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Monday, August 23, 2010

अब तो उल्लू बैठ गया है पेंङ की हर डाल मियां

मुझसे ना पूछो कामन वेल्थ गेम का हाल मियां
अब तो उल्लू बैठ गया है पेंङ की हर डाल मियां

नेताजी तो अपना झोली भरकर ही भाषण देते हैं
साथ में अब अधिकारी भी चूस रहे हैं माल मियां

कभी नहीं भर पायेंगे दिल्ली की सङकों का गड्ढा
शीला दीदी ने मन में फ़हमी लिया है पाल मियां

खच्चरों, गदहों से ढुलवायी जा रही सिमेंट की बोरी
सियार इतने शातिर हैं कि लगने न देते गाल मियां

स्वीमिंग पूल की जगह बनी हुई है झील बरसाती
प्रेक्टिस करनेवालों का हो गया है चेहरा लाल मियां

अंदर से यह महाघोटाला उपर से आतंक का खतरा
आजाद हो चुके राष्ट्रकुल अब जान रहे हैं चाल मियां

खेल खेल में खेल हो रहा खेल का यह गजब खेल
लूटो जिसको जितना चाहो बांका न होगा बाल मियां

Monday, July 26, 2010

हम भारत के मान के रक्षक आज करें हम समझौता

एक तरफ़ है खुदा का बंदा , एक तरफ़ मां का बेटा
हम भारत के मान के रक्षक आज करें हम समझौता.

खङी किये जो तुमने पत्थर से ढाह दो मजहब की दीवारें
मैं भी गंगाजल हाथ में लेकर आज मिटा दूं लक्ष्मण रेखा.

इस्लाम के जिंदाबादी नारे से अब गगन-भेद मैं करता हूं
मुल्क से रखकर आज मुहब्बत तुम भी कह दो वंदे माता.

तुम रामायण के श्लोकों से आज सजाओ अपने कुरान को
मैं कुरान के आयत लेकर फ़िर से लिखता हूं कोई गीता.

अरुणाचल को शीष झुकाकर एक बार नमाज पढकर देखो
जम्मु को मुख करके मैं भी शिव का भजन हूं अब गाता.

पूज्य हमारे राम-कृष्ण को तुम बुलाओ अपने मस्जिद में
परवरदिगार तेरे अल्ला की मैं शिव-मंदिर में मूर्ति बनाता.

ले जाऊंगा तेरे प्यारे बच्चों को मैं बागों की सैर कराने को
मेरे अनाथ और भूखे शिषु को तुम भी दूध पिला देता

ढोंगी - मुल्ला पाखंडी - पंडित हैं कुपुत्र पथ - भ्रष्ट हुए है
मिल राम-रहीम जयहिंद कहे तो होगा मां का मस्तक उंचा

एक ही मां के बच्चे हैं हम न कोई हिन्दू न कोई मुस्लिम
संबंध खून का है हमारा , तुम अनुज मेरे मैं अग्रज भ्राता.

Wednesday, July 21, 2010

चलो अच्छा हुआ कि तुम बहुत ही बेरहम निकले

चलो अच्छा हुआ कि तुम बहुत ही बेरहम निकले
मैं जितना सोचता था उससे तुम बहुत कम निकले.

मुझे वह लगती थी मधुशाला जिसे पीने से डरता था
मगर जब पी के देखा तो जहर के बदले रम निकले.

अच्छा हुआ जो बेवफ़ाई ने मार डाला आशिकी को
तुम्हारी गोद में हमनें था चाहा कि मेरा दम निकले .

मैंने समझा कोई तोप है तेरे गोरे बदन को देखकर
आगोश में जो पाया तुमको खिलौने सा बम निकले.

तुम्हारे साथ बिस्तर पर अकेले ही मैं सोया था
"मेरी जगह" पर सुबह देखा था कि "हम" निकले.

तेरी दरियादिली के खूब चर्चे अब भी शहर में है
मेरे घर से जो तू निकली तो सारे गम निकले.

जब अपने दोस्तों को मैंने बताया प्यार के किस्से
उनकी जेब से उपहार के बदले मरहम निकले.

क्रांतिदूत अब ठहाके मारता है वफ़ा के खेल पर
जिंदादिल तू मौज कर इससे पहले कि यम निकले.

Tuesday, July 20, 2010

मेरा महबूब मेरी जिंदगी के जैसा है

मेरा महबूब मेरी जिंदगी के जैसा है, कोई गैर नहीं न ही ऐसा वैसा है.

अब न वो दिन भरी उजालों का , न ही अब रात उतनी काली है.
मेरे महबूब की शाम कभी न आये , न ही सुबह में अब वो लाली है.
कैसे जिंदा रहूं बता तु मुझे , देख ले आज गम-ए-हाल मेरा कैसा है.
मेरा महबूब मेरी जिंदगी के जैसा है, कोई गैर नहीं न ही ऐसा वैसा है.

वो बसंती हवा बही थी अभी ,ये धूप तेज किरण पल मे ही ढह जायेगी.
रात रानी सी खङी है चौखट पर , गिर रही बूंद जो बरसाती बह जायेगी.
मैं कफ़न ओढ के जीता रहा हूं बरसो से, जिंदा दिल अब भी तेरे जैसा है.
मेरा महबूब मेरी जिंदगी के जैसा है , कोई गैर नहीं न ही ऐसा वैसा है.

चलो अच्छा है मेरे दिल में जगह है तेरी, पीठ पर जख्म बहुत खाये हैं.
मैं तो बहरा हूं जमाने की अब नहीं सुनता, क्योंकि इल्जाम बहुत पाये है.
काली दुनिया में नहीं रौशन है एक जर्रा भी,आंख भी पत्थरों के जैसा है.
मेरा महबूब मेरी जिंदगी के जैसा है , कोई गैर नहीं न ही ऐसा वैसा है.

Thursday, June 17, 2010

कायरों की भीङ में हम सर कटाने आये थे.

जिसने न पायी मोहब्बत उनको पटाने आये थे.
कायरों की भीङ में हम सर कटाने आये थे.

जानता था जालिमों का जुल्म चलता ही रहेगा.
हम शहादत का तमाशा उनको दिखाने आये थे.

सोती रही है जिंदगी , ठंढी मिट्टी के कब्र में,
हम मुसाफ़िर क्रांति की चंगारी जलाने आये थे.

नफ़रतों की दुनियां मे तो आशिकी भी पाप है.
हम मौत को अपनी मोहब्बत भेंट करने आये थे.

आज भी बहनों की इज्जत लुट रही है बेधङक
जुल्म के सौदागरों से इज्जत बचाने आये थे.

इंसानियत की पीठ पर चाकू के निशानें हैं कई
हम शेर बनकर गोलियां छाती पे खाने आये थे.

आज मजहब पाखंडियों के घर की है वेश्या बनी
पैगाम भाईचारे का लेकर मजहब सिखाने आये थे.

हर जुर्म के चौराहे पर तुम टांग देना लाशें मेरी.
हजारो मौतों के बीच हम जिंदगी जीने को आये थे.

Wednesday, June 16, 2010

क्या हुआ जो ना चढा पोस्ट ब्लोगवाणी पर

क्या हुआ जो ना चढा पोस्ट ब्लोगवाणी पर
वाह-वाही ना मिली छोटी - बङी नादानी पर.

मैने जो कविता कहा तुने वही कहानी लिखी
कुछ ने चटका न भरा ब्लोग की दिवानी पर.

उनकी झूठी , मामुली बातें चढी जो आसमां
अपनी बातें रेत में जो दब गयी वीरानी पर.

खुद के शब्दों पे खुदीने खुद बजायी तालियां
हो गये हैं बूढे मगर इतरा रहे जवानी पर.

कोई बना क्रांतिदूत तो किसी ने बिगुल फ़ूंका
अंतिम सच सब भूल गये लङते रहे कहानी पर.

रुई सा हल्का हो गया मर्दों की बातों का वजन.
पसंद के चटके मारते हैं खूबसूरत जनानी पर.

आचार्य भी फ़र्जी निकला,जलजला भी झूठ था
कोई रोक न पाया कभी कलम की मनमानी पर

अब भी रचना हंस रही, पाखी भी आजाद है
ठान ली है ताजमहल बनायेंगे हम पानी पर.

प्यारा यह संसार शब्द का राह दिखा सकते हैं सबको
जग में कोई मूर्ख नहीं, नतमस्तक सबके सयानी पर.

स्वयं महान हूं मैं मित्रों तुम महानतम सारे जग में
तेरे रहते नाम हमारा कैसे चढ सकता ब्लोगवानी पर...??

Tuesday, June 8, 2010

प्यार की परिभाषा पूछा नाम तुम्हारा बता दिया

सारी दुनियां से तु प्यारी मैंने सबको जता दिया
प्यार की परिभाषा पूछा नाम तुम्हारा बता दिया.

सागर की लहरों को मैंने हंसते हंसते छका दिया
उसकी ही राहों में मैंने प्यार का शिला लगा दिया.

चांद को बोला दाग छिपा ले तेरी भी कोई सूरत है.
पूछा तेरी महबूब है कैसी ? तेरी मूरत दिखा दिया.

पर्वत के मांथे को मैंने आज जमीं पर झुका दिया
तुझको देख गगन मंडल में अपना मांथा उठा लिया.

पंडितों और मुल्लाओं को मोहब्बत का पाठ पढा दिया
खुदा से जाकर अपना मजहब प्यार है मैंने बता दिया.

सीमा और सरहद को मैंने उसकी ही हद दिखा दिया
प्यार की हर एक सीमा को पल भर में ही मिटा दिया.

मेरे महबूब की जात जो पूछा मैंने तमाचा लगा दिया
तेरे ही हाथों की मेंहदी के रंग को मैंने दिखा दिया.

गरजी थी दुश्मन की तोपें फ़िर भी उनको हरा दिया
तेरे पायल की मीठी खन-खन मैंने उनको सुना दिया.

Monday, May 31, 2010

पत्थरों से क्यों ईंसान बनाया तुमने ?

पत्थरों से क्यों ईंसान बनाया तुमने ?
जानें लोगों को कितना रुलाया तुमने.

बादलों से भी तो रंग चुरा सकते थे
काले नागन से ही क्यों जुल्फ़ बनाया तुमने?

उनकी आंखों में मयखाना डाला तुमने
मेरी हाथों में क्यों जाम सजाया तुमने.?

फ़ूलों के रस से बनाये थे तुमने होठों को
फ़िर क्यों मीठा सा जहर उसमें मिलाया तुमने?

शीशे के दिल की जरुरत क्या थी ?
कितना कमजोर जिगर ईंसां बनाया तुमने.

अपनी ही शोहरत का रिश्वत लेकर,
लाखो आंखों से आंसु बहाया तुमने

तु भी पत्थर की तरह एक दिन मर जायेगा
आह टूटे हुए दिल की बता दिया हमने.

Tuesday, May 25, 2010

साजिश

रातों की तन्हाई से शिकवे है मुझे,
उजाले भी अब साजिश नजर आते है.

चांदनी जो अक्सर बादलों में छुपी होती है,
जब उसे देखता हूँ तो तारे मुस्कुराते है.

कहती थी खूब है दुनियां की हर सूरत ,
फ़िर क्यों इंसान यहाँ पत्थर बन जाते है.

कहते हैं लोग कि हर फूल बहुत प्यारा है,
दिलों पे फिर वो क्यों नस्तर चुभाते है .

चाहता था मैं भी कि खुश होके जिन्दा रहूँ,
गमों में मंजर मगर दिल को दुखाते है.

यों मार चुके है वो पहले भी कई बार मुझे ,
मगर हर बार मेरी मौत पे रोने को आते है .

Thursday, May 13, 2010

चाय भी पीता हूं किस्तों में.

इस कदर व्यस्त है जिन्दगी चाय भी पीता हूं किस्तों में.
काटकर अपने चंद टुकङों को बांट डाला है मैंने रिश्तों में.

बचपन में भी एक बचपन था जवानी में भी एक बचपन था .
छिपा रखा है मैंने लम्हों को वक्त कटता है उनकी गस्तों में.

जिसने पकङा था उंगलियां मेरी कबका छोङा है मेरे हाथों को
जो मिले थे कभी चौराहे पर भुला दिया है उनको रास्तों में.

महबूब के हाथों को पराठा खाकर पढता हूं अब नक्सली खबरें
मां के हाथों का मयस्सर ही नहीं रोटी जो मिलती थी नास्तों में.

मेरे घर की दीवारों से भी गंध आती है आजकल ईर्ष्या की.
मुस्कुराहट भी इतनी मैली है ईत्र मिलाता हूं अब गुलदस्तों मे.

रोने के लिये भी अब वक्त नहीं बचपन को खुदी ने मारा है.
कुछ न पाकर भी अरविंद खुश है मिल गया है वो फ़रिश्तों में.

इस कदर व्यस्त है जिन्दगी चाय भी पीता हुं किस्तों में.
काटकर अपने चंद टुकङों को बांट डाला है मैंने रिस्तों में.