Wednesday, October 19, 2011

कसौटी



पाप निकलता ही है.

पुण्य बचता ही है.

धर्म बहता ही है.

कर्म करता ही है.

गुण चमकता ही है.

बुराई छलकता ही है.

देखो कसता कसौटी पर

काल अटकता नहीं है.

Wednesday, October 12, 2011

मेरी कविता -2

सुबह ओंस की बूंदों से ,सबसे पहले मिलती है

सुनहली किरणों मे तो वह फ़ूलों सी खिलती है.

सूरज के संग आसमान में चढती है मेरी कविता

नये दिवस की नई कहानी गढती है मेरी कविता



रोज गगन में छू लेती है ऊंचाई की नयी बुलन्दी

जब भी होती है दोपहर में रोशनी से जुगलबन्दी

पूरी ताकत मेहनतकश में भरती है मेरी कविता

सूरज की गर्मीं से भी कब डरती है मेरी कविता.


न ही गिर जाने का दुख नहीं ढल जाने का गम

कर देती थकान वह पल भर में ही कितना कम

सांझ के अंधियारे में दीप सजाती है मेरी कविता

मुरझाये चेहरों पर संगीत बजाती है मेरी कविता.



Thursday, September 15, 2011

मेरी कविता.




शब्दों का ये जाल नहीं, मृदु-भाव मेरे हैं अंगूरी

रात की काली चादर पर दिखती है यह सिंदूरी.

अल्हङ सी नदिया के जैसी बहती है मेरी कविता.

फ़ूस के घर में रानी जैसी रहती है मेरी कविता.



पानी की रिम-झिम बूंदों से बात बहुत करती है

रहती है भूखे पेट भले , पर कभी नहीं मरती है

दिल के घर मन के बिस्तर सोती है मेरी कविता.

खुशियों के जोर ठहाकों में भी रोती है मेरी कविता.



सागर के खारे पानी में भी वह मय भर देती है

मरने वाले इंशानों को भी वह जिंदा कर देती है.

सन्नाटे में नाच - नाचकर गाती है मेरी कविता

टूटे दिल की गहराई तक जाती है मेरी कविता.

Monday, August 8, 2011

खुद



खुद ने खुदको किया पराजित

खुद ही खुद से हारा है.

खुद ने साथ दिया खुदको

खुद ने ही खुदको मारा है.



यह खुद की ही थी गर्जी

चलती रही खुद की मर्जी.

गैरों में होती ताकत तो

खुद क्यों खुद का सहारा है.

खुद ही खुद से हारा है.



खुद की एक बात बताता हूं.

यह सारा खेल खुदी का है.

मानो तो खुदा खुद में बैठा

वरना खुद खुद का कारा है.

खुद ही खुद से हारा है.



कई खुदों ने खुद से मिलकर

कहा साथ निवाहेंगे वे.

लेकिन फ़िर क्यों आज कब्र में

सिर्फ़ खुदी को गाङा है.

खुद ही खुद से हारा है.



क्रांतिदूत यह खुदा खूब है

जो खुद पत्थर की मूरत है.

मिला दिया जो सबको खुद में

सच्चे मजहब का नारा है.

खुद ही खुद से हारा है.

Thursday, July 28, 2011

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.

आंखों में उसकी दिखे सारा जग है.


मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.



नयनों में है उसकी गंगा की धारा

आंचल से देती वो जग को सहारा.

खुदा तो किसी को नहीं माफ़ करता

ममता की मूरत बहुत ही अलग है.

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.



गुरु मांगता शीष चरणों में अपने

पिता कहते पूरे करो मेरे सपने

पूजा मांगता नभ में बैठा विधाता

मां की जरुरत बहुत ही अलग है.

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.



वफ़ा करती है मेरी महबूब चंदा

रोटी के लिये है दुनियां में धंधा.

पल में रुलाना खुदा की है आदत

मैया की फ़ितरत बहुत ही अलग है.

मेरी मां की सूरत बहुत ही अलग है.

Thursday, July 21, 2011

तो मांगूं एक पत्ता भी.


मिले अगर कोई विशाल

तो मांगूं एक जर्रा भी.

हो घना यदि कोई दरख्त

तो मांगूं एक पत्ता भी.



दुख में भी जो साथ रहे

संग चलूं , मारूं ठहाका.

चुल्हा यदि जला दे तो

साथ क्यों न दूं हवा का.

दिखे कहीं भी शक्ति-पुंज

तो क्षमा-याचना मैं कर लूं.

निर्मल कर से स्पर्श करे

तो मानूं उसकी सत्ता भी.

हो घना यदि कोई दरख्त

तो मांगूं एक पत्ता भी.



देखूं लहराता भुजा वीर की

सहर्ष कटा लूं अपना सिर.

मिल जाये कोई सच्चा दिल

तो मानूं खुद को काफ़िर.

अग्नि-पथ पर साथ चले

तो संग चलूं जीवन भर मैं.

"क्रांतिदूत" पथ चलूं अकेला

भांङ में जाये जत्था भी.

हो घना यदि कोई दरख्त

तो मांगूं एक पत्ता भी.

Wednesday, July 13, 2011

यह इंसानों की बस्ती है.

सच नकाब में होता है , यहां नहीं नंगा कोई.

सबका दिल घायल घायल यहां नहीं चंगा कोई.

सच्चे प्यार - मोहब्बत पर नफ़रतों की गश्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.



बङे-बङे महलों के आगे सङकों पर बच्चे सोते हैं.

महलों में कितनी बेचैनी है ,वहां भी सारे रोते हैं.

रोटी बिकती मंहगी है पर बंदूकें काफ़ी सस्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.



सबके अपनें जात बने हैं सबका अपना मजहब है.

न कोई अपना कोई पराया , खुदी से ही मतलब है.

रुपयों में बिकता जिस्म है रुपयों से ही मस्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.



घर के दुधिया रौशन में अब चांद नहीं दिखता है.

मन के कारे बदरी में अब तो सूरज भी छिपता है.

नहीं जानता एक दिन सबकी डूबनेवाली किश्ती है.

यह इंसानों की बस्ती है यह इंसानों की बस्ती है.