढ भावार्थ रहा होगा आज तक शोध करता रहा हूं. जितना अर्थ निकालता हूं उतना ही पागल होता जा रहा हूं. औरतों का इतिहास, मनोविज्ञान और सौन्दर्य-दर्शन का खाक छानने पर भी इस मामले में कुछ भी हाथ नहीं लगता. बस यूं समझ लीजिये मां बेटी का संबंध एक पुल की तरह होता है जिसपर हर समय दामाद नामका वाहन चक्कर लगाता रहता है.पुल उसे पानी में डूबने नहीं देती पर तट पर पहुंचने भी नहीं देती.



मैं इस फ़ूंक से सचमुच परेशान था. सोचा डाक्टर महेश सिन्हा के पास जाना चाहिये.डा.साहब ने कहा----"आपकी समस्या बहुत ही जटिल लगती है.". मेरा जवाब था---" डा. साहब पारिवारिक समस्या सबके पास होता है जिसका काफ़ी जटिल होता है वही आपके पास आता है.". वह कहने लगे " वैसे मैं पेशे से लोगों को निश्चेत किया करता हूं लेकिन आपको सचेत कर रहा हूं आपकी समस्या काफ़ी अनोखा है...". मैंने झट से कहा---"इतना अनोखा है कि मुझे भी अनोखा बना दिया है "..वह गंभीर हो गये, बोले---" मुझे लगता है उस फ़ूंक में ही विषाणु (वायरस) है "मेरे मुह से निकल पङा---"उसी का तो गोली लेने आया हूं" पता नहीं क्यों वह गुस्सा गये---"जब सबकुछ जानते हो जाओ दवा की दुकान से जाकर खरीद लो, मेरे पास क्यों आये..?" मैंने उत्तर दिया----"उस गोली का नाम...." वह बीच में ही बोल पङे---" चुप रहो क्या समझते हो जिस समस्या को सुनकर मैं नहीं सुलझा पा रहा हूं..तुम सुलझा चुके हो..? इतने समझदार हो गये हो तुम..?...फ़िर तो दवा की दुकान से खरीद लो." मुझे लगा अब यदि कुछ भी बोलुंगा तो मार बैठेंगे. धीरे धीरे मैं डा. साहब के कक्ष से बाहर निकलने लगा. पर समस्या इतनी जटिल थी कि रहा न गया, पूछ ही दिया---"उस गोली का नाम बता देते तो..." अब डा. साहब क्रोध को स्वयं में समटते हुए कहने लगे-----" कोई भी एन्टी-वायरस या एन्टी-प्वायसन को लेकर अपनी श्रीमतीजी एवं मां जगदम्बा --सासू मां के मुख छिद्र में डाल देना अथवा शरीर के किसी भी मांसल भाग के जरिये किसी बेलनाकार, खोखले व लघु-व्यास वाले धातु निर्मित उपकरण से उनके नसों में प्रविष्ट कर देना......"





क्रमशः

Thursday, November 11, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-११ (व्यंग्य)

मेरी सासू मां एक दो दिनों में पधारनेवाली हैं. जिस तरह ससुरजी एक्स्ट्रा-ओर्डिनरी हैं उसी तरह वह भी युनिक हैं.सारे गुणों से लबालब भरी हुई हैं. साक्षात देवी का स्वरुप---सर्व गुण सम्पन्न. बस एक ही कमी है जिससे उनके आगमन पर खुशी के बदले डर बना हुआ है. वह किसी नागिन की तरह मेरी श्रीमती जी के कानों में फ़ूंक मारा करती हैं. वह सचमुच मेरे लिये मातृस्वरुपा साक्षात मां लक्ष्मी हैं यदि अपनी बेटी के कानों मे विषैला फ़ूंक डालना बंद कर दें.स्वभावतः वह डंक नहीं मारती और फ़ूंक भी मेरी श्रीमतीजी के लिये कर्ण-प्रिय ही होता है और उनके इस गुण ने मेरे कानों की श्रवन क्षमता भी बढा दिया है.......लेकिन उनकी फ़ूंक के विषैले तत्वों को श्रीमतीजी के कानों की जाली छान नहीं पाती. स्त्री-गुण के कारण भावुक बातें औरतों के दिमाग में नहीं जाती सीधे नोन-रिटर्न वाल्व से होकर दिल में जमा हो जाती है. वही बातें उनकी अनुपस्थिति में श्रीमतीजी के मुखद्वार से निकलकर मेरे जीवन में भू-चाल लाती है. मानो भूखा शेर मांद से निकल रहा हो और शिकार यानी मैं सामने होऊं.



                                                                                             अन्यथा उनमें तो गुण ही गुण हैं. आप यूं समझिये वह मेरे लिये सास नहीं सांस है, क्योंकि वह जब तक जिन्दा हैं मेरी सांस चल रही है. खुदा न खास्ता यदि किसी दिन मेरे भाग्य से मेरी सास की सांस बन्द हो गयी तो मेरी सांस भी बंद कर दी जायेगी. क्योंकि जहां मेरी सारी उपलब्धियों का श्रेय मेरी श्रीमतीजी को दी गयी अच्छी शिक्षा और सुविधा के रुप में मेरी सासू मां को दिया जाता है वहीं किसी भी छोटी या बङी घटनाओं का जिम्मेदार मुझे ठहराया जाता रहा है. दूसरी बात मेरी सास सदा के लिये दुनियां के बोझ को हल्का कर प्रस्थान कर जायें यह जीवन का सत्य होते हुए भी मेरी श्रीमतीजी के लिये अकल्पनीय है. वह कभी भी बर्दास्त नहीं कर पायेगी. वह राजी-खुशी देश के इतिहास में पहली बार अपनी मां के लिये सती होने का गौरव हासिल करगी......और एक ही साथ सास और पत्नी दोनो से छुटकारे की खुशी मैं नहीं सह पाउंगा. मैं तो समझुंगा कि मानो मेरी किसी व्यन्ग्य रचना के लिये राष्ट्रीय स्तर का कोई अवार्ड मिल गया हो.



                                                                         चुंकि सास हैं तो आश है और तभी मेरी सांस चल रही है.......हां तो उनकी फ़ूंक के बारे मे बात कर रहे थे. उनमें सारे गुणों के होते हुए भी उनकी फ़ूंक से डरता रहता हूं.बाधा, भूत-प्रेत,चोर-डकैत, पुलिस, नेता...किसी से नहीं डरता पर पत्नी के कानों में मेरी सासू मां के मीठे फ़ूंक से डर जाता हूं.यह बहुत ही अनोखा मामला है. यह मामला मेरी नजर मे उसी दिन प्रकाश में आ गया था जिस दिन मेरी शादी हुई थी. शादी के दिन ही उनकी फ़ूंक इतनी मधुर थी कि पंडितजी के पढे सारे श्लोक हवा में ही रह गये. लग रहा था पंडितजी शादी नहीं कर्मकांड करवा रहे हों. मंत्रों के जरिये किये जानेवाले कसमें वादे बनने से पहले ही टूट गये.



                                                                                  पहले कई दफ़े उनकी पूरी बातें सुनाई नहीं पङती थी तो जो भी शब्द सुनता था उसे कविता की तरह ब्लोग पर टीप आता था. उसमे टिप्पणियों की भरमार होती थी.उदाहरन देना सही होगा अन्यथा आप लोग विश्वास ही नहीं करेंगे.जिस मर्द पर पत्नी और सास विश्वस न करते हो उनपर आप विश्वास करें भी तो कैसे.उदाहरण प्रस्तुत है------

तेरा भाई क्लर्क...

वाशिंग मशीन, टी.वी, फ़्रीज

दामाद्जी अधिकारी

फ़िर भी पावर सीज

सूखी रोटी

ईमानदार

याचना,चिल्लाना ,जबरदस्ती

बेकार

धिक्कार

बाहरी मुद्रा स्वीकार

तभी प्यार, नमस्कार

जब भ्रष्टाचार.

                                                                                                         क्रमशः

Tuesday, November 9, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१० (व्यंग्य)

वह कहने लगे---"संस्कृत..?संस्कृत भाषा तो मृतक हो चुकी है. अब तो इंगलिश में ही लाईफ़ है" .मैंने उनके तर्कों को काटा----"लेकिन हमारी संस्कृति तो संस्कृत में ही है न...."उनका जवाब आया---"संस्कृति को बचाने के लिये ही इंगलिश का सहारा ले रहा हूं.जिस लेंग्वेज का डेथ हो चुका है वह हमारे कल्चर को फ़्रेश लाईफ़ कैसे दे सकती है ". मैंने दीनतापूर्वक याचना की---"मुहल्ले के लोग इंगलिश में पूजा करते हुए देखेंगे तो हमारी नाक कट जायेगी". वह बोले---"अब नाक बचाने के चक्कर में सांस लेना तो बंद नही कर देंगे. मैं तो कहता हूं कि नाक बचे या कटे सांस लेने में प्रोबलेम नहीं होना चाहिये". मेरे सारे तर्क ससुरजी ने काट दिये थे. वैसे भी उनके साथ तर्क करना ही बेकार है.

                                                        उन्होंने अपना कार्य चालू रखा और टिंकू से कहा----" अब संकल्प लो I tinku, under the direction of my grandfather swear to worship you for the welfare and good health of our family and the society beyond cast ,creed and nationality " टिंकू भी मजे से सही- सही मंत्रोच्चारण कर रहा था. उसे सही प्रनन्सिएसन करने को कहा गया था. श्रीमतीजी मिसेल ओबामा की तरह मुस्कुरा रही थी. अगरबत्ती की जगह मोर्टिन और दीप की जगह जीरो वाट का बल्ब जला दिये गये थे. ससुरजी ने मेरी श्रीमतीजी की ओर ईशारा किया. अच्छत (चावल के दाने) की जगह वह भात और इडली के साथ प्रस्तुत हुई. टिंकू को अगला मंत्र पढने को कहा गया---" Respected Sir and madom, now a days honesty, knowedge and arts are being saled but rice is wasted in F.C.I godowns and is available at Rs.2/kilo to the poorest for votes. So rice has no importance at all for you rich people. Hence i offer north indian boiled rice and south indian idlee. kindly give us boon to ramain north and south india united. "



उस समय तो मेरा मांथा शर्म से झुक गया जब लेडी विश्वकर्माजी को सिन्दूर की जगह लिपिस्टिक चढाया गया. मैंने भगवान विश्वकर्माजी की ओर देखा. जिंस टी-शर्ट और टोपी में उनकी पर्सनेलीटी तो खुल रही थी. फ़िर भी नाराज से दिख रहे थे .मानो कह रहे हों----" बेकार ही मुझे देव-लोक से मृत्यु-लोक बुलाते हो. टी-शर्ट और जिंस पहनने से मैं अच्छा ही लगता हूं अपमानित नहीं होता......लेकिन तुमलोग मेरे प्रति आस्था का भी बाजारीकरण कर देते हो. कभी अपनी नाक बचाने के लिये तो कभी पैसा कमाने के लिये, कभी वोट के लिये तो कभी भावनाओं को भङकाने के लिये तुमलोग मेरा सहारा लेते हो. मैं इससे अपमानित होता हूं.



अगले भाग मे सासुमाँ का आगमन ..                    क्रमशः

Monday, November 8, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-९ (व्यंग्य)

कुछ ही दिन बाद मेरे ससुराल के कुछ अन्य गणमान्य लोगों का मेरे क्वार्टर पर आकर ठहरने का प्रोग्राम बन गया. जल्द ही मेरी सासू मां, साले महोदय और प्यारी सी सालीजी का आगमन होनेवाला था. थोङा सा चिन्तित था. वे लोग जब तक मेरे यहां ठहरेंगे मेरी जिन्दगी भी ठहरी सी हो जायेगी.श्रीमतीजी, ससुरजी और अन्य तीन मिलकर जब पांडव बनेंगे तो उसे मेरे जैस साधारण प्राणी कैसे झेल पायेगा.ये लोग मेरा तो चीर-हरण कर के ही दम लेंगे.

मैं परेशान था पर ससुरजी तो हर मामले में मेरे विपक्ष मे रहने की ठान ही ली है. वह मुस्कुरा रहे थे विश्वकर्मा पूजा मनाने की खुशी का बहाना लेकर. मेरे निकट आकर बैठ गये. वह मेरा लटका हुआ चेहरा एक-टक मुस्कुराते हुए देख रहे थे. फ़िर भी उनके चेहरे से याचक होने की बू तो आ ही रही थी और भले ही मांगनेवाला मुस्कुरा रहा हो महान तो लाचार होकर भी देनेवाला ही होता है. धीरे से आईटम्स जो पूजा के लिये जरूरी थे कि लिस्ट मेरे हाथ में थमा दी. उनके डिमांड की लिस्ट मेरे लिये पिक्चर के क्लाइमेक्स की तरह हुआ करता है. "जिंस पैंट, टी-शर्ट, टोपी, सलवार सूट..?????"---मैं उच्चारण करते हुए पढ रहा था.आइटम्स तो खुद ही ढेर सारे क्वेश्चन मार्क्स पैदा कर रहे थे. ससुरजी की कुशाग्र बुद्धि उन्हें उत्तर के साथ उपस्थित कर दिया----"दामादजी आज का जमाना इडियट्स और दबंगों का है ऐसे में पीला वस्त्र, पीली धोती और मुकुट न ही फ़ोर्मल लगता है और न ही इनफ़ोर्मल.पहले जमाने के कपङों में भगवान विश्वकर्माजी पुराने खयालोंवाले अबनोर्मल लगेंगे". मुझे तो ससुरजी अबनोर्मल लग रहे थे. जी तो कर रहा था कि वैचारिक रुप से उनकी धज्जियां उङा दूं लेकिन सम्मान ही इतना करता हूं कि कुछ भी न बोल पाया.


मैंने श्रीमतीजी से जाकर कहा-----" तुम्हारे पिताजी भगवान विश्वकर्मा जी को जींस और टी-शर्ट पहनाना चाहते है.....अबनोर्मल हो गये हैं " लेकिन एक महान बाप की वीरांगना बेटी यह कैसे बर्दास्त कर सकती थी. वह साउन्ड बोक्स की तरह ओन हो गयी---"पागल तो तुम हो गये हो. वह यदि नये ढंग से पूजा करना चाहते हैं तो हर्ज ही क्या है ? वह नये विचारवाले लोग हैं तुम्हारे जैसे पुराने खयाल के नहीं ".जिस तरह कोंग्रेस की सरकार को कोम्युनिस्ट विना शर्त समर्थन देते हैं उसी तरह वह अपने पिता के पक्ष में हो जाया करती है. मैं अल्पमत का विपक्ष बन जाया करता हूं. विपक्ष की तरह मत के साथ-साथ शांति, समृद्धि, खुशियां और बैंक बएलेन्स भी अल्प होता जा रहा था. काश सत्त पक्ष के गुण-गान के साथ-साथ विपक्ष के दर्द को भी लोग समझते. सत्ता की कुर्सी के इतना निकट होकर भी सत्ता से दूर होना और धीरता के साथ लालच की जीभ को बांधे रखना--आसान नहीं है.

अगले दिन सुबह ससुरजी टिंकू को पूजा करवाने लगे.पहले आवाहन होना चाहिये, मंत्र पढो----" O.. mighty..honourable god of works and your family, i tinku a ten year old child invite you to come here and have respective seats " .मेरे मुंह से तो oh my god निकल रहा था. पूजा इंगलिश में करवायी जा रही थी. देव-भाषा संस्कृत का घोर अपमान और आंग्ल-भाषा से यह प्यार मुझे अच्छा नहीं लगा. श्रीमतीजी सगर्व मुस्कुरा रही थी. उन्हें कुछ कहता तो बुरा मान जाती और खिसियाई बिल्ली की तरह झपट पङती. जब रहा न गया तो ससुरजी का भद्रतापूर्वक विरोध किया----"पूजा संस्कृत में करवायी जाती तो ज्यादा अच्छा होता". कहने लगे---"संस्कृत..?संस्कृत भाषा तो मृतक हो चुकी है. अब तो इंगलिश में ही लाईफ़ है"



अगले भाग में भी विश्वकर्मापूजा जारी रहेगा.              क्रमशः

Friday, October 1, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-८ (व्यंग्य)

अचानक एक दिन थाइलैंड से ससुरजी के लिये दो लाख भात( थाइ करेन्सी) प्रति महिना वेतन का एक ओफ़र आया. ये आइडिया मुझे काफ़ी पसन्द आया. सोचा एक दो सप्ताह में समझा - बुझाकर पासपोर्ट और वीसा बनवाकर थाइलैंड भेज देन्गे....सप्ताह-दो सप्ताह तक ब्लोग के लिये कविता लिखवाते हैं क्योंकि अब मैं उन्हें बिल्कुल ही झेल पाने की स्थिति मे नहीं था. कविता लिखने कर ब्लोग पर देने की सलाह से काफ़ी खुश हुए. कहने लगे मैं कविता गाता हूं आप पोस्ट करते जाइये--

गरीबी और लाचारी की एक सोंग गा रहा हूं.
पता नहीं मुझको कि राइट या रोंग गा रहा हूं

पल में ही नेताजी आकर गीत गाकर चले गये.
एक मैं ही हूं जो गाना इतना लोंग गा रहा हूं.

भ्रष्टता के गीत गाते सभा में बैठे सभी सभासद
क्या करूं , लाचार हूं .कोन्ग-कोन्ग गा रहा हूं.
                                   ( Congress)

भजन गा रहे हैं देश और दिल्ली की पब्लिक.
मैं ही हूं जो पेरिस और होन्गकोंग गा रहा हूं.

लोग झोली भरकर भी गीत गाकर मांगते हैं.
मैं भूखा "मांग" के बदले मोंग-मोंग गा रहा हूं.

भरे पेट होते हैं जिनके वे सच्चे गाने गाते हैं.
नकली खुशियां झूठी आवाज में ढोंग गा रहा हूं."

ससुरजी तो गाना गा रहे थे मैं मुश्किल से झेल पा रहा था. उनके गीत को ब्लोग पे डालता तो मेरे ब्लोगर मित्र स्याम भाई मेरा बाजा फ़ोङ देते और बिगुलवाले सोनीजी चिन्दी-चिन्दी कर देते. सोच ही रहा था कि पूछने लगे----
" कैसा लगा दामादजी यह गजल ?"
"गजल तो इतना बढिया बना है कि शब्द ही नहीं हैं---बिल्कुल नयी फ़सल है यह गजल. क्या लय है ....सोंग....रोंग.. लोंग...वाह"---- प्रशंसा तो हर किसी के कविता पर करनी चाहिये और ये तो मेरे ससुर थे. अच्छा मौका था. मैंने कहा---- "पापाजी थाईलैंड से मेरे एक ब्लोगर मित्र ने आपको एक काम के लिये ओफ़र दिया है. रोजगार भी मिलेगा और विदेश घूमने का मौका भी."

"वेतन कितना मिलेगा"---ससुरजी ने पूछा. मैंने जबाव दिया---"दो लाख भात प्रति महिना"

ससुरजी बोले---" दो लाख भात../? अगली कविता पोस्ट कीजिये----


खाने के लिये चाव चाहिये.
भात नहीं मुझे भाव चाहिये.
बहुत प्यार दिया दुनियां ने
एक - दो छोटे घाव चाहिये.


भूखे को जिसने दी रोटी
उसी ने लूटी उसकी बेटी
पहले तो दे दोगे भात
फ़िर मारोगे पीछे लात
अपनी दुनिया रौशन है
मुझको थोङा छाव चाहिये.
भात नहीं मुझे भाव चाहिये."

मैंने कहा---" वाह (कहना ही पङता है)....लेकिन यह ओफ़र बहुत ही अच्छा है पापाजी"
तभी बीच मे आकर श्रीमतीजी बोलने लगी------

"छिन रहे उनकी आजादी

वाह रे वाह तेरी दामादी

कहीं नहीं जायेंगे पापाजी

छोङकर घर सीधी- सादी."


वह भी आज कविता में ही बात कर रही थी लेकिन रस में फ़र्क था ससुरजी करुण रस और श्रीमतीजी वीर रस गा रहे थे. मेरे लिये तो उस समय दोनो रस विष बन चुका था.



अगले भाग में नौकरी के ओफ़र पर विचार जारी रहेगा.... क्रमश

Wednesday, September 29, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-७ (व्यंग्य)

मैं काफ़ी परेशान था. अब तो आप भी जान गये होंगे कि बच्चे को पढाने कहा तो किस तरह की शिक्षा दी गयी. शोपिन्ग के लिये भेजा तो गांधी की जगह मल्लिका शेरावत का फ़ोटो ले आये .उपर से फ़ास्ट-फ़ूड का सुपरफ़ास्ट अफ़ेक्ट देखने को मिला. अगले दिन जैसे ही घर लौटा जिद करने लगे----"दामादजी मुझे कोमनवेल्थ गेम दिखाईये."
मैंने कहा----"यह गेम तो ३ अक्तुबर से होनेवाला है."
हंसने लगे...बोले----"उस खेल में तो जो होनेवाला है वो सबको पता है. खेल तो अभी मजेदार हो रहा है. खुद मनमोहन सिंह भी झूम रहे होंगे. वाह.... क्या व्यवस्था किया है. दिल्ली में कोमनवेल्थ के नाम पर अभूतपुर्व विकास हुए हैं. इसके लिये शीला दिक्षीतजी को गोल्ड मेडल मिलना चाहिये."
"गोल्ड मेडल...? सङकों की गड्ढों में पानी भरे हुए हैं इसके लिये...?"
"दामादजी गड्ढे तो कहीं भी हो सकते हैं. शीलाजी ने अपने नहाने के लिये कोई तालाब नहीं खुदवा दिया जो लोग हल्ला मचा रहे हैं. उपर से इन्द्र देवता की कृपा से बारिश हुई है तो गड्ढे में पानी तो भरेंगे ही. इसके लिये राजनीति नहीं विज्ञान जिम्मेवार है जिसके चलते पानी गड्ढे में भर गये. जितने गहरे गड्ढे हैं उससे ज्यादा गहरी चिंता शीलाजी के चेहरे पर साफ़ दिख रही है. उपर से आशा कि किरणें दिखाई दे रही है कि भविष्य में गड्ढों में भी सङकें बनायी जा सकेंगी."
गुस्सा तो बहुत आया. जिस शीला दीदी के व्यवस्था पर पूरा देश थू-थू कर रही है उसे ससुरजी दाद दे रहे थे.मैंने पूछा "और ओवर-ब्रिज जो ढह गया उसके किये किसे गोल्ड देंगे ?"
"श्री सुरेश कलमाडी जी को. उनका पूरा ध्यान गेम पर है न कि ओवरब्रिज पर. कोई भी खेल सिर्फ़ खिलाङियों से ही आगे नहीं बढता. कोच, मैनेजर, खेल संघ के अधिकारी, खेल मंत्री, ठेकेदार और सट्टेबाजों की भी भूमिका होती है. इनमें से कोई भी ओवर-ब्रिज को ढाहने नहीं गया था. यदि ढह गया तो ईंजिनियर से पूछा जाना चाहिये कि पुल क्यों ढहा.."
" तो सारा दोष आप ईंजिनियर को देते हैं ?"
" नहीं...बिल्कुल नहीं. लोहे-सिमेंट की ब्रिज हो या आदमी--किसी के लाइफ़ की गारंटी कोई कैसे दे सकता है."
"लेकिन पापाजी फ़ुट-ओवरब्रिज के ढहने से तेइस लोग मामुली रुप से घायल हो गये और चार लोग जिन्दगी-मौत के बीच झूल रहे हैं"
" दिल्ली में तो बस में चढे लोग भी मामुली रुप से घायल हो जाते हैं. जो लोग जिन्दगी-मौत के बीच झूल रहे हैं उन्हें बधाई देता हूं---झूला झूलने का आनन्द उठावें. झूला झूलना तो हम भारतियों का प्रिय शौक रहा है. इसमें तो हमें मजा ही आता है."
" फ़िर आप किसको दोषी मानते हैं..?"
" किसी को भी नहीं. देश को कोई नुकसान नहीं हो रहा जो किसी को गलत मानूं..अपने देश का पैसा था देश के लोगों ने खाया. कोई चार्ल्स शोभराज तो पैसा नहीं लूट गया. देश की छवि भी सुधरी है."
"देश की छवि सुधरी है ? "
"बिल्कुल...अब तक अमेरिका और पश्चिमी देश कहते थे भारत गरीबों का देश है, यह सपेरों का देश है ,यहां के लोग जादू-टोना में यकीन करते हैं. अब देखियेगा दामादजी ...यही लोग कहेंगे भारत चालाकों और धूर्तों का देश है. इतना अमीर है कि सत्तर हजार करोङ रुपये फ़ूंककर सङकों पर गड्ढे बनवाती है. करोङो रुपयों से ओवरब्रिज बनवाती है जिसके रोतो-रात ढह जाने से किसी को दुख नहीं होता"

"और सुरक्षा व्यवस्था...?"
"सुरक्षा व्यवस्था तो इतनी अच्छी है कि विस्फ़ोटक लेकर भी एक ओस्ट्रेलियाई सकुशल स्टेडियम तक पहुंच गया. दिल्ली में खुलेआम बिक रहा है लेकिन विस्फ़ोटक बेचनेवाले, खरीदनेवाले और दिल्ली की देखनेवाली जनता सभी सुरक्षित हैं....इससे बढकर सुरक्षा व्यवस्था क्या होगी."
"ऐसे में खेल चलने लगेगा और सीमा-पार से आतंकवादी घुस आये तो...?"
"कौन सी सीमा. कहीं आप भारत पाक सीमा की बात तो नहीं कर रहे. जब आतंकवादी और विस्फ़ोटक इधर भी है और उधर भी...तो सीमा बीच में कैसे हो गयी. सीमा तो अफ़गानिस्तान के आस पास होनी चाहिये.दूसरी बात हम सात साल से गेम की तैयारी कर रहे हैं तो पाकिस्तान गेम चालू हो जाने के बाद तैयारी करेगा..?"..........वैसे पाकिस्तान तो शान्ति-प्रिय देश है जहां कोई भी आतंकवादी नहीं है."

"क्या कह रहे हैं आप...पाकिस्तान में कोई आतंकवादी नहीं है."
"बिल्कुल नहीं. वहां के लोग तो सिर्फ़ युद्ध का प्रशिक्षण लेते है. प्रशिक्षण के बाद वे अमेरिका, औस्ट्रेलिया और इंगलैंड चले जाते हैं...जो बाच जाते है ईंडिया आ जाते है. पाकिस्तान में तो कोई रहता नहीं...बेकार लोग बदनाम करते हैं"
"अभी तो मणिशंकर अय्यर जी कह रहे थे कि खेल का अयोजन होना चाहिये जिससे हमारा हुंह काला न हो..."

"मणिशंकरजी खुद गोरे हैं क्या जो मुंह काला हो जायेगा. गोरे तो अंग्रेज थे..हम भारतियों को तो वे लोग सदा से काले समझते रहे. जितना लूटना था लूट गये और इस हाल में छोङ गये कि और भी मुह काला होने की नौबत आ गयी है."

अब मैं नहीं सह पा रहा था. हर गलत बात को ससुरजी जस्टिफ़ाइ कर रहे थे. पुन: मेरे दिल का दर्द जुबां से निकला
"इंगलैंड और आस्ट्रेलिया के कई एथलीट भारत नहीं आ रहे हैं......?,,,,,,"
"इससे क्या फ़र्क पङता है .यहां डेंगू के सिवा उन्हें कुछ भी हाथ नहीं लगता. दौङ में मेडल नहीं जीत पाते. हमारे देश की जनता दिल्ली दौङती ही रहती है ...न ही कभी नेताजी के दर्शन होते हैं और न ही मेडल मिलता है...इसलिये दौङ का मेडल तो हमारे देश में ही रहेगा."

"बांकी खेलों में..?"
"बांकी कौनसी खेल...? स्वीमिंग....? दिल्ली में बाढ आयी हुई है. देश के तैराकों के पास प्रेक्टिस का सुनहाल मौका है...देखियेगा ये सारे मेडल देश में ही रहेंगे.जिस तरह से तैयारी चल रही है. कोई भी खेलने दिल्ली नहीं आयेंगे....अपने देश के खिलाङी भी नहीं.फ़िर सुरेश कलमाडीजी शुटिंग करेंगे, शीला दीदी तैराकी में भाग लेंगी, खेल मंत्री एथलीट बनेंगे और मनमोहन सिंहजी गोला फ़ेकेंगे. सारे के सारे मेडल देश में ही रह जायेगा. इतिहास बन जायेगा.
"मुझे नहीं लगता कि कोई भी खिलाङी खेलने नहीं आयेगा.."
"आयेंगे तो आयें...हमने मना थोङे ही किया है. यमुना का जल स्तर बढ ही रहा है. कुछ दिनों के बाद एयर-पोर्ट और बस अड्डे पर भी पानी होगा... लंदन से नई दिल्ली पानी के जहाज से आ सकें तो आयें.....उपर से यदि कहीं सङक धंस गया तो हम जिम्मेवारी नहीं लेगें और......डेंगू फ़ैलानेवाले मच्छर हमारी बात नहीं मानते ये भी जान लें. हम अच्छा खेलने पर गोल्ड की गारंटी दे सकते है...लाइफ़ की नही."

अगले भाग में ससुर जी थाइलैन्ड से मिले नौकरी के ओफर का जवाब देंगे .... क्रमश

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-4,5,6 (व्यंग्य)

मैं चुपके से सुन रहा था. उनके रेखा गणित में गणित कहीं नहीं था सिर्फ़ रेखा ही रेखा दिख रही थी. ससुरजी को कैसे समझाया जाये गणित में भी बहकी बातें ही पढाते हैं. वह कभी भी गलत नहीं बोलते लेकिन बच्चों पर तो इसका दुष्प्रभाव ही पङेगा न ?. मैंने सोचा देव-भाषा संस्कृत के साथ छेङखानी नहीं करेंगे.इसलिये मैंने उन्हें टिंकू को संस्कृत पढाने का आग्रह किया.अगले दिन आकर दरबाजे पर ठहर गया. ससुरालवालों ने सुनने की क्षमता तो बढा ही दिया है.सुनने लगा------

"विद्या ददाति लोभम , लोभम ददाति धूर्तताम

धूर्तत्वा धनमाप्नोति,धनात पाप: तत: दुखम.



अर्थ बाद मे बताउंगा पहले श्लोक लिखो.

"उत्तमा कारं ईच्छन्ति , मोटर सायकिलं मध्यमा

अधमा सायकिलं ईच्छान्ति सायकिलं महती धनं.


"असत्यं वद प्रियं वद न वद असत्यं अप्रियं

विना विलम्बे सत्यम प्रियम वद अवश्यम.


अगला श्लोक: नार्यस्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र नेता ".


तभी मेरे मुंह से निकल गया---"नेता नहीं देवता.". ससुरजी बोलने लगे---" दामादजी मैंने जान-बूझकर मोडिफ़ाइ करके बताया है.आज के बच्चे देवी-देवता के बारे में नहीं जानते और देवता और नेता में अब फ़र्क ही कहां है. अब तो सुर-असुर साथ-साथ बैठकर पक्ष और विपक्ष की भूमिका निबाहते हैं. दोनो मिलकर सत्ता का अमृत पीते हैं. उपर से संसार का विष इतना विषैला हो चुका है कि आज के महादेव विष पीकर कोमा में जा चुके हैं....देखियेगा जल्दी ही कोमा से फ़ुल-स्टोप लग जायेगा ".


ओह कोमा में तो मेरी जिंदगी चली गयी थी. ससुरजी के रहते टिंकू का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था. अंधकार में तो रोशनी डाला जा सकता है लेकिन इसी तरह वह पढाते रहे तो उसका भविष्य गर्त में चला जायेगा.मैंने फ़िर से उस ब्लोगर मित्र से सलाह लिया तो उसने कहा कि उनसे शोपिन्ग-वोपिंग करवाओ.मेरी बात को मानते हुए ससुरजी सायंकाल टिंकू के साथ शोपिंग के लिये चले गये.

अब घर में मैं और श्रीमतीजी ही बच गये थे.कुछ ही देर में मौका देखकर अपने पिता के सेवा और सत्कार में हुई कमी से आहत होकर पानी से भरा हुआ श्रीमतीजी की आंखों का स्टोर हाउस रिसने लगा----"जानते हो जब मेरे पापा शोपिंग के लिये जाने लगे मैंने रुपयों के लिये ड्रावर खोला.उसमे गांधी जी के फ़ोटो वाला एक भी नोट नहीं निकला.मेरी आंखों मे आंसू तैर गये....पापा क्या सोचे होंगे....उन्हें कितना बुरा लगा होगा ".

मैंने कहा---" इसमे बुरा लगनेवाली क्या बात है...मेरे ससुरजी ग्रेट हैं. उन्हें बिल्कुल बुरा नहीं लगा होगा "

" हां..वह कहने लगे कि कोई बात नहीं है, जो लोग आज के जमाने में सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हैं, गांधीजी उनसे दूर ही रहते हैं. आजकल वह भी उन बन्दरों से नफ़रत करते है जो उनके कहे अनुसार जीवन जीते थे. क्योंकि उन्हीं बन्दरों के चलते उन्हें गोली मारा गया था..."

मैंने समझाया----" डार्लिंग कहां से कहां बात ले जा रही हो. नोटों पर गांधीजी की तस्वीर होती है गांधीजी थोङे ही होते हैं.".वह फ़िर रोने लगी----"उनको तो गोडसे मरवाया गया था. अब तो उनकी तस्वीर ही बची है न ? ".

मैंने कहा---" स्वीटहर्ट गांधीजी तो हमारे दिल में रहते हैं ".

वह झला उठी---" मुझे बेवकूफ़ मत बनाओ छोटे से दिल में तो हर अच्छे लोग रहते हैं जिनसे हम प्यार करते हैं. लेकिन इतने महान हैं तो हमारे बङे से पेट में क्यों नहीं समा जाते जो खाली है."


मैं उछल पङा----" ब्लोग पे डालुंगा...डार्लिंग तुमने ऐसी बात कह दी जो आजतक बङे से बङे नेता भी नहीं कह पाये....मैं लिखुंगा कि जिसका पेट खाली है उसके पेट को भरो सिर्फ़ उसके दिल में ही जगह बनाने से क्या होगा.सबसे बङा सत्य तो ये है कि आज भी लोगों का पेट खाली है और सबसे बङी अहिंसा यह है कि भूखे पेट रहकर भी जिससे प्यार होता है हम उसे दिल में जगह दे देते हैं. जिसने हमारे लिये वस्त्र तक का त्याग कर दिया उसे हम दिल में जगह क्यों न दें चाहे वह महात्मा गांधी हों या मल्लिका शेरावत ".

"दामादजी बिल्कुल सही कह रहे हैं "----- तब तक ससुरजी शोपिंग कर लौट आये थे------" आज मैंने महात्मा गांधी की तस्वीर खोजी.....नहीं मिली फ़िर चिर-यौवना मल्लिका शेरावतजी की तस्वीर ले आया. यह सोचकर कि किन हालातों में इस लङकी ने अपने वस्त्र का त्याग किया होगा ?"

मैंने समानपूर्वक उन्हें समझाया---" पिताजी ये फ़िल्म की हिरोईन है. अपने शरीर को दिखाकर ये करोङो रुपये कमाती है". वह चौंक गये------" शरीर को दिखाकर करोङो रुपये ..? कैसे..?"

"लोग इनके शरीर को देखना चाहते हैं इसलिये.."
" वाह जन-इच्छा का कितना सम्मान करती है यह अबला "
" पापाजी आप गलत समझ रहे हैं. इन हिरोइन को तो एक्टिंग करना चाहिये न ? "
" ये अच्छा एक्टिंग नहीं करती क्या..?"
" अच्छा एक्टिंग करती है लेकिन आज-कल के लोग सिर्फ़ आंग-प्रदर्शन देखना चाहते हैं. "
"फ़िर.......मैं तो इसी हालात की बात कर रहा था. हालात ही ऐसे हो गये हैं जिससे इस बेचारी मल्लिका शेरावत को स्वयं अपना चीर-हरण करना पङा. कौरव- पांडव सभी एक जैसे हो गये. द्रौपदी करे भी तो क्या. महाभारत की पांचाली...आधुनिक भारत की सहस्त्रचाली बन गयी. धृतराष्ट्र तब भी अंधा था और आज भी अंधा है."---ससुरजी कुछ देर तक शांत रहे फ़िर अपनी बेटी से कहने लगे-----" अब तो बाजार भी बहुत बदल गया है. पहले सत्तु खोजा जब नहीं मिला तो कोल्ड-ड्रींक पी आया. लिट्टी-चोखा भी बाजार से गायब हो गया है .इसलिये मैंने फ़ास्ट फ़ूड पैक करवा लिया ."

हमलोगों ने काफ़ी फ़ास्टली फ़ास्ट-फ़ूड खाया और अपने कामों मे लग गये. मक्के की रोटी---सरसो का साग और आलू चोखा---सत्तु लिट्टी जैसे विशुद्ध भारतीय खानों पर आजकल फ़ास्ट-फ़ूड और कोल्ड ड्रींक हावी है. यदि इस समय आप लंच या डीनर न कर रहे हों तो मैं उस फ़ास्ट फ़ूड का एफ़ेक्ट बताना चाहुंगा. कुछ देर में खतरनाक रुप से घर में प्रदुषण भी फ़ैला और ग्लोबल वार्मिंग भी बढता चला गया. ससुर दामाद का हमारा संबंध ही इतना मधुर रहा है कि हम दोनों में से किसी ने एक दूसरे पर उंगलिया नहीं उठायी. जबकि घर में फ़ैल रहे प्रदुषण में हम दोनों के योगदान के बारे में हम कन्फ़र्म थे. विडंबना देखिये कि हमारी उंगलियां वायु ग्रहण और त्याग स्थलों के इर्द-गिर्द मंडराता रही. प्रकृर्ति के नियम के मुताबिक इन छिद्रों को बंद भी नहीं किया जा सकता. हमारा पेट तो गैस का सिलिंडर बन ही चुका था. वो तो अच्छा था कि किसी ने माचिस की तिल्ली नहीं जलायी. हम दोनों ससुर दामाद एक दूसरे की समस्या को जान रहे थे लेकिन एक दूसरे से कहते भी तो क्या..इसी बीच टिकू आकर पूछने लगा----"नानाजी ग्लोबल वार्मिंग से क्या होता है ?" पता नहीं टिंकू खुद इस समस्या से परेशान था या शरारत कर रहा था. जो भी हो ससुरजी ने उन्हें समझाना चालू किया----" ग्लोबल वार्मिंग से तापमान बढ जाता है. घर को ठंढा रखो तो सब ठीक है....लेकिन यदि ग्लेशियर पिघले लगे तो जीना मुश्किल हो जाता है."----- अचानक ससुरजी का चेहरा लाल हो गया----" कल विस्तार से बताउंगा." कहते हुए दीर्घशंका के लिये लघु कक्ष में प्रवेश कर गये. जब उनका पुराना ग्लेशियर पिघलने लगा था तो पता नहीं मेरे ग्लेशियर का क्या होनेवाला था.
भीतर से तो मेरा भी तापमान बढ गया था उपर से गैस का दवाब भी. मेरा भी जी करने लगा और स्वत: मेरे पांव ससुरजी के पद-चिह्नों पर आगे बढता चला गया.ऐसे अवसरों पर चाह कर भी शिष्टता का ख्याल रखना कठिन होता है, लेकिन मैं उनका सम्मान ही इतना करता हूं कि शौचालय के द्वार तक जाकर ठिठक गया. विपरीत परिस्थितियों में भी शिष्टता का पालन अवश्य होना चाहिये लेकिन हालात बहुत ज्यादा विपरीत होने लगी थी. उपर से ससुरजी बाहर आने का नाम ही नहीं ले रहे थे. अब मैं और रोकता तो प्राण निकल जाते. घर के शौचालय में ऐसी समस्या कभी-कभी हो जाती है लेकिन सार्वजनिक शौचालयों में ऐसी समस्या नहीं आती. वहां कई कमरे होते हैं जिससे यह कार्य सुलभता से हो जाती है.. इसीलिये उसे सुलभ शौचालय कहते है. तभी दरबाजा खोलकर ससुरजी बाहर आये जैसे ओलम्पिक का मेडल लेकर आये हों. मैं भी बिना धैर्य का प्रदर्शन किये शौचालय में प्रवेश कर गया.

कुछ देर के बाद मैं भी सामान्य महसूस करने लगा. काम हो जाने के बाद यही शौचालय सोचालय बन जाता है. नींचे की ओर पीले तरल को देखकर मैं सोचने के लिये बाध्य हो गया कि किन हालातों में यमुना का नीला पानी आज पीला हो चुका है----दिल्लीवालों ने फ़ास्ट-फ़ूड और विदेशी कंपनियों के कोका कोला को पीकर यमुना का ये हाल कर दिया होगा. देवी -देवता ही अच्छे हैं जो लाख गंगा प्रदुषित हो जाये गंगाजल ही चढवाते हैं पेप्सी और थम्स-अप नहीं..अन्यथा वे भी गैस-ट्रीक के शिकार हो जाते. देश की करोङो जनता के पास एक वक्त के खाने के लिये दस रुपये नहीं हैं वहीं लोग खुद को आधुनिक दिखाने के चक्कर में मात्र २५० मिली कोल्ड ड्रींक बारह रुपये में खरीदकर पी जाते हैं.देशी-खाना, देशी-पेय पीनेवाले लोगों को बेवकूफ़ ही समझा जाता है पर बुद्धिमान तो वही है जो ५० पैसे के निंबू और १-२ रुपये के चीनी का शर्बत पीता है.

तब मैं जिस कुर्सी पर बठा था उसके नींचे लग रहा था फ़ास्ट-फ़ूड को मिक्सी में पीसकर डाल दिया गया हो. उपर से बास भी मार रहा था. मैंने तो दोनो हाथों से कान पकङ लिया था. देशी-खाना, देशी-पेय ही खाउंगा. लग रहा था जैसे पेट से ठक-ठक की आवाज आ रही थी---बाद में जाना कि ससुरजी दरबाजा ठकठका रहे थे. वह पुन: शौचालय पधारना चाहते थे. मैंने इतना समय लगा दिया कि वह न ही ठीक से दरबाजा बंद कर पाये और न ही बैठ पाये थे. कार्य स्वत: हो गया. जैसे ही बाहर आया श्रीमतीजी कहने लगी---"सो गये थे क्या? जल्दी से जाकर डाक्टर को बुला लाओ...पापा को दिखा दो". समस्या तो हम दोनो ससुर दामाद की एक ही थी लेकिन केन्द्र की सरकार की तरह श्रीमतीजी का दोहरा मापदंड मुझे अजीब सा लगा. इलाज के बाद ससुरजी स्वस्थ हो गये.

अगले भाग में कोमनवेल्थ गेम्स पर ससुरजी विचार प्रगट करेंगे.... क्रमश

भाग-४ एवं भाग-५ क्रमश:  kaduasach.blogspot.com , sanjaybhaskar.blogspot.com  पर भी देख सकते हैं.

Sunday, September 19, 2010

मैं ,श्रीमतीजी और..........भाग ३ (व्यंग्य)

उसने अपना भाषण जारी रखा ---" शान्ति का सन्देश देने से भले ही पब्लिक न माने लेकिन नेता , पुलिस , अपराधी सबके साथ आपके सम्बन्ध अच्छे हो जायेंगे ......लेकिन  क्रान्ति के नाम पर तो ये लोग मुझे विधवा कर देंगे .फिर बिना परेशानी के मैं अपनी जिन्दगी कैसे काट पाउंगी ?".
अब मुझे  वर्दास्त नहीं हो रहा था----" तो क्या तुम्हारी परेशानी मैं हूँ  ?"
" नहीं जी ये तो मेरे पापा के विचार थे .मैंने तो सिर्फ उनका समर्थन किया था "
" समर्थन...?"---अब मैं सहन  नहीं कर पा रहा था---" समर्थन किस बात के लिए ?'.
"इस बात के लिए की वह महिलाओं का दर्द समझते हैं.".
"क्या बहकी बातें कर रही हो ? तुम्हारे कहने का मतलब महिलाओं का दर्द पुरुषों के चलते है  ?"
" नहीं जी. मैंने ऐसा कब कहा. यदि पुरुषों ने महिलाओं को दर्द दिया है तो चूड़ी और  बिंदी लाकर खुश भी तो कर देता है और  यदि डांटते -पीटते हो तो शाम को पिज्जा भी तो खिलाते हो"----श्रीमतीजी के हंसी में दर्द के छीटे साफ़ दिखाई दे रहे थे. मैं जान रहा था जल्दी ही उसकी आँखों में घरियाली आंसू के सैलाब आनेवाले हैं.

                                                                           ससुरजी जब भी आते हैं चाहे तो सैलाब आता है या तूफ़ान.अगले दिन मेरे एक ब्लोगर मित्र ने सुझाव दिया की ससुरजी को बच्चे को पढ़ाने के काम में लगा दिया करो. मैंने ऐसा ही किया.जब शाम को घर पहुंचा तो चुप चाप खिड़की   से झांककर देखा वह टिंकू को पढ़ा रहे थे---" पढो...ए फॉर   अमीर , बी फॉर बेईमान.
टिंकू ने टोका---" लेकिन पापा तो ए फॉर एप्पल पढ़ाते हैं....."
"बेटे एप्पल से तुम याद नहीं रख पाओगे ...आजकल एप्पल कहीं दिखता नहीं अस्सी रुपये किलो चल रहा है और  आज के महगाई के दौर में अमीर लोग तो फुटपाथ पर भी मिल जायेंगे. पढो सी फॉर करप्सन "   टिंकू ने फिर टोका------"नानाजी ....ये भी एप्पल  और बनाना की तरह कोई फल होता है क्या ?".
" नहीं..करप्सन  पौधे  का नाम है जिसे आजकल हर डिपार्टमेंट में लगा दिया गया है.इसका फल सीधे कैश के रूप में निकलता है." ओह गोड ससुरजी बच्चे को पढ़ाने के बदले बिगार रहे थे.मैं कमरे में घुसा और बोला-----" पापाजी चलिए दूसरे रूम में बैठकर बात करते हैं ". वह बोले---" नहीं दामादजी मुझे अपने नाती को पढ़ाने दीजिये----पढो डी फॉर दंगा ". अब उनको रोकना बहुत जरुरी था.सो मैंने कहा---" पापाजी मुझे आपसे बहुत जरुरी सलाह लेना है." इसबार वह मान गए.

                                                                      मैंने सोचा गणित में बहकी बातें करने की संभावना नहीं है इसलिए मैंने उनसे आग्रह किया की टिंकू को गणित पढ़ाया करें. अगले दिन शाम को वह टिंकू को रेखा-गणित पढ़ाने   लगे ------- ---
" रखा-गणित को समझाने के लिए पहले रेखा को जानो.पहले लोग बिंदु से शुरू करते थे तब जाकर रेखा के बारे में जान पाते थे.आजकल लोग रेखा से शुरू कर रेखा पर ही गणित समाप्त कर देते हैं.रेखा को जानने के प्रयास में कई विद्वान् स्वर्ग सिधार गए.मेरे जैसे कई लोग जिन्हें रेखा से लगाव रहा युवा से वृद्ध होते गए लेकिन रेखा जस की तस बनी रही.उसका महत्व कभी भी कम नहीं हुआ. गणित, वाणिज्य और कला के क्षेत्र में रेखा के योगदान को कभी भी नहीं भूला जा सकेगा.यदि रेखा न होती तो आज से तीस चालीस वर्ष पूर्व ही कला दम तोड़  देती, मुंबई जैसी महानगरी का वाणिज्य रसातल में चला जाता और कई लोगों का जीवन गणित कागजी बनाकर रह जाता.रेखा को आधार बनाकर जितने भी थ्योरेम्स लिखे गए लोगों के बीच हिट हुए.आधार ही नहीं वह लम्ब और कर्ण भी बनी ऊपर से सौन्दर्य तो उसमें है ही. बड़े  से बड़े  नटवरलाल भी सरल रेखा के खेल के सामने बौने सावित होते रहे .मुकद्दर  के सिकंदर भी अपने मुकद्दर की रेखा को बदल नहीं पाए .मुझे लगता है रेखा की प्रासंगिकता कभी भी कम नहीं होगी. कभी अंतहीन सीधी रेखा लोगों के अग्निपथ को सरल -पथ बनाती रही तो कभी शराब के प्याले की परिधि की तरह किसी वृत्त का रूप लेती रही जिसके क्रन्द्रक में मयखाना ही समा जाया करता था. सत्तर के दशक में आज की तरह ना ही कैट हुआ करती थी न ही करिश्मा होती थी.तब पढ़ाई का माहौल अच्छा था. वह रेखा का स्वर्णकाल था.उस समय सभी छात्र  रेखा के अध्ययन में लगे रहते थे.....लेकिन कोई भी रेखा को नहीं जान पाया.

अगले भाग में ससुरजी टिंकू को संस्कृत के श्लोक पढ़ाएंगे.............क्रमश:

Thursday, September 16, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-2(व्यंग्य)

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सोचते सोचते मैं "ससुर" शब्द का लैंगिक विश्लेषण करने लगा. यह शब्द पुलिंग होता है और आजीवन पुलिंग ही बना रहता है यदि और केवल यदि दामाद शब्द को स्त्रीलिंग शब्द की भांति अर्थ दे.कभी-कभी पुलिंग से स्त्रीलिंग शब्द बनाने पर शब्द एक दूसरे के विपरीतार्थक भी हो जाते है.....मेरे मामले मे यह बिल्कुल सही बैठता है.जहां ससुरजी असुर की तरह पेश आते हैं वहीं मेरी सासू मां साक्षात देवी हैं यदि नागिन बनकर मेरी श्रीमतीजी के कानों में फ़ूंक न मारा करें तो.

मैं यह सब सोच ही रहा था.तभी अचानक श्रीमतीजी आकर बोली----"लगता है मेरे पापा के आने से तुम खुश नहीं हुए...". मैंने अपने भाव पर नियंत्रण करते हुए कहा---
" ऐसी बात नहीं है. मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है. वैसे तुम्हारे पापा किस वक्त आ टपके..?".वह गुस्सा गयी---
"ऐसे क्यों बोल रहे हो जी ?".भाव को कंट्रोल करने के चक्कर में मैं भाषा पर कंट्रोल ही नहीं रख पाया था.मैं पूरा ध्यान भाषा पर फ़ोकस करते हुए कहा...."प्रिये...तुम्हारे परम पूज्य पिताश्री किस सुकाल में पधारे थे ?"
उसने कहा--"तीन घंटे हो गये....". "तीन घंटे...?"---मेरे जवाब प्रश्न कम विस्मयादिबोधक थे.----"तीन घंटे में तो तुम उन्हें घर के इतिहास से लेकर मनोविज्ञान तक बता दिया हिगा..?"
"हां, मैंने तुम्हारे ब्लोग के बारे में भी बताया. बहुत खुश हुए. कहने लगे कि फ़ालतु लोगों के लिये फ़ालतु समय का इससे अच्छा उपयोग कुछ भी नहीं हो सकता. मैंने जब कहा कि टिप्पनियां कम मिल रही है तो उन्होंने मशविरा दिया कि भिखारियों की तरह भगवान या अल्लाह के नाम पे मांगेंगे तो जरुर मिलेगा. नहीं तो आजकल लोग देह का मैल भी मुफ़्त में नहीं देते.लेकिन तुम्हारे ब्लोग "क्रांतिदूत" से वह चिंतित है.कहने लगे क्रांति तो अपने आप आयेगी दूत बननें की जरुरत नहीं है.क्रांति के दूत के साथ कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता. दूत ही बनना है तो शांतिदूत बनें."
मैंने कहा---"तुमने यह नहीं पूछा कि शान्तिदूत बनुंगा तो लिखुंगा क्या..?"
"हां..पूछा...कहने लगे......देश के महान नेता लोग, मंत्री महोदय भले ही खुलेआम खजाना लूट रहे हों---फ़िर भी शांति बनाये रखें.......खुलेआम चौराहे पर किसी की इज्जत लूटी जा रही हो---फ़िर भी शांति बनाये रखें.....आतंकवादी और नक्सली खुलकर लोगों को मार रहे हों---फ़िर भी शांति बनाये रखें...खुलेआम मजहब के नाम पर नफ़रत फ़ैलाये जा रहे हों---फ़िर भी शांति बनाये रखें.....भ्रष्टाचार और मंहगाई बेलगाम हो जाये--फ़िर भी शांति बनाये रखें. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि देश भांङ में जाये---फ़िर भी शांति बनाये रखें.......

क्रमश:

Wednesday, September 15, 2010

मैं,मेरी श्रीमतीजी और.............भाग-१(व्यंग्य)

कार्यालय से प्रस्थान कर घर पहुंचने ही वाला था ,आज फ़िर श्रीमतीजी द्वार पर प्रतीक्षा कर रही थी.मैंने गहरी सांसें ली अवश्य कोई अशुभ क्षण आ गया है.
"जानते हो आज मेरे पापा घर आये हैं "--वह बोली.
"तो कौन सा दिन में चांद निकल आया है. जो इतनी खुश हो रही हो. यह समाचार कुछ देर के बाद नहीं दे सकती थी."---मैं स्वयं को नियंत्रित नहीं रख पाया था. वह बोली---"मैं सरप्राइज दे रही हूं और तुम..........."
" सरप्राइज दे रही हो या हार्ट अटेक करवाना चाहती हो...?जिससे जमकर रेल्वे का पेंशन खा सको......ये सब समाचार कम से कम दस दिन पहले बता दिया करो........."----मैं तब भी सहज नहीं हो पाया था. कमरे में जाकर चुप-चाप बैठ गया.

तीन अक्षरों से बना यह शब्द "ससुर" आकारान्त में आते ही ससुरा (गाली) बन जाता है अर्थात एक संज्ञा से दूसरी संज्ञा या संबोधन बन जाता है.संधि विच्छेद करें तो स+सुर ,लेकिन अक्सर ये दामाद के सुर को बिगाङ दिया करते है.बिना कोई कुसूर किये ही यह दामाद के साथ असुरों सा व्यवहार करते हैं जो ससुर का व्याकरण कि दृष्टि से विपरीतार्थक है.वैयाकरणाचार्यों को चुनौती देते हुए मेरे हिसाब से तो ससुर,असुर और कुसूर समानार्थक शब्द हैं.समानार्थक ही नहीं एकार्थक कहिये. हिन्दी के जन्म-दाताओं ने यदि इन तीनों शब्दों के बदले एक ही शब्द बनाया होता तो मातृ-भाषा हिन्दी भी सरला होती और लोगों का जीवन भी कुशल होता.

साहित्य और व्याकरण से हटना नहीं चाहता. मूल शब्द सुर ही है अर्थात देवता, वीर आदि.अब "अ" पहले लगा दें तो असुर अर्थात राक्षस....लेकिन दामादों का दुर्भाग्य देखिये सुर में स लगाकर ससुरा क्षमा करें ससुर बनाया गया. यदि वे सचमुच देवता या वीर होते तो सीधे सुर कहा जाता.यहां सुर में ’स’ लगाकर पूर्व के विद्वानों ने सीधे संकेत किया है कि ससुर अर्थात कन्या के पिता उतने ही सुर हैं जितना उनमें स लगा है बांकी उतने ही असुर जितना स नहीं लगा है. अर्थात उनके विशेषण ससुरत्व या ससुरता से उनके योग्यता को मांपना चाहिये.यह शब्द अक्सर करण कारक बनकर संबंध कारक को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं. कर्ता , कर्म और सम्बोधन कारकों में बिना गलती किये सम्प्रदान कारक पर कार्य करें तो संबंध कारक सुरक्षित रहेंगे ,अन्यथा शनि सहित अन्य सभी ग्रहों के अच्छे प्रभाव भी उन्हें करण कारक बनने से नहीं रोक सकते. लाख भाषा और साहित्य को मधुर कर लें ससुर के मामले में तो व्याकरण का ही चलता है.......

अगले भाग मे इस शब्द का लैंगिक विश्लेषण करेंगे........क्रमश: