Tuesday, September 14, 2010

मदर लेंग्वेज--व्यंग्य

डिपार्टमेंट के एच ओ डी का फ़ोन आया.."गुड मोर्निंग...आज से सभी वर्क मदर लेंग्वेज में करना है"---लगा जैसे साहब रोमन स्क्रिप्ट पढ रहे हों----"जी. एम साहब का ओर्डर है कि सारा काम आन लेंग्वेज में करना है.आजकल हिन्दी काफ़ी वीक चल रहा है". मैंने रिप्लाई किया.."यस सर...,हिन्दी वीक तो चल ही रहा है दिनों-दिन और भी वीकर होती जा रही है."---मैं अपनी स्मार्टनेस का प्रूफ़ दे रहा था लेकिन टाइम के प्रोबलेम के चलते साहब ने फ़ोन हेंग ओफ़ कर दिया.मैं सिरियसली सोचने लगा .अभी तो हिन्दी वीक से वीकर हुई है यदि सिचुएशन को कंट्रोल नहीं किया गया तो हिन्दी वीकर से वीकेस्ट हो जायेगी. एक बार यदि सुपरलेटिव डिग्री में पहुंच गयी तो कोई भी इस पूअर लेंग्वेज को रिस्पोंस नहीं देगा....सभी लोग ’द’ लगाकर छोङ देंगे.

नेक्स्ट डे डेली की तरह सनराइज होते ही विन्डो से लाइट आने लगी. जब से मेडम शेक अप नहीं देती सनलाइट ही मुझे जगाती है. फ़्रेश होकर ब्रेकफ़ास्ट और काफ़ी ले लिया. हिन्दी आखिर मदर लेंग्वेज है उसके वेलफ़ेयर के लिये सोचना हमारी ड्युटी है.क्वार्टर से सीटी की ओर निकल पङा. एक औटोवाले से पूछा--" सी. एम.डी कालेज का कितना लोगे..?.उसने अपना दाहिना हाथ उपर किया और सारे फ़िंगर्स फ़ैला दिये.आजकल ये लोग काफ़ी चिटिंग करते हैं.मैंने कहा..."फ़िंगर्स क्यों दिखा रहे हो ? मुंह से बोलो." वह अपने फ़िंगर्स को काउंट करने लगा---"वन, टू...फ़ाइव".मैंने कहा--"हिन्दी में नहीं कह सकते..?" उसने सीधा जवाब दिया---"ईशारा तो हिन्दी में ही किया था. लेकिन लोग तो हिन्दी का ईशारा समझते ही नहीं, इंगलिश से अफ़ेयर चला रहे हैं और हिन्दी के साथ एमोशनल अत्याचार कर रहे हैं. उसके फ़ीलिंग्स को हर्ट करते हैं जिससे उसका हार्ट पिसेज में ब्रेक अप हो जाता है. इस पूअर लेडी के लीवर को तो अंग्रेजों ने ही डैमेज कर दिया था. उपर से इमप्युरिटी को फ़िल्टर करने के चक्कर में किडनी भी चोक हो गयी है. रेस्ट तो पूरे वर्ल्ड के सामने विजिबुल है.."..उसके स्पीच ने मुझे स्पीचलेस कर दिया था. वह ड्राइवर कम स्कोलर था.हम सी. एम.डी कालेज पहुंच गये थे.

वहां पहुंचते ही वह ट्वेंटी फ़ाइव रुपये का डिमांड करने लगा. मैंने कहा--"तुमनें तो फ़ाइव रुपीज ही कहा था..?" उसने जवाब दिया--"आपने तो मेरा दूसरा हाथ देखा ही नहीं था. मैंने लेफ़्ट हेन्ड का मिडिल और फ़ोर फ़िंगर भी फ़ैलाया था. ".उसके रिप्लाइ से मेरा बी.पी हाइ हो गया--" तो...फ़ाइव प्लस टू सेवेन ही हुआ ना, मल्टिप्लाइ भी करोगे तो टेन हुआ". वह हंसते हुए बोला--" मैंने स्क्वायर किया था." मेरे साथ चीटिंग तो हो ही गयी थी. मैं बुदबुदाया---"ओफ़, करप्शन का रूट (मूल) कितना गहरा हो गया है" वह झट से बोला--"एक्चुअली साहेब अभी फ़्लाइ ओवर से नींचे आये न इसलिये रूट गहरा लग रहा है."
"शट अप..मैं करप्शन के रूट की बात कर रहा हूं....तुम्हारे रूट (रास्ता) की नहीं."
"मैं भी उसी रूट की बात कर रहा हूं साहेब. इंडिपेंडेस के बाद हम लोग लैंड को छोङकर फ़्लाइ ओवर पे उङने लगे थे. अंग्रेजों के सब कुछ चुराये लेकिन उसका दिया हुआ ओनेस्टी बेच दिया. अब तो कोई डिपार्टमेंट नहीं बचा है जहां यह रूट नहीं जाता. इस रूट से आप जहां कहेंगे पहुंचा दुंगा...ये रूट तो आजकल नेशनल हाइ वे बन चुका है."

वह सही कह रहा था. हम करप्शन के रूट (मूल) के बारे में बेकार सोच रहे हैं हमें उसके रूट (रास्ते) को ही बंद कर देना चाहिये. वह फ़िर शुरु हो गया--"बिल्कुल सही सोच रहे हैं आप. लेकिन नजरिया बदलने की जरुरत है. यदि मैं पांच के बदले पच्चीस ले रहा हूं तो आप पूछिये क्यों. मेरे पास जवाब है. उनके पास क्या जवाब है जो लाख रुपये वेतन पाते हैं और करोङो रुपये संदूक में भरकर रखते हैं.......दूसरी बात हिन्दी को..तो आजकल लोग हिन्दी के साथ बलात्कार कर रहे हैं और आप भी कम छिनाल नहीं हैं कहने को हिन्दी बोलते हैं पर बीच-बीच में अंग्रेजी ठूस देते है. हम गरीब क्या करें आपकी भाषा नहीं बोलेंगे तो आप जुबान नहीं काट लेंगे हमारी..?"..अब वह शुद्ध हिन्दी बोल रहा था.मैं आत्म-ग्लानि से भर गया था.मैंने भी सोच लिया कि अब शुद्ध हिन्दी में ही बातें करुंगा.

Monday, September 13, 2010

हिन्दी हम हिन्दी की भाषा

मत भूलें, हम हिन्दुस्तानी
हिन्दी हम हिन्दी की भाषा
इसके स्वर हों सारे जग में
हों पुर्ण हम सबकी आशा

मां के मुख से सुना है जिसको
कैसे भूल सकेंगे उसको..?
रची बसी जो अस्थि रक्त में
कैसे दूर करेंगे उसको..?
हर कण में हों इसकी प्रतिध्वनि
यही एक अपनी अभिलाषा
मत भूलें, हम हिन्दुस्तानी
हिन्दी हम हिन्दी की भाषा

कहता पर्वतराज हिमालय
सागर की लहरें कहती है.
बिन बदले अपने स्वर लय को
गंगा की धारा बहती है.
आओ हम भी आज करें प्रण
न बदलें अपनी लय भाषा.
मत भूलें, हम हिन्दुस्तानी
हिन्दी हम हिन्दी की भाषा

Tuesday, September 7, 2010

क्या सोचा था क्या ये लोकतंत्र हो गया !

सत्ता पाना ही भ्रष्टों का मूलमंत्र हो गया,
क्या सोचा था क्या ये लोकतंत्र हो गया !
परदे के पीछे से चल रहा आज छद्म-राज है,
कुर्सी पर बैठी कठपुतली एक यंत्र हो गया !!


युवराज यूं घूमता है अपने इस साम्राज्य में,
मानो यह प्रजातंत्र नहीं राजतंत्र हो गया !
चाटुकार लूटता खूब, उसके लिए तो यह देश,
नोट उत्पादन का एक खासा सयंत्र हो गया !!

Monday, September 6, 2010

आज चांदनी घर आयी है.

सपने भी न देख सका था,
भरकर पेट सोया ही कब था
खाकर घाव हमने कांटों से
जी भरकर रोया ही तब था.
उसे जो उपर बैठा प्रति पल
आज मेरी दुनियां भायी है
आज चांदनी घर आयी है.

पूनम की रौशन रातों में
हमने देखा था गुप्प अंधेरा
हर रात अमावस जैसी थी
उजङा था हम सब का बसेरा
आज हवा गुनगुना रही है
दर्द दिलों के शरमायी है
आज चांदनी घर आयी है.

बहुत दिनों के बाद आज
चावल के दाने घर आये
खुशियां सबके दिल में छायी
हंसे, चेहरे जो थे मुरझाये
मां की पथरीली आंखों में
गजब आज चमक छायी है.
आज चांदनी घर आयी है.

Friday, September 3, 2010

मेरी बिटिया सो रही है

आज सुलाकर चिर-निद्रा में
उसे गर्भ में दफ़न करेंगे.
मां का आंचल ही बेटी के
शव ढकने को कफ़न बनेंगे.
अपनी प्यारी माता को वह
डायन कहकर रो रही है.
मेरी बिटिया सो रही है

मां की गोद का पता नहीं
उसे यह दुनियां नहीं दिखेगी
नहीं बनेगी कभी वो बहना
उसकी डोली नहीं सजेगी.
उसको कुछ भी नहीं मिला है
फ़िर जानें क्या खो रही है.
मेरी बिटिया सो रही है

जा रही वह नील गगन में
कोस रही है अपने बाप को
कभी नहीं अब वह लौटेगी
जान गयी वह जग के पाप को
बहुत दूर है मेरी बिटिया
कितने दुख वह ढो रही है
मेरी बिटिया सो रही है

Wednesday, September 1, 2010

कृष्ण--क्यों जनम लेते हो तुम (व्यंग्य)

कृष्ण--क्यों जनम लेते हो तुम (व्यंग्य)

अब कौन सी देवकी इतना रिश्क लेकर तुम्हे जनम देगी ? जिस मां लक्ष्मी से तुम्हें जन्म के साथ ही एक्सचेंज किया गया था उसे भ्रुण में ही मार नहीं दिया गया होगा..?. अब तो गायों के चारे लोग खुलकर खाने लगे हैं. क्या खिलाओगे अपनी गैया को ? राधा जैसी हजारो गोपियों के साथ जात और उम्र की परवाह किये बगैर इश्क करने पर चौराहे पर टांगकर जिंदा नहीं जला दिये जाओगे?. आज की औरतें जो फ़िगर के लिये अपने बच्चों को भी अपना दूध नहीं पिलाती , मक्खन चोरी करने पर तुम्हारा फ़िगर नहीं बिगार देंगी....? उपर से मक्खन आइ एस ओ सर्टिफ़ाइड तो होगा नहीं.मिलावट भी हो सकती है...यदि जहरीला निकला तो...? सुदामा जैसे जो छोकङा लोग तुम्हारे साथ गायें चराया करते थे..आज के डेट में चाइल्ड लेबर बने हुए हैं, जो अच्छे घर के थे ईंगलिश स्कूल में पढ रहे हैं. किसके साथ खेलोगे..? तुम्हीं बताओ तुम्हारा एडुकेशन कैसे होगा..? तुम्हारे पापा बसुदेव के पास कोई खजाना तो है नहीं कि लाखो रुपये डोनेशन दे देन्गे..रही बात नन्दराज की तो सुन लो आजकल पूरे भारत में राजा कंस की चलती है.

अब तुम यमुना में नहा भी नहीं सकते. दिल्ली की सङकों का हाल ऐसा है कि द्वारका से यमुना तक जाने में ही दिन से रात हो जायेगी.....पता भी नहीं चलेगा कि यमुना किधर है और गड्ढा किधर..यदि मेट्रो बगैरह से पहुंच भी गये तो काले तो पहले से हो पीले होकर निकलोगे. दिल्ली की पब्लिक ने यमुना का वो हाल कर दिया है. कलर तो मोडिफ़ाइ हो जायेगा लेकिन इतने गंदे हो जाओगे कि मां यशोदा भी गोद नहीं लेगी. आखिर कहां कहां हगीज पहनायेगी.?

रही बात राधा की...तो सुनो आजकल के कै साधु-संत और तुम्हारे भक्त राधाओं के चक्कर में कानुनी धाराओं के साथ बह गये. स्वामी सत्यानन्दवाली हाल हो जायेगी.आखिर जन्म लेने का कुछ परपस तो होगा ? महाभारत करोगे..? कोमनवेल्थ से बढकर कोई महाभारत क्या होगा..? आज्कल अर्जुन भी इतना बीजी रहता है कि टाईम नहीं देगा.युधिष्ठिर सट्टेबाजी में लगा रहता है और भीम को होटलबाजी से फ़ूर्सत नहीं मिलता. बचा नकुल और सहदेव तो इन्हें आज के जमाने में खेल संघों के अधिकारी ग्राउन्ड तक पहुंचने भी नहीं देते.. किसको सुनाओगे अपनी गीता..? तुम्हारी गीता अब कौन सुनता है. अब तो वह अदालतों में लेटी रहती है जिस पर जब जी चाहे दुर्योधन अपनी हाथ फ़ेर आता है.

इसलिये मैं दिल से कह रहा हूं...बेकार जन्म ले रहे हो. इसबार जेल में ही पैदा
होओगे और उसी में सङते रहोगे.....तुम्हें कभी जमानत नहीं मिलेगी. कानून चोरों और छिनालों के प्रति काफ़ी सख्त हो गयी है.यहां गद्दारों, डकैतों और बलात्कारियों को ही जमानत दी जाती है. मैं मानता हूं कि तुम छिनाल नहीण हो लेकिन जहां लङकियों को देखकर सीटी बजाना अपराध है वहां पांवों से ट्रेंगिल बनाकर बांसुरी बजाओगे तो जूते पङेंगे.उपर से बदनामी अलग.

सारी बातें सोच लो. अबकी बार हर आदमी में तुम्हें कंस नजर आयेगा.पर्पस डेफ़ाईन कर लो और किसी अच्छे होस्पीटल मे जन्म लो.मक्खन के बदले..आइस-क्रीम खाओ. पिक्चर-विक्चर देखो और लाइफ़ को एन्जोय करो.......अब किसी धर्म की ग्लानि नहीं होती, धर्म तो कब का मर चुका है.

Monday, August 30, 2010

चांद बहुत भूखा लगता है

आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

आज फ़ूस की छत से छनकर
काला धुआं नहीं निकला है.
आज नहीं है चमकी आंखें
घर का चुल्हा नहीं जला है.
वे लेट गये हैं पानी पीकर
फ़िर क्यों चेहरा सूखा लगता है.
आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.

उसकी मां भी गले लगाकर
आज बहुत रोयी होगी.
आज भी गायी होगी लोरी
पर वह नहीं सोयी होगी.
घने बादल, शीतल पुरवाई
क्यों इतना रूखा लगता है
आज है खाली नभ का आंगन
चांद बहुत भूखा लगता है.