Wednesday, April 14, 2010

क्रांतिदूत

सूरज की भीषण गर्मी खाकर
बंजर खेतों को खोद-खोद
अपने शोणित से सींच-सींच
जो रोटी पैदा करता है.
वह क्रांतिदूत कहलाता है.

लङता है जो तूफ़ानों से
तनिक नहीं घबराता है.
दिशा बदल देता है उसकी
मंद-मंद मुस्काता है.
वह क्रांतिदूत कहलाता है.

सपनों की तलवार लिये
निज स्वारथ से जो लङता है.
पाषाणों की छाती चढकर
पीयुष दुग्ध जो पीता है.
वह क्रांतिदूत कहलाता है.

Monday, April 12, 2010

जंगल का राजा

शेर भले ही जंगल का राजा था लेकिन उसकी मुश्किलें भी कम नहीं थी.राजा भले ही कोई बने ,प्रजातंत्र में चलती तो प्रजा की ही है...और जब प्रजा जानवर हो तो राजा को पङेशानी तो होगी ही.शेर पङेशान था.विपक्ष में बैठे जानवरों के वार को सहते-सहते थक गया था। पशुमत शेर के पक्ष में लेकिन कुटिलता विपक्ष की ओर,सद्भावना शेर के पक्ष में लेकिन धुर्तता विरोधी खेमें में.....शेर करे तो क्या करे...?.यही हाल विपक्ष का भी.शेर के शरीर का तो खून ही राजसी था.विपक्ष को कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था.तलवार से मुकाबला करो तो भी शेर आगे, षङयंत्र करो तो भी शेर विजयी, विद्वता में भी शेर किसी से कम न था.....आखिर शेर को हरायें कैसे? अंत में विपक्ष ने शेर की कमजोरी पकङ ही ली।

एक लोमङी ने विपक्ष के नेता से कहा "महोदय, शेर दिलदार है, महान है, स्वाभिमानी है, उदार है..........".नेता ने टोका -"मेरे शत्रु की प्रशंसा कर रही हो?" लोमङी ने जबाब दिया"-नहीं हुजूर.....मैं शेर की कमजोरी बता रही हूं.उसके स्वाभिमान पर चोट करो. वह अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये दरियादिली दिखायेगा और महान कहलाने के लिये उदारतापूर्वक गद्दी छोङ देगा.".विपक्ष के नेता ने ऐसा ही किया.शेर ने गद्दी छोङ दिया.यह खबर जंगल में लगे आग की तरह फ़ैल गयी।

जैसे ही यह समाचार हाथी को मिला वह चिंतित हो गया.वह शेर के मांद तक पहुंचा.लेकिन शेर जो ठान ले उसे करने से कौन रोक सकता है?.शेर के पास भी तेज दिमाग था,वह पानी के टंकी पर चढ गया,यह सोचकर की हाथी वहां नहीं चढ पायेगा. हाथी भी आखिर हाथी था उसने अपनी ऊंचाई का फ़ायदा उठाकर शेर को नीचे उतारा.समझाया-"राज नही करना है तो मत कर.आराम कर. मस्ती से देख,राज तो चलेगा ही।

शेर आराम करे और राज चलता हुआ देखे, यह कैसे हो सकता है?.......और शेर को छोङकर क्या लोमङी राज चलायेगी ? अंत में शेर ने अपनी खाल बदल ली.वेश- भूषा भी पूरी तरह बदल डाला,बिना किसी को बताये. वह नये रुप में फ़िर से राज करने लगा.कुर्सी पर बैठते ही उसने धीरे से अपने मंत्री को कहा"लोमङी कितना भी चालाक हो जाये जंगल का राजा शेर ही होता है

Sunday, April 11, 2010

पंक को निर्मल करो रे.

सदियों से जो दलित बनकर
पैर को तेरे पखारा
तेरी जय में भी पराजित
तेरी हारों में भी हारा
आज उसके पग धरो रे
पंक को निर्मल करो रे.

फ़ूलों की भेंट हुई पुरी
नीरजों की हो चुकी पूजा.
अशक्त हैं कुछ अस्थियां
उन तन्तुओं में बल भरो रे
पंक को निर्मल करो रे.

भर चुके आंखों की प्याली
सुख दुखों के ही अमिय से
कुछ कटोरे रिक्त हैं जो
उनमे भी तुम जल भरो रे
पंक को निर्मल करो रे.

हुई अर्चना मां लक्ष्मी की
सरस्वती की वंदना भी
बिक रही बाजार बनकर
शीष उनपे नत करो रे
पंक को निर्मल करो रे.

Thursday, April 8, 2010

मशाल.

इरादे नेक थे,
हौसले बुलंद थे,
दुनियां को रौशन करने की तमन्ना थी.
मशाल जला दिये गये।

वही मशाल फ़िर जालिमों के हाथ लगा.
स्वार्थ और लोभ
जैसे तेल डालकर
उसकी ज्वाला को भङकाया गया.
उसकी ही लपटों से
जलाये गये गरीबों के घर.
दाग दिये गये
बेगुनाहों की छातियां।

वही मशाल
अब भावनाओं को भङकाती है
अरमानों को सुलाती है.
उसकारंग-रुप बदल चुका है.
अब वह दोधारी खतरनाक हथियार है,
जिसे मशाल कहकर
घुमाया जा रहा है लगातर
समाज के उपर।

अब वह मशाल
राक्षसों के हाथ है,
जो आतंक को जेहाद कहता है.
ईंसान के लहू बहाकर
उसे चैन मिलती है.
घर जलाकर वह राहत लेता है
यही इतिहास है
जलाये गये मशालों के.
मशाल जलानेवाले सावधान
यह जालिमों के हाथ न लगे.

Wednesday, April 7, 2010

तुम्हारी याद तो आयी....

जब भी
किसी खूबसूरत नव-यौवना के
ढके हुए,उभरे वक्ष-स्थल को
देखकर कामातुर हुआ.
मैंने तुम्हें याद किया।

जब भी
बाजारु खुशियों को
अपनी जेब में भरकर
जश्न मनाया.
मैंने तुम्हें याद किया।

जब भी
दर्द से कराहते हुए
जख्म पर मरहम लगाने के लिये
किसी कोमल श्पर्स की जरुरत हुई.
मैंने तुम्हें याद किया।

यह सच है
तुम कभी नहीं आयी.
लेकिन फ़िर भी
तुम्हारे सच्चे प्यार और वफ़ादारी पर
नतमस्तक हूं.
क्योंकि हर बार
तुम्हारी याद तो आयी....

Tuesday, April 6, 2010

चांद और तुम.

मुझ से दूर
गगन-पटल पर
अपनी चाल से चलते हुए
जग के तम को निगलते हुए
हल्की सी रोशनी लिये
गुलाब की पंखुङियों सी
हंसनेवाली.
दाग होते हुए भी
खूबसूरत
बादलों से घिरकर भी
निर्मल
पवित्र फ़िर भी मादक
ऎसा स्तित्व कि मिट नही सकता।

फ़िर भी
चांद और तुम
दोनों को
मेरे होने या ना होने
का अहसास भी नही...?

Sunday, April 4, 2010

निधन

मर गया बेचारा,
ईंसान बनकर जीने चला था.
खुश हैं लोग,
सोचते हैं,
उसकी मौत उसकी जिंदगी से बेहतर है.
ईमान ही उसका मजहब था,
रोटी के बिना चल पङा,
मगर
ईमान बेच न सका,
इसलिये
मर गया बेचारा,
ईंसान बनकर जीने चला था।

दवा मंहगी थी,
दर्द सस्ते थे
और गरीबों के लिये उपलब्ध भी.
आदर्शों का हथियार लिये,
वह लङता रहा.
फ़िर
मर गया बेचारा,
ईंसान बनकर जीने चला था।

उसकी आत्मा खुश है आज.
उसने देखा है,
चाहनेवालों के हृदय में
सच्ची श्रद्धा, करुणा और स्नेह.
उनके हृदय में ,
वह अब भी जिंदा है,
क्योंकि
ईंसान बनकर जीने चला था।

मरता वह है
जिसके लिये यह दुनियां
एक वेश्यालय है.
जहां ईमान बेचकर बनाये गये धन
पाप के काम आते हैं.
वह कभी नहीं मरता,
जिसके लिये यह दुनियां
एक मंदिर है,
जहां के हर पत्थर में
ईश्वर की आत्मा है.