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Tuesday, June 1, 2010

गुङ और चींटी

मैं अपने घर में चींटियों से परेशान था.खाने पीने का सामान तो दूर मेरे कपङे,बिस्तरे और सोफ़ा सेट भी उससे अछुता नहीं था.वैसे चींटियां भी मुझसे परेशान हो चुकी थी. एक दिन मुझसे उनकी हालत देखी नही गयी और मुझे उनपे तरस आ गया.मैंने सोचा यदि थोङा सा गुङ लाकर रख दूं तो ये मुझे भी परेशान नहीं करेंगे और इनका भी कल्याण होगा.

अगले ही दिन मैं बाजार से पांच किलो गुङ लाकर अपने घर में रख दिया.कुछ देर के बाद उसपर दो-चार चींटियां आ गयी.फ़िर अगले कुछ मिनटों के बाद चींटियां कतारों में सैकङो-हजारो की संख्या में आने लगी.उनका शिष्टाचार देखते ही बन रहा था.कहीं किसी तरह का विरोध नहीं.

कुछ दिनों के बाद विभिन्न आकार और नस्लों वाली कई तरह की चींटियां गुङ के उपर जमा हो चुकी थी.धीरे-धीरे गुङ भी घटने लगा था.छोटी-छोटी कई चींटियों को गुङ से दूर कर दिया गया था. कुछ चींटियां समुहों में किसी सरदार चींटी के अधीन गुङ पर काबिज थी.कुछ बङी काली चींटियां हिंसात्मक दिख रही थी.नस्ल, रंग-रुप और आकार के आधार पर चींटियों का दल बन चुका था.उपर से देखने पर सारा माजरा श्पष्ट दिख रहा था.......किस तरह चंद चींटियों ने राजनीति से गुङ के बङे हिस्से पर कब्जा कर लिया था.कुछ चींटियां रक्षा के नाम पर गुङ भोजन में दलाली ले रही थी और कुछ को बलपुर्वक वंचित कर दिया गया था.मैंने अपने एक मित्र को बुलाकर दिखाया और कहा -" देखो, अभी भी इतना गुङ बचा हुआ है कि सभी चींटियां आराम से बसर कर सकती हैं फ़िर भी किस तरह आपस में लङ रही हैं." मेरे मित्र ने कहा-"दोस्त,इस गुङ का भी वही हश्र हो रहा है जो हमारे देश का हुआ है.गुङ के टुकङे-टुकङे तो हो ही चुके हैं ,लगता है इसके टुकङे भी सलामत नहीं बचेंगे और चींटियों का तो भगवान ही मालिक है."

Friday, May 14, 2010

लोमङी की चतुराई

जंगल में प्रजातंत्र हो जाने के बाद राजा शेर भी ब्लोगिंग करने लगा.जंगल में ही एक गीदङ अपनी पत्नी लोमङी के साथ रहता था.गीदङ और लोमङी भी ब्लोगिंग करते थे.लोमङी किसी तरह शेर को नींचा दिखाना चाहती थी.वह अक्सर गीदङ से कहा करती थी कि शेर उस पर बुरी नजर रखता है.

गीदङ इन बातों से परेशान था.वह शेर से डरता था.अंत में परेशान होकर वह शराब पीने लगा.जब भी वह शराब पीकर आता तो उसे लोमङी शेर के खिलाफ़ उकसाती और उसकी चुगली करती थी.लोमङी गीदङ के हिस्से क खाना पाने के लिये उसे मारकर और शेर को नींचा दिखाकर-एक ही तीर से दो निशाना साधना चाहती थी.एक दिन जब गीदङ शराब पीकर घर आया और खाना मांगा तो लोमङी बोली-"आज तो मैं बहुत अच्छा खाना पकायी थी ,पर सारा खाना तो शेर खा गया.अब मैं कहां से खाना लाऊं, तुम गुफ़ा में जाकर शेर को धमकाओ ?". जब गीदङ नहीं माना तो फ़िर कहने लगी-"अगर तुम मर्द नहीं हो तो मैं जाती हूं.क्या करेगा ज्यादा से ज्यादा मुझे खा ही लेगा ना ? तुमने तो चूङियां पहन रखी है."

.इन बातों से गीदङ का स्वाभिमान जाग गया.वह गुफ़ा में जाकर शेर को ललकारने लगा-"मर्द है तो बाहर निकल हरामी.रोज मेरा खाना खा जाता है.".शेर ने देखा कि उसने दारू पी लिया है.उसने मुस्कुराते हुए कहा-"तेरा खाना मैंने नहीं खाया.यदि तुम्हें खाना चाहिये तो ले जाओ मेरी गुफ़ा से.".गीदङ ने कहा-" तुम मेरी लोमङी पर बुरी नजर रखते हो ... .बाहर निकल....आज मैं अपनें अपमान का बदला लेना चाहता हूं..". इस पर शेर को गुस्सा आ गया.उसने अपना पंजा हिला दिया और गीदङ की मौत हो गया. अगले ही दिन पुरे जंगल में शेर बदनाम हो गया कि उसने बेचारे गीदङ को मार दिया. इस बदनामी से शेर के स्वाभिमान को ठेंस पहुंचा.वह उस गुफ़ा को छोङकर चला गया और चालाकी से उसमे लोमङी रहने लगी.अपने किसी मित्र के पूछने पर शेर ने बताया- "लोमङी गलत थी फ़िर भी आसानी से उसने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया क्योंकि उसने अपना मूल स्वभाव नहीं बदला.इसलिये अपना मूल स्वभाव कभी नहीं बदलना चाहिये."

Sunday, April 25, 2010

जंगल में नक्सलवाद

जंगल में नक्सलवाद की समस्या से शेर चिंतित था.नक्सलवादी सांपों ने सत्ता के विरुद्ध बिगुल फ़ूंक दिया था.वस्तु-स्थिति से अवगत होने के लिये गृह-मंत्री हाथी को बुलाया गया.हाथी ने कहा-" महोदय, ये सांप विकास के विरोधी हैं.ये सत्ता पर अधिकार करना चाहते हैं.निर्दोष जानवरों को जान से मार देते हैं......ये पशुतंत्र विरोधी हैं.जंगल के लगभग एक चौथाई हिस्से इनके प्रभाव में हैं".कुछ देर शांत रहकर फ़िर कहने लगा-"महाराज इनसे निपटने का अब एक ही रास्ता बचा है.इन्हें पांव से कुचल दिया जाये". तभी विपक्ष में बैठा एक जानवर बोलने लगा- "महोदय,इन विषैले सापों ने आज तक कई निर्दोष जानवरों को डसा है.हाल ही में रक्षा-दल के जानवरों को सामुहिक रूप से मार डाला था.ये सम्पत्ति को भी नुकसान पहुंचाते है........इनके विरुद्ध आपने आज तक क्या किया ? ".

तभी विपक्ष कि नेता ने अपना भाषण पेश किया-"महाराज, गृह-मंत्री हाथी महोदय आपकी तरह एक कुशल अर्थ-शास्त्री हैं.इन्हे जंगल में सिर्फ़ वित्त ही दिखाई देता है.मैं सलाह देता हूं थोङा बहुत समाजशास्त्र का भी मंत्री महोदय अध्ययन कर लें.विद्रोह का मूल्यांकन और समाधान मात्र अर्थ से ही नहीं होता.वित्त-मंत्री के रुप में हाथी महोदय ने जंगल को कमर-तोङ मंहगाई दी और जब से वित्त विभाग छोङकर गृह-मंत्री का पद-भार लिया है तब से नक्सलवाद को बढावा दे रहे हैं.."शेर कहने लगा-"विपक्ष रचनात्मक भुमिका निवाहे.हाथी महोदय निर्दोष हैं.".विपक्ष ने पलटवार किया-"क्या जंगल का आर्थिक उदारीकरण सिर्फ़ आपने अकेले किया था?जब इसका पूरा श्रेय आपको जाता है तो नक्सलवाद का आरोप भी सत्ता-दल को स्वीकार करना चाहिये.गृह-मंत्री हाथी महोदय आपने उत्तरदायित्व को स्वीकार कर अपने पद से इस्तीफ़ा दें."पूरा विपक्ष हाथी से इस्तीफ़े की मांग करने लगे.हाथी भी ताव में आकर त्यागपत्र दे दिया लेकिन शेर ने यह कहते हुए उसे अस्वीकर कर दिया कि इन विषैले सांपों को कुचलने के लिये हाथी के वजन्दार पांव से बेहतर हो ही क्या सकता है.

शेर अपनी मांद में बैठा था.सलाहकार भालू से बात चल रही थी.शेर-"नक्सलवाद का मूल कारण क्या है?" .भालू- "महोदय,मूल तो भूमिगत होता है.तना और शाखायें काफ़ी विशाल हैं."शेर-"मुझे दर्शन-शास्त्र मत समझाओ." भालू-"महोदय, अधिकतर सांपों में तो जहर भी नहीं है.कुछ सांप जहरीले हैं लेकिन यह उनकी रक्षात्मक शक्ति है.जबकिकुछ अन्य जानवर सपेरे उन्हें दूध पिलाते हैं.यह सच है कि इन सांपों का शोषण हुआ है.रक्षा-दल के कुत्ते और अदालत चलानेवाली बिल्ली ने कभी भी इनके साथ न्याय नहीं किया.इनके मणि को इनसे छीन लिया गया और जिस जमीन पर ये वास करते थे....से बेदखल कर अन्य जानवरों के लिये महल बनाये गये."शेर-"यदि ऐसी बात है तो ये बोलते क्यों नहीं?".भालू-"महोदय, जिसके पेट में राशन होता हओ वही भाषण देता है,जिसके पेट में आग लगी होती है वह सिर्फ़ आग लगा सकता है" शेर-"चुप रहो, मुझे तुम्हारे विचार भी नक्सली लगते हैं.अब कैसे भी इन सांपों को तो मारना ही होगा."भालू-"महाराज, मेरे पास एक हथियार है जिससे इस नक्सलवाद से निजात पाया जा सकता है.कल पशु-सभा में मैं वह हथियार आपको सौंप दुंगा."

पशु-सभा में उपस्थित सभी जानवरों के बीच भालू बोलने लगा-"महोदय, मेरे हाथ में जो लाठी है इससे नक्सलवाद को खत्म किया जा सकता है.(सभी जानवर हंसनें लगे).हंसिये मत. यह कोई मामुली लाठी नहीं है.अहिंसा की लकङी से बने इस लाठी को सत्य का तेल पिलाया गया है.एक महात्मा ने इसी लाठी के बल पर जंगल को दो सौ साल की गुलामी से आजाद किया था.हुजूर इस लाठी को देखते ही अपराध और अन्याय रफ़ू-चक्कर हो जाता है और विषैले सांपों को तो मानो सांप सूंघ जाता है.इसके सामने बङे से बङा तोप भी काम करना बंद कर देता है.और...सबसे बङी खाशियत तो यह है कि इस लाठी को भांजने की जरुरत नहीं होती.उस महात्मा ने अपने हाथ में यह लाठी लेकर जिन तीन बंदरों को सैनिक बनाया था वह तो मात्र बैठकर अपना मूंह, आंख और कान बंद कर लिये थे.......महोदय इतिहास से साक्ष्य लेकर एक बार फ़िर इस लाठी पर विश्वास कीजिये न सिर्फ़ नक्सल्वाद बल्कि भ्रष्टाचार,मंहगाई आदि सभी समस्यायें इससे दूर हो जायेंगी.".

Friday, April 16, 2010

जंगल में चमचा-राज

जंगल का राजा शेर ही होता है लेकिन शेर के लिये भी वेश-बदलकर राज करना संभव नहीं होता.उसने अपना वेश बदल तो लिया पर राज-काज चालु नहीं रख पाया.अग्यातवास में रहकर राज-काज की जानकारी लेते रहना...उसे उचित लगा.

कुछ दिनों के बाद अचानक एक बूढा शेर सत्ता की कुर्सी पर आसीन हुआ.उसने स्वयं को पुर्व के राजा शेर का उत्तराधिकारी बताया.अपने दो प्रमुख चमचों भेङिया और सांप को सबसे महत्वपुर्ण मंत्रालय की चाबी थमा दिया. जब पशु-संसाधन और गृह मंत्रालय जैसे विभाग भेङिये को और रक्षा मंत्रालय का प्रभार सांप को सौंप दिया जाये तो..........जिसके एक डंक से बङे से बङे जानवर स्वर्गलोक सिधार जाते....वह रक्षा क्या करता. गीदङ भी पशु-संसाधन का उपयोग अपनी सेवा में करता रहा.दोनों चमचों की चांदी हो गयी.जंगल के सभी जानवर परेशान रहने लगे.रोज ही वह सांप किसी न किसी को डसता और भेङिया सभी जानवरों का चारा चट कर जाता.

तभी एक दिन एक तोता अग्यातवास में रह रहे शेर के पास गया और कहने लगा-"हुजूर, सभी जानवर भेङिया और सांप को दोषी मान रहे हैं लेकिन मुझे लगता है महाराज शेर ही असली गुनाहगार हैं". शेर ने पुछा- " कैसे....?".तोता ने कहा-"हुजूर उनमें राजा के लक्षण नहीं दिखते,न ही उनके चेहरे में तेज है, न ही शेर वाली गुर्राहट और न ही वीरता के कोई चिह्न.

अगले ही दिन अग्यातवासी शेर ने अपना प्रतिनिधि हाथी को राजा शेर के मांद में भेजा. मांद में थोङी सी रोशनी थी. राजा शेर मरा हुआ मांस खा रहा था.....आश्चर्य की बात थी.हाथी ने जैसे ही उसको पकङकर खींचा,उसकी खाल बाहर आ गयी.वह शेर की खाल में नकली मूंछ लगाये गीदङ निकला.उसका मुंह काला कर उसकी मरम्मत की गयी.चुपचाप सारी जानकारी असली शेर के पास पहुंचा दी गयी.

इधर जंगल के अन्य पशुओं को इस बात की भनक लग गयी कि शेर के खाल में गीदङ राज चला रहा है.अगले दिन सभी जानवर राज-भवन में एकत्रित होकर राजा का विरोध करने लगे. तभी शेर अपनी कुर्सी पर आराम से बैथकर जोरदार ढंग से गुर्राया.वह असली शेर था.फ़िर मुस्कुराते हुए हाथी के कान में कहा-"शेर की खाल पहनकर कोई शेर नहीं हो जाता.शेर मरा हुआ मांस नहीं खाता.जंगल में भी प्रजातंत्र होने के कारण राजनीति उसकी मजबूरी है लेकिन चमचागिरी उसे कतई पसंद नही."

Monday, April 12, 2010

जंगल का राजा

शेर भले ही जंगल का राजा था लेकिन उसकी मुश्किलें भी कम नहीं थी.राजा भले ही कोई बने ,प्रजातंत्र में चलती तो प्रजा की ही है...और जब प्रजा जानवर हो तो राजा को पङेशानी तो होगी ही.शेर पङेशान था.विपक्ष में बैठे जानवरों के वार को सहते-सहते थक गया था। पशुमत शेर के पक्ष में लेकिन कुटिलता विपक्ष की ओर,सद्भावना शेर के पक्ष में लेकिन धुर्तता विरोधी खेमें में.....शेर करे तो क्या करे...?.यही हाल विपक्ष का भी.शेर के शरीर का तो खून ही राजसी था.विपक्ष को कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था.तलवार से मुकाबला करो तो भी शेर आगे, षङयंत्र करो तो भी शेर विजयी, विद्वता में भी शेर किसी से कम न था.....आखिर शेर को हरायें कैसे? अंत में विपक्ष ने शेर की कमजोरी पकङ ही ली।

एक लोमङी ने विपक्ष के नेता से कहा "महोदय, शेर दिलदार है, महान है, स्वाभिमानी है, उदार है..........".नेता ने टोका -"मेरे शत्रु की प्रशंसा कर रही हो?" लोमङी ने जबाब दिया"-नहीं हुजूर.....मैं शेर की कमजोरी बता रही हूं.उसके स्वाभिमान पर चोट करो. वह अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये दरियादिली दिखायेगा और महान कहलाने के लिये उदारतापूर्वक गद्दी छोङ देगा.".विपक्ष के नेता ने ऐसा ही किया.शेर ने गद्दी छोङ दिया.यह खबर जंगल में लगे आग की तरह फ़ैल गयी।

जैसे ही यह समाचार हाथी को मिला वह चिंतित हो गया.वह शेर के मांद तक पहुंचा.लेकिन शेर जो ठान ले उसे करने से कौन रोक सकता है?.शेर के पास भी तेज दिमाग था,वह पानी के टंकी पर चढ गया,यह सोचकर की हाथी वहां नहीं चढ पायेगा. हाथी भी आखिर हाथी था उसने अपनी ऊंचाई का फ़ायदा उठाकर शेर को नीचे उतारा.समझाया-"राज नही करना है तो मत कर.आराम कर. मस्ती से देख,राज तो चलेगा ही।

शेर आराम करे और राज चलता हुआ देखे, यह कैसे हो सकता है?.......और शेर को छोङकर क्या लोमङी राज चलायेगी ? अंत में शेर ने अपनी खाल बदल ली.वेश- भूषा भी पूरी तरह बदल डाला,बिना किसी को बताये. वह नये रुप में फ़िर से राज करने लगा.कुर्सी पर बैठते ही उसने धीरे से अपने मंत्री को कहा"लोमङी कितना भी चालाक हो जाये जंगल का राजा शेर ही होता है

Monday, February 22, 2010

भ्रष्टतंत्र का बाबू साहेब

एक छोटी सी भूल भी आपकी नौकरी खा सकती है.विजिलेंस विभाग आज के समय में इतनी सशक्त हो गयी है कि बडे से बडे गुनहगारों को भी अभयदान दे सकती है और मानवीय गलतियों के लिये भी नौकरी से निकाल सकती है. यह बात छोटे-मोटे बाबू लोग विल्कुल नही समझते.कुछ दिनों पहले रोज की तरह बाबू टिकट काट रहा था. लोग पंक्ति मे खडे थे.तभी अचानक तीन लोग एक दुसरे के समानान्तर खडे होकर टिकट मांगने लगे. बाबू नें पहले तो एक-एक कर टिकट लेने को कहा फ़िर आग्रह करने पर तीनों से पैसे लेकर एक साथ टिकट देने को तैयार हो गया.अभी बाबू नें एक ही टिकट काटा था कि विजिलेंस का छापा पड गया.विजिलेंस ने पाया कि बाबू के पास टिकट के हिसाब से ज्यादा रुपये थे.प्राथमिकी दर्ज की गयी.जांच के दौरान बाबू अपने आप को निर्दोष साबित नहीं कर पाया.न ही किसी की सिफ़ारिश ली और न ही युनियन के नेताओं को बचाव हेतु मध्यस्थ बनाया.मामले की गंभीरता को देखते हुए बाबू को नौकरी से हटा दिया गया.

यदि वह नौकरी के दौरान भ्रष्ट रहा होता तो कुछ दिन घर पर बठकर भी रोटी-मक्खन खा सकता था,लेकिन ईमानदारी की कमाई मे बरकत कहां होती.......जो उसे घर बैठे रोटी मिल पाता.उसे एक विजिलेंस अधिकारी नें बताया था कि उनके उपर भी कुछ मामले निश्चित रुप से बनाते रहने का दबाब रहता है.काफ़ी मशक्कत करने के बाद विभाग नें उसे पदावनति कर नौकरी वापस कर दी.

बाबू ने नौकरी की दुसरी पारी काफ़ी शानदार ढंग से शुरु किया.वह बाबू से बाबू साहेब बन गये.कुछ ही दिनों में बाबू साहेब युनियन का नेता बन गया.विजिलेंस के साथ उनके संबंध मधुर हो गये.विभाग के सभी कर्मचारी और अधिकारी उससे प्रसन्न रहने लगे और कभी दो वक्त की रोटी के लिये तरसनेवाला अब निश्चिंत रहने लगा कि दो पुस्त तक यदि उसके घर में किसी को नौकरी न भी मिले तो भी वह आराम से रोटी और मक्खन खा सकता है.कुछ दिनों के बाद विजिलेंस सप्ताह मनाया गया.बाबू साहेब नें भी अपना भाषण पेश किया. उसने सभी विभागों के क्रिया-कलापों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और विभाग के प्रति लोगों की निष्ठा औए ईमानदारी की सराहना की.साथ ही साथ उसनें राष्ट्र के प्रगति में सभी लोगों के योगदान की चर्चा करते हुए विभिन्न उपलब्धियों हेतु बधाई दी.तालियों की गडगडाहट के बीच बाबू साहेब मंच से नीचे उतरकर सीधे अपने कार्यालय आ गये.पहले रिवोल्विंग कुर्सी को बांये हाथ से नचाया फ़िर उसे रोककर उसपर आराम से बैठ गये.

तभी एक आदमी मिलने आया.बात ही बात मे वह कहने लगा "बाबू साहेब ,प्रजातंत्र मे तो सबको अपनी बात कहने का हक है".अचानक पहले की कुछ बातें बाबू साहेब को याद आ गयी.बाबू साहेब कहने लगे----------"किताबी बातें मत करो.......प्रजातंत्र...? कौन सा प्रजातंत्र..? कैसा प्रजातंत्र....? हमारे देश मे तो भ्रष्टतंत्र चलता है.भ्रष्टों के द्वारा, भ्रष्टों के लिये और भ्रष्टों पर किया गया शासन भ्रष्टतंत्र.. सदाचार की जगह कदाचार, निष्ठा की जगह दलाली, शासन के बदले जुर्म, देश-भक्ति के बदले धोखा----यही हैं इस भ्रष्टतंत्र के गुण.इस तंत्र मे खाने-पीने का सामान मंहगा बिकता है, वोट ,न्याय, और भावनायें सस्ते मे बिक जाती है. इस तंत्र मे भ्रष्ट लोग महलों में रहते हैं, बांकी लोग झोपडी के कुत्ते (स्लमडाग) कहलाते हैं.इस तंत्र मे छिनकर खानेवालों को पांच सितारा होटल में ठहराया जाता है और मांगकर जिंदगी बितानेवालों को रेलवे प्लेटफ़ोर्म से भी खदेड दिया जाता है. इस तंत्र मे निर्लज्ज भ्रष्ट लोग चौराहे पर औरत के जिस्म की खरीददारी करते हैं और छे्डखानी के शिकार औरतें पुलिस और अदालत के लोगों के द्वारा न्याय के बदले अपना ईज्जत बांटनें के लिये विवश हो जाती हैं. इस तंत्र में ईमानदार बुकिंग क्लर्क बाबू कहलाता है और भ्रष्ट टिकट क्लर्क बाबू साहेब."

Sunday, October 25, 2009

साहब की सोच

छोटे साहब हर समय जिम्मेदारियों से लदे रहते हैं.कभी कर्मचारियों के कार्य का वितरण,कभी अधिकारियों के अधिकार का संघर्ष और उपर से अपने कार्य क दबाब.सचमुच इन सारे दायित्वों का निर्वाह काफ़ी कठिन है.सामान्यतः उनसे कभी भुल नही होती.वह हर समय आदर्श सोचते हैं.
आज तो सुबह से ही दुखद समाचारों कि श्रिखला शुरु हो गयी है।पहला समाचार यह था कि जानकी बाई जो हमारे कार्यालय मे चपरासी, कल मर गयी.उसकी बहू ने पूछने पर इस बात की जानकारी दी.फौरन यह सूचना छोटे साहब को दी गयी.साहब ने तभी बाबू को बुलाया और उदारता दिखाते हुए आदेश पारित किया कि सभी अधिकारी दो सौ रुपये,ग्रुप सी कर्मचारी सौ रुपये और चतुर्थवर्गिय कर्मचारी पचास रुपये जमा करें और सारे रुपये जानकी के बेटे को भेज दिया जायें.कुल आठ हजार पचास रुपये जमा किये गये.एक चतुर्थवर्गिय कर्मचारी के हाथों जानकी के बेटे के पास भेज दिया गया.जानकी का बेटा मातृशोक के सदमे मे डूबा था.सो सारे रुपये तत्काल उसकी बहू ने जमा रख लिया. तभी छोटे साहब के फोन की घंटी बजने लगी.बडे साहब का फोन था.उन्होने अपने पचहत्तर वर्षीय पिता के देहावसान का दुखद समाचार दिया.छोटे साहब ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रगट किया.शोक लहर तत्काल जंगल मे लगे आग की तरह पूरे कार्यालय मे फैल गयी.अभी कार्यालय मे कार्य की शुरुआत ही हुई थी.महिला कर्मचारियों की आंखों से निकली अश्रुधारा शोक की लहर को उसी तरह आवर्धित करने लगी जैसे पवनदेव के सहयोग से महासमुद्र की लहरें तेज हो जया करती है. कार्यालय का कार्य पुरी तरह से ठप हो गया .शोक की लहर में कर्मचारियों के लिये कंप्युटर की कीबोर्ड पर उंगली फ़ेरना कठिन था और अधिकारियों के लिये निर्णय लेन.बडे दिलवाले अधिकतर कर्मचारीगण एवं अधिकारीगण छोटे साहब के पास आकर बडे साहब के पिता के निधन पर शोक प्रगट किया और उनके अंतिम संस्कार मे भाग लेने की इच्छा जतायी.साहब ने उन सभी को हस्ताक्षर कर कार्यालय छोडने की अनुमति दे दी स्वयं भी उनके साथ हो लिये.शेष बचे लोग अपने-अपने कार्य मे लगे रहे.
सायंकाल लगभग पांच बजे अंतिम संस्कार के उपरांत सभी लोग कार्यालय वापस आ गये.जानकी का बेटा छोटे साहब के कक्ष के पास खडा था. छोटे साहब के कक्ष मे जाने के बाद वह भी आदेश लेकर कक्ष मे प्रवेश किया.पुछने पर वह बोलने लगा "साहब! मेरी मां ने मरने से पहले कहा था कि आफ़िस जाकर बता देना नही तो साहब लोगों को पानी कौन पिलायेगा. उसने तीस साल रेलवे की सेवा की थी.जीते जी जब साहब लोग खुश होकर उसे रुपये देते थे तो वह नही लेती थी,मरने के बाद वह इतने रुपये लेकर क्या करेगी?आज तो यहां दो-चार लोग ही काम कर रहे थे,क्यों न ये सारे रुपये रेलवे को दे दिया जाये" वह तनिक चुप हो गया.साहब भी शान्त रहे.उन्होने रुपये लेकर अपने लोकर मे रख लिया.वह फिर कहने लगा "साहब मेरी मां इस कार्यालय मे सब को जानती थी और हर कोइ उसे दीदी कहकर पुकारते थे". वह फिर से चुप हो गया. वह जहां खडा था और साहब जहां बैठे थे उन दो स्थानों की सामाजिक दूरी इतनी ज्याद थी कि एक-दुसरे के विचारों के ज्वार को समझना नामुमकिन था और अश्रुधारा के रुप मे प्रगट करना उतना ही शर्मनाक.इसी बीच वह आदेश लेकर चला गया. साहब ने अपने कमरे का दरबाजा अन्दर से बंद कर दिया और फूट-फूटकर रोने लगे.जानकी के हाथ से इतने दिनों मे उन्होंने जितना पानी पीया था,सार पानी आंसू के रुप मे अपनी आंखों से बहा दिया.अक्सर जब एक बार कहने पर कोई बात जानकी नही सुनती तो साहब चिल्ला उठते थे और कहते थे बहरी हो गयी हो क्या.आज उनके फूट-फूटकर रोने की आवज दरवाजा बंद होने के कारण कोई नही सुन रहा,शायद बहरी जानकी सुन रही होगी.इससे बढकर श्रद्धांजलि क्या हो सकती है? साहब ने जानकी का कर्ज चुका दिया था.
अब चिंतन का समय था.साहब का चिंतन बडे साहब के पिता और जानकी के रेलवे के प्रति किये गये योगदानों की तुलना पर केंद्रित हो गया था.ईश्वर ने उन दोनों के जीवन मे तो बहुत बडा फर्क कर दिया था लेकिन मृत्यु तो सभी की एक जैसी होती है.ईंसानों ने उनके जीवन मे भी फर्क किया था और मृत्यु मे भी.क्षण भर के लिये साहब को लगा कि जानकी हाथ मे पानी का ग्लास लेकर खडी है,उनक चिंतन टूट गया.

Wednesday, October 14, 2009

सच बोलना गुनाह है।

धुन लगी है सच बोलने की। सनकी है साला। सौ दफे समझाया, मत बोला कर। कुछ बोल ही मत। बोलेगा भी तो झूठ बोल, सच मत बोल। सच काहे के वास्‍ते बोलेगा। तेरे को पागल कुत्‍ते ने काटा है क्‍या। लाख समझाओ कौन मानता है। काहे को मानेगा। शेर समझता है खुद को। सनकी साला।

शाम का वक्‍त था। चौराहे पर चायवाला भी था और पानवाला भी। रास्‍ते के दोनों ओर कई दुकाने खुली थीं। हम सीधे रास्‍ते सिनेमा हॉल की ओर चलते गये। फिर तीन घंटे सिनेमा देखा। सिनेमा के दौरान परदे पर सैकड़ों गोलियाँ चली, कमोवेश उतने ही लोग मरे। वह कुछ नहीं बोला, क्‍योंकि जानता है परदे पर दिखने वाले पिस्‍तौल खिलौने थे, गोलियाँ नकली थी और इन मौतों का सच से कोई रिश्‍ता न था। सिनेमा के बाद हम उसी रास्‍ते से आ रहे थे, जिधर से गये थे। फिर एक गोली चली और खल्‍लास। मैनें तो कुछ नहीं देखा। चायवाले और पानवाले को कल भी अपनी दुकानदारी चलाना है। इसलिए उसने भी कुछ नहीं देखा।
किसी ने कुछ नहीं देखा सिवा उसके। मैं उसे समझाया, लॉक रख अपनी जुबान को। हमारी तरह तुमने भी कुछ नहीं देखा। तुम कुछ बोल ही मत। बोलना है, तो बोल कि कुछ नहीं देखा तूने। झूठ के सिवा कुछ भी मत बोल, लेकिन काहे को मानेगा। उसने वर्दी वाले को सब कुछ बताया। उस वर्दीवाले को जो अक्‍सर गोली चलने के आधे घंटे के बाद ही आता है तब तक गोली चलाने वाले का हुलिया भी बदल चुका होता है, और ठिकाना भी। उस वर्दीवाले को उसने सब कुछ बताया-गोली चलाने वाले का चेहरा भी, और हुलिया भी। शेर के माफिक लोगों की भीड़ में शर्ट की छाती के बटन खोलकर एक-एक बात बतायी उसने। सच जो बोल रहा था। किसी खादी वाले का नाम बताया था उसने। जानता ही नहीं खादी वाले और वर्दीवाले में दोस्‍ती का रिश्‍ता होता है। अपनी दोस्‍ती के वास्‍ते कुछ भी करता है ये लोग। चोरी करता है, डाँका डालता है, खून करता है, बलात्‍कार करता है और क्‍या नहीं करता अपनी दोस्‍ती के वास्‍ते। लेकिन उसका कुछ नहीं होता। अदालत की ऊँची कुर्सी पर बैठकर और टेबल पर हथौड़ा ठोक-ठोककर आर्डर-आर्डर चिल्‍लाने वाला भी जानता है कि मामूली सी गलती भी उसे महँगी पड़ सकती है। जब खादी वाला कानून बनाता है, और वर्दीवाला चलाता है तो वो कौन है बीच में बोलने वाला।

अभी-अभी गोलियाँ चलीं हैं, चंद मिनट पहले, उसी जगह। दुकानें खुली हुई हैं, चायवाला भी है और पानवाला भी। आज भी किसी ने कुछ नहीं देखा। मैंने भी कुछ नहीं देखा। लेकिन आज तो इसे खुद ही गोली लगी है जरूर इसने सब कुछ देखा होगा। गोली चलाने वाले का चेहरा भी और हुलिया भी। ये तो छाती की बटन खोलकर एक-एक बात बताया है किसी से डरता ही नहीं। आँखें खोलकर रखा है। लेकिन देखो न जुबॉन को लॉक कर दिया है। कुछ बोल ही नहीं रहा है। आज सच्‍ची रिपोर्ट कौन लिखवायेगा। बाकी लोगों ने तो कुछ देखा ही नहीं। उन्‍हें कभी ये सब दिखायी ही नहीं देता। जिसने देखा है वह कुछ बोल भी नहीं रहा है। लगता है कि आज जान गया है कि सच बोलना गुनाह है।
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Wednesday, October 7, 2009

मंगल-सूत्र

उसे ठीक-ठाक घर का पता नहीं मालूम। इतना जानती है कि वह रांची में रहती थी। पढाई के नाम पर गांव के स्‍कूल को दूर से ही देखा था उसने। शायद इसलिए घर का फोन नम्‍बर भी याद रखना उसके वश की बात नहीं। उम्र सोलह-सतरह से कम नहीं है, लेकिन नाम पूछने पर पाँच साल की बच्‍ची-सी मासूमियत लिए प्‍यार से कहती है। चमेली जिसे वह हिन्‍दी और अंग्रेजी, दोनों लिपियों में लिखना जानती है।

पिछले साल उसकी माँ चल बसी और उसके बाद पिता ने भी इस बोझ को ढ़ोने से मना कर दिया। इस तरह विरासत में कुछ भी नहीं पाया चमेली ने। बस, उसे अपनी माँ का चेहरा याद है, जिसने मरते वक्‍त अपनी अमानत अपनी बेटी को दे दी थी। वह अमानत थी-मंगल-सूत्र। यद्यपि चमेली सीधी-साधी लड़की है, फिर भी वह मंगल-सूत्र की कीमत भली-भाँति जानती है। वह समझती है कि यह धागा विश्‍वास और पवित्रता का प्रतीक है-यह एक अमूल्‍य निधि है। वह एक समझदार युवती है। बेसहारा होने के बाद भी उसने ध्‍ौर्य नहीं खोया। घर-घर जाकर काम करती रही, रोजी-रोटी की कमी कभी नहीं खली। फिर अचानक चमेली की जिंदगी में एक गुलाब आया- हॉ गुलाब ही नाम है उसका। उसने न सिर्फ चमेली के घायल हृदय पर स्‍नेह का मरहम लगाया, बल्‍कि कई नये सपने भी दिखाये। वह किसी भी मायने में चमेली से बेहतर नहीं है, फिर भी उस समय चमेली को एक सहारे की जरूरत थी, जिसे गुलाब ने पूरा कर दिया। चन्‍द दिनों के बाद दोनों राँची से दिल्‍ली आ गये। ट्रेन का नाम न ही चमेली को पता है और न ही गुलाब को। यहाँ दोनों मेरे मकान के सामने के मकान में किराये पर रहने लगे। दोनों देखने में काले हैं, चमेली नाटी सी है और उसकी नाम इतनी चौड़ी है कि किसी भी दृष्‍टि से उसे सुन्‍दर कहना सुन्‍दरता का अपमान होगा। लेकिन चन्‍द दिनों में ही मैंने, देख लिया है कि चमेली अन्‍दर से इतनी अच्‍छी है कि प्रश्‍ांसा के ढे़र सारे शब्‍द छोटे पड़ जायेंगे। मैंने चमेली या गुलाब या दोनों को एक साथ जब भी देखा है, हँसते हुए देखा है। दोनों के चेहरे को देखकर कोई भी कह सकता है कि ये काफी भोले-भाले हैं। तभी एक दिन अचानक चमेली मेरे घर आयी, ठीक वैसे ही जैसे ट्‌यूशन पढ़ने वाले बच्‍चे सीध्‍ो मेरे कमरे में मेरे टेबुल के पास आकर खड़े हो जाते हैं। मैंने उसकी ओर देखा आँखों में प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह लिये। वह बोल पड़ी-‘‘हमें आपसे कुछ माँगना है, इसीलिए आये हैं।‘‘ मैंने पूछा-‘‘ क्‍या माँगना है?‘‘ ‘‘ हमें ये कार्ड चाहिए, शादी के वास्‍ते।‘‘ उसने मेरी टेबुल पर रखी ग्रीटिंग कार्ड की ओर इशारा किया और बोलती चली गयी। ‘‘हमारी शादी हो रही है न कल।‘‘ इसी के वास्‍ते, उसने तो सबको कार्ड भी दे दिये। अब हमारा भी तो फर्ज है कि किसी को कोई कार्ड दे दूँ। उसकी मूर्खता पर मैं हँसना चाहता था, लेकिन उसके चेहरे की मासूमियत ने हँसने से रोक दिया। मैंने उसे समझाया ‘‘चमेली ये कार्ड पुराने हैं, तुम्‍हें तो नये कार्ड चाहिए ना।‘‘ और उस पर तुम लोगों का ही नाम लिखा होना चाहिये। इस पर उसी ने समझाना शुरू किया। ‘‘कार्ड पुराना है तो क्या हुआ साहब। ‘‘ घर में ही देना है उसको। और वो आपका नाम कैसे पढ़ेगा? कौन सा पढ़ा लिखा है़...मेरी तरह...है। इस बार मैं स्‍वयं को हँसने से नहीं रोक पाया। उसके लिये उसके पति का पढ़ा-लिखा या मूर्ख होना कोई मायने नहीं रखता। मैं समझ रहा था, फिलहाल चमेली को समझाना संभव नहीं है। मैंने हँसते हुए कार्ड उठाकर उसके हाथ में दे दिये। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि चमेली यह कार्ड उसे (गुलाब को) क्‍यों देना चाहती है, जबकि गुलाब से ही तो उसकी शादी हो रही है। कार्ड हाथ में लेकर वह धन्‍यवाद आदि कहने की कोई जरूरत समझे बिना ही चलने लगी। फिर भी मैंने उसको रोक दिया- लेकिन... तुम ये कार्ड गुलाब को क्‍यों देना चाहती हो" "कोई नहीं है ना अपना इसी के वास्‍ते। हम कार्ड किसको देंगे और वही तो हमारी शादी में सब कुछ कर रहा है। पन्‍द्रह-बीस लोग आयेंगे कल। आप भी आ जाना, बहुत अच्‍छा खाना बनेगा।‘‘ कहते हुए चली गई चमेली। कितनी सीधी-साधी है चमेली। कुछ भी छिपाना नहीं जानती। आज वह खुश है, मुस्‍कुरा रही है कल उसकी शादी होने वाली है। उसके चेहरे की खुशी नहीं कहती कि जिन्‍दगी में उसे हँसने का अवसर बहुत कम मिला है। आज कल के समझदार लोग पूरी जिन्‍दगी हँसने के लिये अवसर तलाशते हैं। कई अवसर भी आते हैं लेकिन दिल खोलकर हँस नहीं पाते। हमें चमेली से सीखना चाहिये कि छोटे से मौके पर भी कैसे दिल खोलकर हँसा जाता है। अगले ही दिन चमेली और गुलाब की शादी धूमधाम से हो गई।

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सिर्फ शादी के तीन दिन हुये हैं। चमेली बरामदे पर खड़ी है। चारों ओर से लोगों ने घ्‍ोर रखा है। चमेली तमाशा बनी हुई है, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मगर आस-पास के लोग शायद सब कुछ समझ रहे हैं। कुछ लोगों के लिये चमेली के इस सप्‍ताह की कहानी एक ख्‍ोल है, कुछ के लिये हादसा और कुछ के लिये दो-तीन एपिसोड में बनने वाली दूरदर्शन के सीरियल की कहानी। चमेली की आँखें सूखी हैं, शायद आँसू बहाने का काम उसने पहले ही कर लिया है। आज उसके चेहरे से चमक गायब है। माँग रिक्त है और उसने गले से मंगलसूत्र भी निकाल फेंका है। कल ही गुलाब उसे छोड़कर राँची चला गया, उसकी जिन्‍दगी से दूर.......... काफी दूर, सदा के लिये। हो सकता है वक्‍त बीतने के साथ गुलाब फिर से बदल जाये, मगर चमेली का क्‍या होगा? क्‍या उसका गुलाब के प्रति विश्‍वास लौट पायेगा। शायद कभी नहीं। क्‍या वह जूठी मंगलसूत्र फिर से पहनने की गलती करेगी? शायद नहीं। कितना मामूली था यह मंगलसूत्र! तीन दिनों में ही अपना रंग बदल गया।
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अरविंद झा

Monday, October 5, 2009

जंगल-राज

जंगल-राज
प्रजातंत्र हो जाने के बाद यहां जंगल मे भी राज चलाना काफ़ी कठिन हो गया है.उपर से राजनीति भी जोरों पर है.अभी हाल ही मे आम चुनाव हुए थे जिसमे शेर की पार्टी ने हाथी के दल को पटखनी दी और पुर्ण बहुमत लेकर सत्तासीन हुई.लम्बे-चौडे वादे किये गये.भेडों-बकडों के समुह को यह कहकर वोट मांगा गया कि शेर अब उसका शिकार नही करेंगे.मछलियों से वादा किया गया कि मगरमच्छों से उनकी रक्षा की जायेगी.छोटे-छोटे जानवरों को विश्वास दिलाय गया कि सस्ते दरों पर उन्हे चारा उपलब्ध कराये जायेंगे.किसी भी पशु-पक्षी को बेरोजगार नही रहने दिया जायेगा और सारे फ़ैसले जानवरों के हितों को ध्यान मे रखकर लिया जायेगा.हाथी के दल ने भी कुछ मिलते-जुलते वादे ही किये थे लेकिन अंततः पशुमत शेर की पार्टी के पक्ष मे रहा.हाथी को विपक्ष का नेता चुना गया और शेर की सरकार बनी.सियारों को प्रमुख मन्त्रालय दिये गये----क्योंकि चुनाव के दौरान उन्ही की ब्युहरचना और लिखे गये भाषण काम आये थे.
आमसभा मे हाथी ने चमचों को मंत्रालय दिये जाने पर सरकार की आलोचना की और यह भी आरोप लगाया कि जिन क्षेत्रों मे शेर की पार्टी को सीटें नही मिली उन क्षेत्रों से किसी को भी मंत्री नही बनाया गया.इस पर शेर शांत रहा और यह कहते हुए हंस दिया कि जब हाथी का शासन था तो वे सत्ता पाकर उनमत्त हो गये थे और बेरहमी से छोटे जानवरों को कुचल दिया था.इस पर विपक्ष मे बैठे जानवरों ने शोर मचाना चालू कर दिया.शेर भी आखिर शेर था, वह अपना मूल स्वभाव कैसे भूल सकता है.वह भी गुर्राने लगा. तभी एक मंत्री आकर शेर के कानों मे फ़ुसफ़ुसाया "महोदय ,मिडियावाले देख रहे हैं.यहां जो कुछ भी होता है उसमे मसाला लगाकर टेलीविजन के जरिये छोटे जानवरों को दिखाये जाते हैं. राजनीति यही कहता है कि सबके सामने सबको बोलने दो लेकिन अकेले मे जो विरोध करे उसकी जुबान काट लो.भरी सभा मे विरोध हो तो हंस्कर टाल दो और रात के अंधेरे मे विरोधी को पांव तले कुचल दो".शेर को थोडी बहुत राजनीति की बातें समझ मे आ रही थी.आखिर उसकी पुलिस-कुत्तों की फ़ौज, उसके जेब मे है और काली बिल्ली न्यायालय चलाती है.अकेले दम पर वह हजारो जानवरों को अपना शिकार बना सकता है.तभी विपक्ष से एक जानवर खडा हुआ और बोलने लगा "आप सभी जानवरों को सस्ते दर पर चारा कहां से देंगे जबकि आपके मंत्री खुद चार खा जाते हैं?". दुसरा बोला "जानवरों को बेवकूफ़ बनाकर पचासो साल से आप राज करते रहे,इतने दिनो मे आप ने क्या किया?".एक एक कर सभी जानवर बोलते रहे और शेर शांत भाव से सुनता रहा.फ़िर सभा क विसर्जन कर दिया गया.सायंकाल मिडियावालों को शेर ने अपने आवास पर बुलाकर बहुत अच्छा भोज दिया.उन्हे बकरे की मीट और मुर्गे की टांग पडोसी गयी.रात मे टीवी पर विपक्ष मे बैठे जानवरों के दुर्व्यवहार की खिल्ली उडायी गयी. सरकार की दूरदृष्टि की प्रशंसा की गयी.शेर की ईमानदारी और सहनशीलता की सराहना हुई.
रात के बारह बज चुके थे.काम करते करते शेर थक चुका था.वह बहुत भूखा था.मिडियावालों के साथ यह कहते हुए वह खाना नही खाय था कि उसने मांसाहार छोड दिया है.दिन के सर्वदलीय भोज मे पनीर की सब्जी जो उसे पसन्द नही है,यह बहान बनाकर नही खाया था कि आज उसे उपवास है.राजनीति का मतलब यह नही होत कि राज करनेवाला भूखा रहे और बांकी सभी मौज करें.उसे सियारों की यह राजनीति पसंद नही आयी.तभी एक सियार शेर के पास आया और भोजन-गृह मे पधारने का अनुरोध किया.सभी जानवर अपने-अपने घरों मे चले गये.शेर का भोजन-गृह जो कि एक अंधेरी गुफ़ा की तरह था-मे शेर प्रवेश कर गया.गुफ़ा मे घुसते ही स्वादिष्ट खाने का गंध उसकी नाक तक पहुंचने लगा.डरी हुई कई छोटी-छोटी निरीह आंखे अंधेरी गुफ़ा मे भी चमक रही थी.शेर मुस्कुराने लगा---अब उसे राजनीति अच्छा लगने लगा था.