कार्यालये च विद्यालये
न्यायालये च रक्षालये
विधानालये च वाचनालये
गृहालये च फ़िल्मालये
चिकित्सालये च शौचालये
मस्जिदे च मठालये
यत्रम-तत्रम उपस्थितम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
उद्योगे च व्यवसाये
पर्यावरणे च भाषाये
निर्माणे च ठेकालये
दुग्धालये च विषालये
खेलम-कूदम और क्रिकेटम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
कार्यालये अंग्रेजम पुत्रम
विद्यालये मैकाले वत्सम
न्यायालये न्यायधीषम भ्रष्टम
रक्षालये भौं-भौं श्वानम
किंचित स्थानम कुतौ न रिक्तम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
विधानालये दो बापम पुत्रम
वाचनालये नित्यानन्दम
गृह मंत्राले सत्चित अम्बरम
फ़िल्मालये दाउद सम्पर्कम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
चिकित्सालये किडनी चोरम
शौचालये ठेकेदारम
मस्जिदे जेहादम षङयंत्रम
मठालये ब्राह्मण पाखंडम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
निर्माणे पुलम पतितम
ठेकालये बन्दूकम नोकम
दुग्धालये केमिकल मिलावटम
विषालये अवैध शराबम
खेलम-कूदम संघम प्रमुखम
क्रिकेटम मोदी मोदकम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
उद्योगे टेक्सम चोरम
च व्यवसाये जमाखोरम
पर्यावरणे मुद्रा धुर्तम
भाषा क्षेत्रम मीडिया मित्रम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
पशु भोजनम च बोफ़ोर्सम
ताबुतम च शेयर मार्केटम
स्टम्प पेपरम च सैनिक दालम
किंचित अल्पम किंचित दीर्घम
भ्रष्टाचारम सर्वत्रम.
राष्ट्राध्यक्षं प्रतिभा मातरम
मंत्री प्रमुखः मनमोहनम
सर्वत्रम, कथय न कुत्रम?
क्रांतिदूतम प्रश्नम किंचित उत्तरम?
वन्दे मातरम वन्दे मातरम.
(मित्रों मैं संस्कृत नहीं जानता,फ़िर भी कविता लिखने का प्रयास किया है,आशा है भाषा पर ध्यान न देकर भावार्थ पर जायेंगे.)
Tuesday, May 11, 2010
Sunday, May 9, 2010
जख्म
"लो पहले इससे अपना बदन ढक लो" कहते हुए ठाकुर ने उसके फ़टे हुए कपङे से निकल आये अंगों पर एक तौलिया डाल दिया.फ़िर उसके एक गाल पर अपना हाथ रखकर अपनी ऊंगलियों से उसके आंसू पोछते हुए कहा-"जानवर था वह जो इतनी प्यारी कोमल बच्ची के साथ बलात्कार किया, छी......,लेकिन ठाकुर की हवेली में तुम सुरक्षित हो." वह सोच रही थी कि कुछ लोग ठाकुर की तरह अच्छे भी होते हैं.वह ठाकुर के साथ उसकी हवेली में सचमुच सुरक्षित महसुस कर रही थी.तभी ठाकुर के दो-तीन दोस्त आ गये.कुछ देर के बाद ठाकुर के कक्ष से वह निर्वस्त्र होकर कराहते हुए बाहर निकली.बाहर के बगीचे में एक जख्मी बिल्ली के उपर कई सारे गिद्ध झपट्टे मार रहे थे.वह भी अपने स्वर में चिल्ला रही थी.आवाजें अलग-अलग पर जख्म एक सा था और दर्द भी.
Sunday, May 2, 2010
चुंबन
शीतल वायु के
मंद वेग का
झूठा सहारा लेकर
टूटे पत्ते का
विशाल पुष्प के
कामुक वक्षों से
सटकर चिपक जाना,
फ़िर
कोमल पंखुङियों को हटाकर
कठोर अग्र-भाग से
स्वर्णिम पुष्प-केन्द्रक का
अमृतमयी स्पर्श.
मंद वेग का
झूठा सहारा लेकर
टूटे पत्ते का
विशाल पुष्प के
कामुक वक्षों से
सटकर चिपक जाना,
फ़िर
कोमल पंखुङियों को हटाकर
कठोर अग्र-भाग से
स्वर्णिम पुष्प-केन्द्रक का
अमृतमयी स्पर्श.
Sunday, April 25, 2010
जंगल में नक्सलवाद
जंगल में नक्सलवाद की समस्या से शेर चिंतित था.नक्सलवादी सांपों ने सत्ता के विरुद्ध बिगुल फ़ूंक दिया था.वस्तु-स्थिति से अवगत होने के लिये गृह-मंत्री हाथी को बुलाया गया.हाथी ने कहा-" महोदय, ये सांप विकास के विरोधी हैं.ये सत्ता पर अधिकार करना चाहते हैं.निर्दोष जानवरों को जान से मार देते हैं......ये पशुतंत्र विरोधी हैं.जंगल के लगभग एक चौथाई हिस्से इनके प्रभाव में हैं".कुछ देर शांत रहकर फ़िर कहने लगा-"महाराज इनसे निपटने का अब एक ही रास्ता बचा है.इन्हें पांव से कुचल दिया जाये". तभी विपक्ष में बैठा एक जानवर बोलने लगा- "महोदय,इन विषैले सापों ने आज तक कई निर्दोष जानवरों को डसा है.हाल ही में रक्षा-दल के जानवरों को सामुहिक रूप से मार डाला था.ये सम्पत्ति को भी नुकसान पहुंचाते है........इनके विरुद्ध आपने आज तक क्या किया ? ".
तभी विपक्ष कि नेता ने अपना भाषण पेश किया-"महाराज, गृह-मंत्री हाथी महोदय आपकी तरह एक कुशल अर्थ-शास्त्री हैं.इन्हे जंगल में सिर्फ़ वित्त ही दिखाई देता है.मैं सलाह देता हूं थोङा बहुत समाजशास्त्र का भी मंत्री महोदय अध्ययन कर लें.विद्रोह का मूल्यांकन और समाधान मात्र अर्थ से ही नहीं होता.वित्त-मंत्री के रुप में हाथी महोदय ने जंगल को कमर-तोङ मंहगाई दी और जब से वित्त विभाग छोङकर गृह-मंत्री का पद-भार लिया है तब से नक्सलवाद को बढावा दे रहे हैं.."शेर कहने लगा-"विपक्ष रचनात्मक भुमिका निवाहे.हाथी महोदय निर्दोष हैं.".विपक्ष ने पलटवार किया-"क्या जंगल का आर्थिक उदारीकरण सिर्फ़ आपने अकेले किया था?जब इसका पूरा श्रेय आपको जाता है तो नक्सलवाद का आरोप भी सत्ता-दल को स्वीकार करना चाहिये.गृह-मंत्री हाथी महोदय आपने उत्तरदायित्व को स्वीकार कर अपने पद से इस्तीफ़ा दें."पूरा विपक्ष हाथी से इस्तीफ़े की मांग करने लगे.हाथी भी ताव में आकर त्यागपत्र दे दिया लेकिन शेर ने यह कहते हुए उसे अस्वीकर कर दिया कि इन विषैले सांपों को कुचलने के लिये हाथी के वजन्दार पांव से बेहतर हो ही क्या सकता है.
शेर अपनी मांद में बैठा था.सलाहकार भालू से बात चल रही थी.शेर-"नक्सलवाद का मूल कारण क्या है?" .भालू- "महोदय,मूल तो भूमिगत होता है.तना और शाखायें काफ़ी विशाल हैं."शेर-"मुझे दर्शन-शास्त्र मत समझाओ." भालू-"महोदय, अधिकतर सांपों में तो जहर भी नहीं है.कुछ सांप जहरीले हैं लेकिन यह उनकी रक्षात्मक शक्ति है.जबकिकुछ अन्य जानवर सपेरे उन्हें दूध पिलाते हैं.यह सच है कि इन सांपों का शोषण हुआ है.रक्षा-दल के कुत्ते और अदालत चलानेवाली बिल्ली ने कभी भी इनके साथ न्याय नहीं किया.इनके मणि को इनसे छीन लिया गया और जिस जमीन पर ये वास करते थे....से बेदखल कर अन्य जानवरों के लिये महल बनाये गये."शेर-"यदि ऐसी बात है तो ये बोलते क्यों नहीं?".भालू-"महोदय, जिसके पेट में राशन होता हओ वही भाषण देता है,जिसके पेट में आग लगी होती है वह सिर्फ़ आग लगा सकता है" शेर-"चुप रहो, मुझे तुम्हारे विचार भी नक्सली लगते हैं.अब कैसे भी इन सांपों को तो मारना ही होगा."भालू-"महाराज, मेरे पास एक हथियार है जिससे इस नक्सलवाद से निजात पाया जा सकता है.कल पशु-सभा में मैं वह हथियार आपको सौंप दुंगा."
पशु-सभा में उपस्थित सभी जानवरों के बीच भालू बोलने लगा-"महोदय, मेरे हाथ में जो लाठी है इससे नक्सलवाद को खत्म किया जा सकता है.(सभी जानवर हंसनें लगे).हंसिये मत. यह कोई मामुली लाठी नहीं है.अहिंसा की लकङी से बने इस लाठी को सत्य का तेल पिलाया गया है.एक महात्मा ने इसी लाठी के बल पर जंगल को दो सौ साल की गुलामी से आजाद किया था.हुजूर इस लाठी को देखते ही अपराध और अन्याय रफ़ू-चक्कर हो जाता है और विषैले सांपों को तो मानो सांप सूंघ जाता है.इसके सामने बङे से बङा तोप भी काम करना बंद कर देता है.और...सबसे बङी खाशियत तो यह है कि इस लाठी को भांजने की जरुरत नहीं होती.उस महात्मा ने अपने हाथ में यह लाठी लेकर जिन तीन बंदरों को सैनिक बनाया था वह तो मात्र बैठकर अपना मूंह, आंख और कान बंद कर लिये थे.......महोदय इतिहास से साक्ष्य लेकर एक बार फ़िर इस लाठी पर विश्वास कीजिये न सिर्फ़ नक्सल्वाद बल्कि भ्रष्टाचार,मंहगाई आदि सभी समस्यायें इससे दूर हो जायेंगी.".
तभी विपक्ष कि नेता ने अपना भाषण पेश किया-"महाराज, गृह-मंत्री हाथी महोदय आपकी तरह एक कुशल अर्थ-शास्त्री हैं.इन्हे जंगल में सिर्फ़ वित्त ही दिखाई देता है.मैं सलाह देता हूं थोङा बहुत समाजशास्त्र का भी मंत्री महोदय अध्ययन कर लें.विद्रोह का मूल्यांकन और समाधान मात्र अर्थ से ही नहीं होता.वित्त-मंत्री के रुप में हाथी महोदय ने जंगल को कमर-तोङ मंहगाई दी और जब से वित्त विभाग छोङकर गृह-मंत्री का पद-भार लिया है तब से नक्सलवाद को बढावा दे रहे हैं.."शेर कहने लगा-"विपक्ष रचनात्मक भुमिका निवाहे.हाथी महोदय निर्दोष हैं.".विपक्ष ने पलटवार किया-"क्या जंगल का आर्थिक उदारीकरण सिर्फ़ आपने अकेले किया था?जब इसका पूरा श्रेय आपको जाता है तो नक्सलवाद का आरोप भी सत्ता-दल को स्वीकार करना चाहिये.गृह-मंत्री हाथी महोदय आपने उत्तरदायित्व को स्वीकार कर अपने पद से इस्तीफ़ा दें."पूरा विपक्ष हाथी से इस्तीफ़े की मांग करने लगे.हाथी भी ताव में आकर त्यागपत्र दे दिया लेकिन शेर ने यह कहते हुए उसे अस्वीकर कर दिया कि इन विषैले सांपों को कुचलने के लिये हाथी के वजन्दार पांव से बेहतर हो ही क्या सकता है.
शेर अपनी मांद में बैठा था.सलाहकार भालू से बात चल रही थी.शेर-"नक्सलवाद का मूल कारण क्या है?" .भालू- "महोदय,मूल तो भूमिगत होता है.तना और शाखायें काफ़ी विशाल हैं."शेर-"मुझे दर्शन-शास्त्र मत समझाओ." भालू-"महोदय, अधिकतर सांपों में तो जहर भी नहीं है.कुछ सांप जहरीले हैं लेकिन यह उनकी रक्षात्मक शक्ति है.जबकिकुछ अन्य जानवर सपेरे उन्हें दूध पिलाते हैं.यह सच है कि इन सांपों का शोषण हुआ है.रक्षा-दल के कुत्ते और अदालत चलानेवाली बिल्ली ने कभी भी इनके साथ न्याय नहीं किया.इनके मणि को इनसे छीन लिया गया और जिस जमीन पर ये वास करते थे....से बेदखल कर अन्य जानवरों के लिये महल बनाये गये."शेर-"यदि ऐसी बात है तो ये बोलते क्यों नहीं?".भालू-"महोदय, जिसके पेट में राशन होता हओ वही भाषण देता है,जिसके पेट में आग लगी होती है वह सिर्फ़ आग लगा सकता है" शेर-"चुप रहो, मुझे तुम्हारे विचार भी नक्सली लगते हैं.अब कैसे भी इन सांपों को तो मारना ही होगा."भालू-"महाराज, मेरे पास एक हथियार है जिससे इस नक्सलवाद से निजात पाया जा सकता है.कल पशु-सभा में मैं वह हथियार आपको सौंप दुंगा."
पशु-सभा में उपस्थित सभी जानवरों के बीच भालू बोलने लगा-"महोदय, मेरे हाथ में जो लाठी है इससे नक्सलवाद को खत्म किया जा सकता है.(सभी जानवर हंसनें लगे).हंसिये मत. यह कोई मामुली लाठी नहीं है.अहिंसा की लकङी से बने इस लाठी को सत्य का तेल पिलाया गया है.एक महात्मा ने इसी लाठी के बल पर जंगल को दो सौ साल की गुलामी से आजाद किया था.हुजूर इस लाठी को देखते ही अपराध और अन्याय रफ़ू-चक्कर हो जाता है और विषैले सांपों को तो मानो सांप सूंघ जाता है.इसके सामने बङे से बङा तोप भी काम करना बंद कर देता है.और...सबसे बङी खाशियत तो यह है कि इस लाठी को भांजने की जरुरत नहीं होती.उस महात्मा ने अपने हाथ में यह लाठी लेकर जिन तीन बंदरों को सैनिक बनाया था वह तो मात्र बैठकर अपना मूंह, आंख और कान बंद कर लिये थे.......महोदय इतिहास से साक्ष्य लेकर एक बार फ़िर इस लाठी पर विश्वास कीजिये न सिर्फ़ नक्सल्वाद बल्कि भ्रष्टाचार,मंहगाई आदि सभी समस्यायें इससे दूर हो जायेंगी.".
Wednesday, April 21, 2010
पूरी मधुशाला पी लो तुम.
("अब नहीं चाहिये मधुशाला" पर प्रेमिका की रचना.)
मैं तो हूं एक निर्मल धारा
कैसे पिलाऊं मदिरा की प्याला.
पता नहीं मेरा यह यौवन
तुमको क्यों लगता मधुशाला.
निर्दोष हूं मैं,हूं अल्हङ सी
बस चाहूं तेरी प्यास बुझा दूं.
मैं समेट यौवन की धारा
बन जाऊं एक छोटी प्याला.
एक प्याले में पूरी मधुशाला
मैं चाहूं कि तुझे पिला दूं.
पूरी मधुशाला एक प्याले में
लेकर क्या तुम पी सकते हो ?
एक प्याले से प्यास बुझाकर
क्या तुम जीवन जी सकते हो ?
है प्रकृर्ति का यह अमृत रस
अर्पित है लो पी लो तुम,
मरकर भी अब जी लो तुम.
मैं तो हूं एक निर्मल धारा
कैसे पिलाऊं मदिरा की प्याला.
पता नहीं मेरा यह यौवन
तुमको क्यों लगता मधुशाला.
निर्दोष हूं मैं,हूं अल्हङ सी
बस चाहूं तेरी प्यास बुझा दूं.
मैं समेट यौवन की धारा
बन जाऊं एक छोटी प्याला.
एक प्याले में पूरी मधुशाला
मैं चाहूं कि तुझे पिला दूं.
पूरी मधुशाला एक प्याले में
लेकर क्या तुम पी सकते हो ?
एक प्याले से प्यास बुझाकर
क्या तुम जीवन जी सकते हो ?
है प्रकृर्ति का यह अमृत रस
अर्पित है लो पी लो तुम,
मरकर भी अब जी लो तुम.
Monday, April 19, 2010
अब नहीं चाहिये मधुशाला
अब नहीं चाहिये मधुशाला
तुम दे दो हमको एक प्याला.
मैं मृग भटका जीवन भर
गर्मी की सूखी रेतों पर.
सपनों का संसार लिये
आजतलक हूं मैं प्यासा.
तुम दे दो हमको एक प्याला
नहीं चाहिये संसार तेरा
एक प्रेम-दृष्टि ही काफ़ी है.
मैं प्रेम का सागर क्यों चाहूं
जब एक बूंद है जग-आला.
तुम दे दो हमको एक प्याला
सपने भी थे, कुछ अर्थ भी थे.
मैं स्वयं ही एक मधुशाला था.
सभी पी गये सारे मय
दे गये मुझे खाली प्याला.
तुम दे दो हमको एक प्याला
थक गया बहुत जीवन पथ पर
निस्तेज हुआ, निष्प्राण बना.
तुम मदिरा बनकर आ जाओ,
मैं आतुर हूं, हूं मैं ब्यौला
तुम दे दो हमको एक प्याला.
अब नहीं चाहिये मधुशाला.
तुम दे दो हमको एक प्याला.
मैं मृग भटका जीवन भर
गर्मी की सूखी रेतों पर.
सपनों का संसार लिये
आजतलक हूं मैं प्यासा.
तुम दे दो हमको एक प्याला
नहीं चाहिये संसार तेरा
एक प्रेम-दृष्टि ही काफ़ी है.
मैं प्रेम का सागर क्यों चाहूं
जब एक बूंद है जग-आला.
तुम दे दो हमको एक प्याला
सपने भी थे, कुछ अर्थ भी थे.
मैं स्वयं ही एक मधुशाला था.
सभी पी गये सारे मय
दे गये मुझे खाली प्याला.
तुम दे दो हमको एक प्याला
थक गया बहुत जीवन पथ पर
निस्तेज हुआ, निष्प्राण बना.
तुम मदिरा बनकर आ जाओ,
मैं आतुर हूं, हूं मैं ब्यौला
तुम दे दो हमको एक प्याला.
अब नहीं चाहिये मधुशाला.
Friday, April 16, 2010
जंगल में चमचा-राज
जंगल का राजा शेर ही होता है लेकिन शेर के लिये भी वेश-बदलकर राज करना संभव नहीं होता.उसने अपना वेश बदल तो लिया पर राज-काज चालु नहीं रख पाया.अग्यातवास में रहकर राज-काज की जानकारी लेते रहना...उसे उचित लगा.
कुछ दिनों के बाद अचानक एक बूढा शेर सत्ता की कुर्सी पर आसीन हुआ.उसने स्वयं को पुर्व के राजा शेर का उत्तराधिकारी बताया.अपने दो प्रमुख चमचों भेङिया और सांप को सबसे महत्वपुर्ण मंत्रालय की चाबी थमा दिया. जब पशु-संसाधन और गृह मंत्रालय जैसे विभाग भेङिये को और रक्षा मंत्रालय का प्रभार सांप को सौंप दिया जाये तो..........जिसके एक डंक से बङे से बङे जानवर स्वर्गलोक सिधार जाते....वह रक्षा क्या करता. गीदङ भी पशु-संसाधन का उपयोग अपनी सेवा में करता रहा.दोनों चमचों की चांदी हो गयी.जंगल के सभी जानवर परेशान रहने लगे.रोज ही वह सांप किसी न किसी को डसता और भेङिया सभी जानवरों का चारा चट कर जाता.
तभी एक दिन एक तोता अग्यातवास में रह रहे शेर के पास गया और कहने लगा-"हुजूर, सभी जानवर भेङिया और सांप को दोषी मान रहे हैं लेकिन मुझे लगता है महाराज शेर ही असली गुनाहगार हैं". शेर ने पुछा- " कैसे....?".तोता ने कहा-"हुजूर उनमें राजा के लक्षण नहीं दिखते,न ही उनके चेहरे में तेज है, न ही शेर वाली गुर्राहट और न ही वीरता के कोई चिह्न.
अगले ही दिन अग्यातवासी शेर ने अपना प्रतिनिधि हाथी को राजा शेर के मांद में भेजा. मांद में थोङी सी रोशनी थी. राजा शेर मरा हुआ मांस खा रहा था.....आश्चर्य की बात थी.हाथी ने जैसे ही उसको पकङकर खींचा,उसकी खाल बाहर आ गयी.वह शेर की खाल में नकली मूंछ लगाये गीदङ निकला.उसका मुंह काला कर उसकी मरम्मत की गयी.चुपचाप सारी जानकारी असली शेर के पास पहुंचा दी गयी.
इधर जंगल के अन्य पशुओं को इस बात की भनक लग गयी कि शेर के खाल में गीदङ राज चला रहा है.अगले दिन सभी जानवर राज-भवन में एकत्रित होकर राजा का विरोध करने लगे. तभी शेर अपनी कुर्सी पर आराम से बैथकर जोरदार ढंग से गुर्राया.वह असली शेर था.फ़िर मुस्कुराते हुए हाथी के कान में कहा-"शेर की खाल पहनकर कोई शेर नहीं हो जाता.शेर मरा हुआ मांस नहीं खाता.जंगल में भी प्रजातंत्र होने के कारण राजनीति उसकी मजबूरी है लेकिन चमचागिरी उसे कतई पसंद नही."
कुछ दिनों के बाद अचानक एक बूढा शेर सत्ता की कुर्सी पर आसीन हुआ.उसने स्वयं को पुर्व के राजा शेर का उत्तराधिकारी बताया.अपने दो प्रमुख चमचों भेङिया और सांप को सबसे महत्वपुर्ण मंत्रालय की चाबी थमा दिया. जब पशु-संसाधन और गृह मंत्रालय जैसे विभाग भेङिये को और रक्षा मंत्रालय का प्रभार सांप को सौंप दिया जाये तो..........जिसके एक डंक से बङे से बङे जानवर स्वर्गलोक सिधार जाते....वह रक्षा क्या करता. गीदङ भी पशु-संसाधन का उपयोग अपनी सेवा में करता रहा.दोनों चमचों की चांदी हो गयी.जंगल के सभी जानवर परेशान रहने लगे.रोज ही वह सांप किसी न किसी को डसता और भेङिया सभी जानवरों का चारा चट कर जाता.
तभी एक दिन एक तोता अग्यातवास में रह रहे शेर के पास गया और कहने लगा-"हुजूर, सभी जानवर भेङिया और सांप को दोषी मान रहे हैं लेकिन मुझे लगता है महाराज शेर ही असली गुनाहगार हैं". शेर ने पुछा- " कैसे....?".तोता ने कहा-"हुजूर उनमें राजा के लक्षण नहीं दिखते,न ही उनके चेहरे में तेज है, न ही शेर वाली गुर्राहट और न ही वीरता के कोई चिह्न.
अगले ही दिन अग्यातवासी शेर ने अपना प्रतिनिधि हाथी को राजा शेर के मांद में भेजा. मांद में थोङी सी रोशनी थी. राजा शेर मरा हुआ मांस खा रहा था.....आश्चर्य की बात थी.हाथी ने जैसे ही उसको पकङकर खींचा,उसकी खाल बाहर आ गयी.वह शेर की खाल में नकली मूंछ लगाये गीदङ निकला.उसका मुंह काला कर उसकी मरम्मत की गयी.चुपचाप सारी जानकारी असली शेर के पास पहुंचा दी गयी.
इधर जंगल के अन्य पशुओं को इस बात की भनक लग गयी कि शेर के खाल में गीदङ राज चला रहा है.अगले दिन सभी जानवर राज-भवन में एकत्रित होकर राजा का विरोध करने लगे. तभी शेर अपनी कुर्सी पर आराम से बैथकर जोरदार ढंग से गुर्राया.वह असली शेर था.फ़िर मुस्कुराते हुए हाथी के कान में कहा-"शेर की खाल पहनकर कोई शेर नहीं हो जाता.शेर मरा हुआ मांस नहीं खाता.जंगल में भी प्रजातंत्र होने के कारण राजनीति उसकी मजबूरी है लेकिन चमचागिरी उसे कतई पसंद नही."
