Friday, February 5, 2010
भूख
"साहब, दो दिनों से घर में खाने को दाना नही है. कोई काम दे दो साहब." रामदीन साहब के सामने गिरगिरा रहा था. साहब ने कुत्ते को पुचकारते हुए जबाब दिया "एक सप्ताह और रुक जाओ, फ़िर मैं तुम्हे जरुर काम दूंगा.".रामदीन फ़िर आग्रह करने लगा " नहीं, साहब तब तक तो हम भूखे मर जायेंगे." तभी साहब ने आलमारी खोलकर उसमे से एक पांव-रोटी का पैकेट निकाला और कुत्ते की ओर फ़ेंक दिया.कुत्ता झपट्टा मारते हुए बडे चाव से पाव-रोटी खाने लगा. साहब ने कुत्ते के उपर हाथ फ़ेरते हुए मुस्कुरा कर कहा " मेरा पप्पी दो घंटे से भूखा था."रामदीन दबे पांव साहब के घर से वापस चला गया.
Wednesday, February 3, 2010
दिवा-स्वप्न
रात मे तो सभी सोते हैं क्योंकि रात सोने के लिये ही होता है.जब सोते हैं तो सपने देखना स्वाभाविक ही है.नेताओं को रात के सपने में कुर्सियां दिखाई देती है, चोरों को खजाना.पुलिस जो पुरे-दिन निर्दोषों को पडेशान करती है और मुजरिमों के पीछे दौडती है,रात के सपने मे उसी मुजरिम को सलाखों मे डालती है.ईमानदार सरकारी बाबू सपने मे महगाई भत्ता बढता हुआ देखता है तो मेरे जैसे आलसी नौकरीवालों को रात के सपने मे फ़ुरसत ही फ़ुरसत दिखाई देता है. कल एक ज्योतिषी जी बता रहे थे जब से उन्हें टी.वी. न्यूज चैनल पर बुलाया गया है तब से सपने में सूर्य-ग्रहण दिखाई देने लगा है.. स्वयं ही ज्योतिष हैं सो फ़लादेश जानकर चिंतित हैं.कुछ दिन पहले मेरे एक मीडियावाले मित्र कह रहे थे "यार, आजकल सपने मे ऎसे वारदात आने लगे हैं जो दिल और दिमाग मे सनसनी पैदा कर देते हैं.लेकिन आदमी मजबूर है,क्या करे, सोयेगा तो सपने तो आयेंगे ही.वैसे मेरी मुश्किलें अलग हैं.आजकल रात को नींद नहीं आती,सो सपने भी नहीं देखता.सोना आदमी के लिये जरूरी है इसलिये दिन में ही सोने का काम पूरा कर लेता हूं.एक तो सूचना-प्रोद्योगिकी की मेहरबानी है कि काम कम हो गया है भय के कारण सीनियरों को नींद मे खलल डालने मे संकोच होता है.उपर से रिक्त पदों के कारण कई कुर्सियां खाली रहती है जिन्हें जोडकर आसानी से सोने के लिये छह फ़ीट का बेड तैयार हो जाता है. कार्यालय के छह फ़िट्टा बेड पर प्रतिदिन छह घंटे सोने का मजा ही अलग है.इससे कार्यालय में शांति-व्यवस्था बनी रहती है.कनिष्ठजनों के साथ किसी तरह के दुर्व्यवहार के पाप से बचाव होता है और सीनियरों के अत्याचार का सामना करने से मुक्ति मिलती है.वातानुकुलित कक्ष में सोने से प्रदुषण से भी छुटकारा मिलता है और कर्मठता भले ही संदिग्ध हो जाये लेकिन योग्यता पर वरिष्ठजनों का औचित्य से अधिक विश्वास बना रहता है.
पहले जब बहुत काम करता था,मेरी गलतियों से सभी परेशान रहते थे.काम करने के बाद पुरस्कार स्वरूप गलतियों के लिये प्रमाण-पत्र के रुप मे चार्ज-शीट थमा दिये जाते थे.सबेरे ताजे सेब की तरह कार्यालय जाता था और शाम को सूखे संतरे की तरह घर आता था.बहुत परेशान रहता था. तभी एक दिन मेरे ही विभाग की दूसरे कार्यालय मे काम करनेवाली एक महिला किसी कम से कार्यालय आयी. वह अच्छी तरह से सज-संवरकर आयी थी.मैं उन्हे देखकर चकित रह गया.वह देखने मे साधारण थी लेकिन चेहरे का मेक-अप उत्कृष्ट था. वह आते ही खाली कुर्सी पर निश्चिंत होकर बैठ गयी औए अपने पर्स से एक छोटा सा आईना निकालकर अपने चेहरे को देखने लगी.फ़िर मुझे टोका "महाशय, टेंशन मे लग रहे हो?" फ़िर जोरदार ठहाका मारते हुए कहा"रेलवे मे लोगे टेंशन तो वाइफ़ उठायेगी पेंशन".उस महिला के उत्कृष्ट व्यंग्य को महान सलाह मानकर उस दिन मैंने अपनी सारी चिंताये राम-भरोसे(मेरे कार्यालय का चपरासी) छोड दिया.राम भरोसे ने भी मेरे भरोसे को कायम रखा और मुझे चिंता मुक्त कर दिया.
चिंता से तो मैं मुक्त हो गया लेकिन.........अब भी डर बना रहता है.जब दिन मे सोता हूं काफ़ी डरावने सपने आते हैं.वैसे यह दिवास्वप्न लगता है जैसे हकीकत हो,लेकिन फ़िर भी भयानक ही होता है..किसी दिन सपने मे वकील सारी कमाई चूस लेता है तो कभी निर्दोष होते हुए भी बेरहम पुलिस भद्दी गालियों के साथ्लाठियों से स्वागत करता है. कभी अपने दो वक्त की रोटी का टुकडा अपना ही नेता हडप कर जाता है तो कभी चंद रुपयों मे बिककर चैनलवाले नंगा कर देते हैं.किसी दिन दूधवाला थोडी सी शुद्ध दूध मे पानी औएर केमिकल-जहर मिलाकर दे जाता है तो किसी दिन शराब पीकर अपना पडोसी मेरे पुरे खनदान को गाली देने लगता है.कभी कोई दलाल चुप-चाप मेरे पुस्तैनी जमीन को बेच देता है तो कभी कोई ठेकेदार मुझ जैसे गरीब के घर को उजारने का ठेका ले लेता है.किसी दिन जब पेट की भूख बैचेन कर देती है तो आज के लेखक हंसाने के लिये व्यंग्य करते हैं और कवि खुबसूरत कविता बनाकर लोडी सुनाते हैं. किसी दिन बेखौफ़ अपराधी आंखों के सामने चौराहे पर किसी औरत की ईज्जत लूटता है तो किसी दिन बडे ओहदेवाला आदमी किसी नाबालिग..........ओह.....,.
लेकिन यह मेरी शिकायत नहीं है.किससे शिकायत की जाये. न्याय की देवी भी आजकल मेरी तरह अपने कार्यालय मे सोती रहती है और दिवास्वप्न देखती रहती है.
पहले जब बहुत काम करता था,मेरी गलतियों से सभी परेशान रहते थे.काम करने के बाद पुरस्कार स्वरूप गलतियों के लिये प्रमाण-पत्र के रुप मे चार्ज-शीट थमा दिये जाते थे.सबेरे ताजे सेब की तरह कार्यालय जाता था और शाम को सूखे संतरे की तरह घर आता था.बहुत परेशान रहता था. तभी एक दिन मेरे ही विभाग की दूसरे कार्यालय मे काम करनेवाली एक महिला किसी कम से कार्यालय आयी. वह अच्छी तरह से सज-संवरकर आयी थी.मैं उन्हे देखकर चकित रह गया.वह देखने मे साधारण थी लेकिन चेहरे का मेक-अप उत्कृष्ट था. वह आते ही खाली कुर्सी पर निश्चिंत होकर बैठ गयी औए अपने पर्स से एक छोटा सा आईना निकालकर अपने चेहरे को देखने लगी.फ़िर मुझे टोका "महाशय, टेंशन मे लग रहे हो?" फ़िर जोरदार ठहाका मारते हुए कहा"रेलवे मे लोगे टेंशन तो वाइफ़ उठायेगी पेंशन".उस महिला के उत्कृष्ट व्यंग्य को महान सलाह मानकर उस दिन मैंने अपनी सारी चिंताये राम-भरोसे(मेरे कार्यालय का चपरासी) छोड दिया.राम भरोसे ने भी मेरे भरोसे को कायम रखा और मुझे चिंता मुक्त कर दिया.
चिंता से तो मैं मुक्त हो गया लेकिन.........अब भी डर बना रहता है.जब दिन मे सोता हूं काफ़ी डरावने सपने आते हैं.वैसे यह दिवास्वप्न लगता है जैसे हकीकत हो,लेकिन फ़िर भी भयानक ही होता है..किसी दिन सपने मे वकील सारी कमाई चूस लेता है तो कभी निर्दोष होते हुए भी बेरहम पुलिस भद्दी गालियों के साथ्लाठियों से स्वागत करता है. कभी अपने दो वक्त की रोटी का टुकडा अपना ही नेता हडप कर जाता है तो कभी चंद रुपयों मे बिककर चैनलवाले नंगा कर देते हैं.किसी दिन दूधवाला थोडी सी शुद्ध दूध मे पानी औएर केमिकल-जहर मिलाकर दे जाता है तो किसी दिन शराब पीकर अपना पडोसी मेरे पुरे खनदान को गाली देने लगता है.कभी कोई दलाल चुप-चाप मेरे पुस्तैनी जमीन को बेच देता है तो कभी कोई ठेकेदार मुझ जैसे गरीब के घर को उजारने का ठेका ले लेता है.किसी दिन जब पेट की भूख बैचेन कर देती है तो आज के लेखक हंसाने के लिये व्यंग्य करते हैं और कवि खुबसूरत कविता बनाकर लोडी सुनाते हैं. किसी दिन बेखौफ़ अपराधी आंखों के सामने चौराहे पर किसी औरत की ईज्जत लूटता है तो किसी दिन बडे ओहदेवाला आदमी किसी नाबालिग..........ओह.....,.
लेकिन यह मेरी शिकायत नहीं है.किससे शिकायत की जाये. न्याय की देवी भी आजकल मेरी तरह अपने कार्यालय मे सोती रहती है और दिवास्वप्न देखती रहती है.
Tuesday, January 26, 2010
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
बच्चे मां के दुध के प्यासे
फ़ुटपाथों पर सोते हैं.
आज भी भूखी-नंगी जनता
गम के साये मे जीते हैं.
आज भी ईंसां बेचा जाता,
झुकता जाता अपना माथा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
आतंकी के बंदूकों से
काटी जाती जीवन की रेखा.
मंहगाई पर विधि-निर्माता,
कहते हैं यह भाग्य का लेखा.
आज भी खुशियां अपनी-अपनी,
अलग-अलग हैं गम और बाधा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
निर्वासित गांधी का भारत,
बलात्कार सच का होता है.
आजद हिन्द है जंजीरों में,
ईमान बाजारों मे बिकता है.
टकराते हैं जाति और मजहब,
अब लडती है क्षेत्र और भाषा,
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
अब तो अपनी मातृ-भूमि मे
बारूदों की खेती होती है.
नीलाम हो चुकी पुलिस की वर्दी,
इंसाफ़ सदा ही सोती है.
डालर मे अब वोट हैं विकते,
बदले शब्द, बदली परिभाषा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
मां रोती है अब बेटों को,
चुमते हैं बच्चे फ़ंदों को.
झूठे सपने दिखा-दिखाकर,
फ़हराये जाते झंडों को.
लुटते हैं इज्जत औरत की,
मारी जाती हैं भ्रुण-मादा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
बच्चे मां के दुध के प्यासे
फ़ुटपाथों पर सोते हैं.
आज भी भूखी-नंगी जनता
गम के साये मे जीते हैं.
आज भी ईंसां बेचा जाता,
झुकता जाता अपना माथा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
आतंकी के बंदूकों से
काटी जाती जीवन की रेखा.
मंहगाई पर विधि-निर्माता,
कहते हैं यह भाग्य का लेखा.
आज भी खुशियां अपनी-अपनी,
अलग-अलग हैं गम और बाधा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
निर्वासित गांधी का भारत,
बलात्कार सच का होता है.
आजद हिन्द है जंजीरों में,
ईमान बाजारों मे बिकता है.
टकराते हैं जाति और मजहब,
अब लडती है क्षेत्र और भाषा,
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
अब तो अपनी मातृ-भूमि मे
बारूदों की खेती होती है.
नीलाम हो चुकी पुलिस की वर्दी,
इंसाफ़ सदा ही सोती है.
डालर मे अब वोट हैं विकते,
बदले शब्द, बदली परिभाषा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
मां रोती है अब बेटों को,
चुमते हैं बच्चे फ़ंदों को.
झूठे सपने दिखा-दिखाकर,
फ़हराये जाते झंडों को.
लुटते हैं इज्जत औरत की,
मारी जाती हैं भ्रुण-मादा.
कैसे गाऊं गौरव गाथा ?
Friday, January 22, 2010
चांद
मां बाजरे की रोटी पका रही थी.कच्चे लकडी के जलने से घर में धुआं फ़ैल चुका था.चारपाई पर पिताजी लेटे हुए थे.दस साल की बच्ची चुपके से घर से निकल पडी.आज पुर्णीमा की रात है.साहब के घर कविजन आए होंगे.कविताऎं गाऎंगे और पुरी-जलेबी खाऎंगे.उसे भी खाने को मिलेगा-यह सोचकर वह चुपके से साहब के कमरे मे आकर खडी हो गयी.एक कवि ने कहा "मेरे मह्बुब की तरह यह चांद भी खुबसुरत लग रहा है. इसक रंग भी उसके होठों की तरह लाल है."
तभी उसकी मां चिल्लाती हुई आई और उसके बालों को पकडकर खीचने लगी."उधर तेरा बाप बीमार है,घर मे खाने को कुछ भी नही है और इधर तु साहेब लोगों की कविता सुन रही है." फ़िर उसने खिडकी से झांकते हुए पुनम की चांद को देखा और कहने लगी "देखो तो आज ये चांद कितना बदसुरत लग रहा है,इसका रंग गर्म तवे की तरह लाल है."
तभी उसकी मां चिल्लाती हुई आई और उसके बालों को पकडकर खीचने लगी."उधर तेरा बाप बीमार है,घर मे खाने को कुछ भी नही है और इधर तु साहेब लोगों की कविता सुन रही है." फ़िर उसने खिडकी से झांकते हुए पुनम की चांद को देखा और कहने लगी "देखो तो आज ये चांद कितना बदसुरत लग रहा है,इसका रंग गर्म तवे की तरह लाल है."
Wednesday, January 20, 2010
मयखाना और मोहब्बत
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.
लोग यहां आते हैं , खूब आंसु बहाते हैं.
शराब के पैमाने मे मिलाकर पी जाते है.
गम कम नही होता,दर्द बढता ही जाता है.
दिल-जलों ने तो शराब की कीमतें बढायी है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
बिना जाने ही गैरों को अपना बनाते हैं.
सैकडो वादे करते हैं,हजारो कसमे खाते हैं
मिले जो वक्त फ़ुरसत की तो सपने सजाते हैं
कभी सूरज उगाते हैं, कभी चंदा बनाते हैं
मगर जब आंख खुलती है नजारा और होता है
इस खेल मे हर सख्श ने बस जख्म खायी है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
मोहब्बत और मयखाने के रिश्ते बताते है.
मजा दोनो मे आता है, नशा दोनो पिलाते है
शुरुआत मे दोनो जगह कहकहे लगाते हैं
मगर जब अन्त आता है तो लडखडाते हैं
फ़र्क इतना है कि शराब कभी धोखा नही देता,
और मोहब्बत के खून मे सिर्फ़ बेवफ़ाई है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.
लोग यहां आते हैं , खूब आंसु बहाते हैं.
शराब के पैमाने मे मिलाकर पी जाते है.
गम कम नही होता,दर्द बढता ही जाता है.
दिल-जलों ने तो शराब की कीमतें बढायी है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
बिना जाने ही गैरों को अपना बनाते हैं.
सैकडो वादे करते हैं,हजारो कसमे खाते हैं
मिले जो वक्त फ़ुरसत की तो सपने सजाते हैं
कभी सूरज उगाते हैं, कभी चंदा बनाते हैं
मगर जब आंख खुलती है नजारा और होता है
इस खेल मे हर सख्श ने बस जख्म खायी है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
मोहब्बत और मयखाने के रिश्ते बताते है.
मजा दोनो मे आता है, नशा दोनो पिलाते है
शुरुआत मे दोनो जगह कहकहे लगाते हैं
मगर जब अन्त आता है तो लडखडाते हैं
फ़र्क इतना है कि शराब कभी धोखा नही देता,
और मोहब्बत के खून मे सिर्फ़ बेवफ़ाई है.
जब से इश्क वालों के वफ़ा मे कमी आयी है.
जिधर देखो मयखाने मे हरियाली सी छायी है.
Monday, January 18, 2010
क्रांति के बीज
झुलसाते रवि-किरणों से
जब मानव मृत हो जाता है.
मैं बदरी बनकर छाता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं।
आती है जब निशा-रात्रि
घनघोर अंधेरा छाता है.
मैं दीपक की लौ बनकर
स्वयं ही जलता जाता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं।
वे बहुत ही अभिमानी हैं.
करते अपनी मनमानी हैं.
जग को झूठे पाठ पढाते,
इतने वे अग्यानी हैं.
सही राह पर लाने उनको,
राजनीति सिखाता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं।
देते हैं मां को विष-प्याला.
मां के लिये है जग-आला.
कहते हैं पी गयी रक्त वह,
मां है या राक्षसनी है.
सुख की दुनियां का श्रेय कहां,
मां तो बस दुख का कारण है.
नही है ममता लेश-मात्र,
मां तो अत्याचारण है.
मां की ममता को नमण मेरा,
उस पुत्र का अंत मैं करता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं.
जब मानव मृत हो जाता है.
मैं बदरी बनकर छाता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं।
आती है जब निशा-रात्रि
घनघोर अंधेरा छाता है.
मैं दीपक की लौ बनकर
स्वयं ही जलता जाता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं।
वे बहुत ही अभिमानी हैं.
करते अपनी मनमानी हैं.
जग को झूठे पाठ पढाते,
इतने वे अग्यानी हैं.
सही राह पर लाने उनको,
राजनीति सिखाता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं।
देते हैं मां को विष-प्याला.
मां के लिये है जग-आला.
कहते हैं पी गयी रक्त वह,
मां है या राक्षसनी है.
सुख की दुनियां का श्रेय कहां,
मां तो बस दुख का कारण है.
नही है ममता लेश-मात्र,
मां तो अत्याचारण है.
मां की ममता को नमण मेरा,
उस पुत्र का अंत मैं करता हूं.
मैं बीज क्रान्ति के लाता हूं.
Friday, January 15, 2010
सूर्यग्रहण- पाखंडियों का महापर्व
वैसे सूर्यग्रहण तो पहले भी होते रहे हैं लेकिन आज का सूर्यग्रहण बहुत ही अनोखा है। पहली बार मीदिया ने इसे इतना बडा कवरेज दिया है कि लगता है बीते सप्ताह यह खबर हमारे देश मे पहले पायदान पर रही. तीन दिनों से सभी न्यूज चैनलों पर सिर्फ़ यही दिखाया जा रहा है. ज्योतिषों और पंडितों को बुलाकर चैनलों पर घंटों भर उनसे बातचीत की जा रही है. कोई दूसरी खबर नहीं है. यदि और कोइ खबर होगी भी तो सूर्यग्रहण के बाद ही उसमे मसाला लगाकर परोसा जायेगा.प्रकृर्ति की इस नियमित घटना को पाखंडियों ने आजकल एक हथियार बना लिया है. इसमे मीडिया का योगदान तो अभूतपूर्व है. अपनी रोटी सेंकने के लिये लगता है मीडिया ने नेतओं, उद्योगपतियों के साथ साथ अब ज्योतिषों और पाखंडियों के साथ भी हाथ मिला लिया है॥ मीडियावालों ! सभी से हाथ मिलाते रहो.....यह बुरी बात नही है....लेकिन राष्ट्रहित तो देखो.देश के महन वैग्यानिकों की अनदेखी कर यदि ज्योतिषों का इस तरह महिमा-मंडन किया जायेगा तो देश का क्या हाल होगा? कुछ चैनलों ने भले ही वैग्यानिकों से बातचीत को भी टी.वी पर दिखाय, लेकिन एक सामान्य प्राकृतिक घटना जिसका रहस्य काफ़ी पहले खुल गया है उसके बारे मे वैग्यानिकों से पूछना कहां तक उचित है?.मैं मानता हूं आज भी देश की आबादी का एक हिस्सा अशिक्षित है जो चैनलों की हर बात को चाव से देखती है लेकिन बांकी लोगों को बेवकूफ़ बनाना अच्छी बात नही है. कौन नही जानता है कि सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा के आने से सूर्यग्रहण लगता है. जहां तक प्रभाव की बात है तो निश्चय ही कुछ देर तक सौर-उर्जा का कुछ हिस्सा चंद्रमा के अवरोध से पृथ्वी तक नही आ पाता. यह प्रभाव तो अच्छा नही है लेकिन सामान्यतः इसे नगन्य माना जा सकता है.
दूसरी तरफ़ मीडिया के द्वारा पैदा किया गया दुष्प्रभाव सूर्यग्रहण के प्रभाव से कई गुणा अधिक है। क्या मीडिया के पास इस बात की कोई प्रमाणिकता है कि इस सूर्यग्रहण से कुछ लोगों पर अच्छे या बुरे प्रभाव पडेंगे॥ जिस जादु-टोना, भूत-प्रेत और टोटकों जैसे अंधविश्वास को धार्मिक-रूढवादिता कहकर हम आगे बढते चले गये, क्या मीडिया फ़िर हमें वहीं ले जाना चाहती है?। ज्योतिष तो श्रद्धा की बात कहकर पीछे हट जायेंगे लेकिन मीडिया के लोग इन अप्रमाणिक बातों का क्या जबाव देंगे. जिस महादान को चैनल करोडो जनता को दिखा रही है, क्या वे लोग जानते हैं कि तत्काल इसका आर्थिक प्रभाव क्या होगा? घी, दूध,गुड,दाल और अन्य खाद्द्यान्न यदि देश की सौ करोड जनता खरीदकर दान करने लगे तो............दूसरी ओर दान के लिये पात्रता की बात. कही यह ब्राह्मणों का षडयंत्र तो नहीं? खैर विषय चिंतन करने की है. दूसरी बात महास्नान की. इलाहाबद, हरिद्वार और वारणसी में लाखों लोग महास्नान का पूण्य प्राप्त करने जुट गये हैं जो सूर्यग्रहण के दुष्प्रभाव से बचायेगी. मीडिया बार-बार यही बात दुहरा रही है. जबकी ट्रेफ़िक जाम, भगदड, दूर्घटनायें और गंगाजल मे प्रदूषण के सिवा इससे कुछ भी प्राप्त नही होनेवाला. किसी की श्रद्धा और भावनाओं को चोट नही पहुंचाना चाहिये, लेकिन किसी के भीतर के अंधविश्वास को जगाना या बढावा देना---मीडिया के लिये ठीक नही है.
मीडिया को राष्ट्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लगभग एक सप्ताह से इनकी स्थिति देखकर श्पष्ट हो चुका है कि चौथा स्तंभ बहुत कमजोर हो चुका है. यह भी रुपयों के बदले बिक चुका है. करोडो लोगों को दिग्भ्रमित करना, समाचारों को तोड-मरोडकर पेश करना और देशहित के समाचारों को वरीयता ना देना----आज के न्यूज चैनलों के कार्य-लक्षण हैं. यह दंडनीय अपरध है. इसके लिये न्यूज-चैनल चलानेवालों को(यदि शर्म बचा हुआ है तो) माफ़ी मांगनी चाहिये. हमारे हजारो जनप्रतिनिधि सदन मे बठकर राष्ट्रहित के मुद्दों पर बहस कर रहे हैं, लाकों लोगों की नजर शेयर बाजार पर लगी हुई है, करोडो लोग आम जरुरत को पूरा करने के लिये संघर्ष कर रहे हैं.कई विद्वान, वैग्यानिक, खिलाडी आदि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ऎसी स्थिति मे जन-साधारण तक खबर पहुचानेवाली संस्थायें यदि सभी खबरों को छोडकर कुछ ज्योतिषों, ब्रह्मणो और पाखडियों को साथ लेकर सूर्यग्रहण का महापर्व मना रही है तो..........यह दुखद है.
अरविन्द झा
०९७५२४७५४८१
दूसरी तरफ़ मीडिया के द्वारा पैदा किया गया दुष्प्रभाव सूर्यग्रहण के प्रभाव से कई गुणा अधिक है। क्या मीडिया के पास इस बात की कोई प्रमाणिकता है कि इस सूर्यग्रहण से कुछ लोगों पर अच्छे या बुरे प्रभाव पडेंगे॥ जिस जादु-टोना, भूत-प्रेत और टोटकों जैसे अंधविश्वास को धार्मिक-रूढवादिता कहकर हम आगे बढते चले गये, क्या मीडिया फ़िर हमें वहीं ले जाना चाहती है?। ज्योतिष तो श्रद्धा की बात कहकर पीछे हट जायेंगे लेकिन मीडिया के लोग इन अप्रमाणिक बातों का क्या जबाव देंगे. जिस महादान को चैनल करोडो जनता को दिखा रही है, क्या वे लोग जानते हैं कि तत्काल इसका आर्थिक प्रभाव क्या होगा? घी, दूध,गुड,दाल और अन्य खाद्द्यान्न यदि देश की सौ करोड जनता खरीदकर दान करने लगे तो............दूसरी ओर दान के लिये पात्रता की बात. कही यह ब्राह्मणों का षडयंत्र तो नहीं? खैर विषय चिंतन करने की है. दूसरी बात महास्नान की. इलाहाबद, हरिद्वार और वारणसी में लाखों लोग महास्नान का पूण्य प्राप्त करने जुट गये हैं जो सूर्यग्रहण के दुष्प्रभाव से बचायेगी. मीडिया बार-बार यही बात दुहरा रही है. जबकी ट्रेफ़िक जाम, भगदड, दूर्घटनायें और गंगाजल मे प्रदूषण के सिवा इससे कुछ भी प्राप्त नही होनेवाला. किसी की श्रद्धा और भावनाओं को चोट नही पहुंचाना चाहिये, लेकिन किसी के भीतर के अंधविश्वास को जगाना या बढावा देना---मीडिया के लिये ठीक नही है.
मीडिया को राष्ट्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लगभग एक सप्ताह से इनकी स्थिति देखकर श्पष्ट हो चुका है कि चौथा स्तंभ बहुत कमजोर हो चुका है. यह भी रुपयों के बदले बिक चुका है. करोडो लोगों को दिग्भ्रमित करना, समाचारों को तोड-मरोडकर पेश करना और देशहित के समाचारों को वरीयता ना देना----आज के न्यूज चैनलों के कार्य-लक्षण हैं. यह दंडनीय अपरध है. इसके लिये न्यूज-चैनल चलानेवालों को(यदि शर्म बचा हुआ है तो) माफ़ी मांगनी चाहिये. हमारे हजारो जनप्रतिनिधि सदन मे बठकर राष्ट्रहित के मुद्दों पर बहस कर रहे हैं, लाकों लोगों की नजर शेयर बाजार पर लगी हुई है, करोडो लोग आम जरुरत को पूरा करने के लिये संघर्ष कर रहे हैं.कई विद्वान, वैग्यानिक, खिलाडी आदि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ऎसी स्थिति मे जन-साधारण तक खबर पहुचानेवाली संस्थायें यदि सभी खबरों को छोडकर कुछ ज्योतिषों, ब्रह्मणो और पाखडियों को साथ लेकर सूर्यग्रहण का महापर्व मना रही है तो..........यह दुखद है.
अरविन्द झा
०९७५२४७५४८१
