Friday, January 15, 2010
Thursday, January 7, 2010
चोर-विद्या
तब मैं दस साल का था। एक दिन जब मैं दुकान से सामान खरीद रहा था चतुरानन्दजी की नजर मेरे उपर पडी. वह मुझे ऎसे देखने लगे जैसे कोइ छिछोले स्वभाव का व्यक्ति किसी सुकोमल और खूबसूरत नवयौवना को देखता है. फ़िर उन्होने मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा "चोकलेट खाओगे?". मैने हामी भर दी.उन्होने ढेर सारी टोफ़ी अपनी जेब से निकालकर मुझे दे दिया. फ़िर कहने लगे "सारे ले लो, फ़्री के हैं". "फ़्री के?"---मैने पूछा "कैसे?". कहने लगे "बेटे, मुझे किसी चीज के लिये किसी के पास हाथ नहीं फ़ैलाना पडता.बहुत ही प्रेक्टिकल लाइफ़ जीता हूं मैं. तुम भी यदि प्रेक्टिकल लाइफ़ जीना चाहते हो तो मुझे अपना गुरू बना लो.". मैं ठहरा दस साल का अबोध बालक, प्रेक्टिकल लाइफ़ समझ मे नहीं आया. मैं सोचने लगा यदि प्रेक्टिकल लाइफ़ जीने से फ़्री मे चोकलेट मिल जाये ......तो अच्छा ही है. " हूं.......तो आप मुझे सिखायेंगे?"मेरे आग्रह को सहर्ष स्वीकारते हुए कहा "क्यों नही. जरूर......तुम आज शाम को मेरे घर आ जाओ."
मैं शाम को उनके घर पहुंचा। वह समझाने लगे " बेटे मैं तुम्हे चोरविद्या कि शिक्षा दुंगा. प्रेक्टिकल लाइफ़ से मेर मतलब चोरविद्या ही था" .मैने पूछा "चोरविद्या? ये क्या होती है?" कहने लगे "ये एक प्रकार की शिक्षा अर्थात एडुकेसन है जिसमे बिना मांगे,बिना खर्च किये और बिना औरों के जानकारी के गुप्त तरीके से अपने दिमाग,शरीर और हृदय के उपयोग से किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र मे आनेवाले वस्तु को ग्रहण किया जाता है." तब मैं चौथी कक्षा मे पढता था,मुझे परिभाषा बिल्कुल ही समझ मे नही आया." बेटे ये एक कला है."मेरे मुंह से निकल पडा "ओ.....,मेरे बाबूजी कहते हैं कि मुझे तो बिजनेस करना है." " तो तुम्हे व्यवसायी बनना है यही ना? बेटे आजकल इस कला का व्यवसायीकरण हो चुका है और जब तुम इस कला को अपनाओगे तब ये कला जो व्यवसाय बन चुका है उसे फ़िर से कलाकृत कर दोगे". मैं फ़िर से उनकी बात नहीं समझ पाया.उनकी पारखी नजरें यह जान रही थी.वह पुनः समझाने लगे "अच्छा बताओ बिजनेस क्या होता है?" स्वयं ही जबाव देने लगे "पूंजी खर्च कर लाभ कमाना,यही ना?" मैंने सिर हिला दिया. " इसमे पूंजी नही लगता है,थोडा सा जोखिम है पर मार्जिन ओफ़ प्रोफ़िट बहुत ज्यादा है.यदि ज्यादा जोखिम लोगे तो मार्जिन ओफ़ प्रोफ़िट इतना ज्यादा हो सकता है कि तुम सोच भी नही सकते.यदि तुमने इस कला को अपना लिया तो विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा से तुम्हारे घर मे मां लक्ष्मी का भंडार होगा" .मैं सोच मे पड गया.मैं पूरी तरह समझ तो नही रहा था लेकिन सोच रहा था चाचाजी कुछ अच्छी बात कह रहे थे. तभी मेरे मूंह से निकल पडा "मां भी तो सरस्वती और लक्ष्मी मैया की पूजा करती है."वह झट से बोल पडे "बिल्कुल. दूसरों के घरों मे रखे हुए धन अर्थात लक्ष्मी को अपने सरस्वती अर्थात बुद्धि के बल पर गुप्त रूप से प्राप्त करना सबसे बडी पूजा है.रात के अंधेरे मे जब सभी सो रहे हो, वातावरण शांत हो, किसी परायी मुल्यवान वस्तु पर दृष्टि केन्द्रित करना सबसे बडा ध्यान है.समय एवं परिस्थिति के अनुरूप शरीर को ढालकर कभी अतिमंद गति से चलना और कभी अतिवेग से दौडना-शरीर के लिये भी स्वास्थ्यप्रद है.बेटे इस कला मे गुण ही गुण हैं. इसे चोर-दर्शन कहते हैं" .चाचा किसी बहुत बडे दार्शनिक की तरह बोल रहे थे. मैने पूछा "लेकिन चाचा यह शिक्षा तो काफ़ी कठिन होगा न?" उन्होने कहा- " थोडा सा........,लेकिन कुछ नैसर्गिक गुणों के आधार पर तुम सर्वथा योग्य हो." मैने पुछा " कैसे?.उनका जबाव था "तुम्हारे पिता एक सम्मानित व्यक्ति हैं, उनके नाम पर अन्य लोग तुम पर विश्वास करेंगे.दिखने मे काले हो----अंधकार की तो बात छोडो,प्रकाश मे भी तुम्हे आसानी से देखना मुश्किल है.उपर से काले होने के कारण शनि की कृपा-दृष्टि सदैव बनी रहेगी.दुबले-पतले हो--छोटे से रास्ते से भी आ जा सकते हो. नाटे भी हो---समय आने पर इसका भी लाभ प्राप्त होगा.ईश्वर ने तुम्हें तेज दिमाग दिया है, देखना मैं तुम्हे इस कला मे मास्टर बना दूंगा".
मुझे गुरू तो मिल ही गया था।सोचा जल्दी ही अवसर का फ़ायदा उठाया जाय. मैंने कहा -"चाचा आप कल से ही मुझे यह विद्या सिखाना चालू कर दो." " कल नहीं बेटे आज. काल करे सो आज कर आज करे सो अब.और प्राथमिक शिक्षा अपने मात-पिता से ग्रहण करो अर्थात घर की लक्ष्मी पर हाथ फ़ेरने का अभ्यास करो. तुम्हारी मां रुपये कहां रखती है?." "अपने कमरे की टेबुल पर एक डब्बे मे." उन्होंने धीरे से कहा-" आज रात उस डब्बे मे रखे सारे रुपये गायब कर दो.......ध्यान रहे मात-पिता को बिल्कुल पता नहीं चलना चाहिये." चाचा की बात सुनकर मैं सन्न रह गया. अब मैं पूरी बात समझ रहा था. चाचा मुझे चोर बनाना चाह रहे थे.मैं भले ही नटखट था लेकिन चोरी को पाप समझता था.मैंने कहा-" तो आप मुझे चोरी करना सिखा रहे हैं?" " नहीं बेटे. मैं तुम्हे व्यवहारिक जीवन जीना सिखा रहा हूं.मानव जीवन तो क्षणिक होता है .सोचो इस संसार मे कोई भी व्यक्ति ऎसा नहीं है जिसने चोरी न किया हो. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी एक बार अपने घर से सोना चुराया था." मैने कहा -"लेकिन गांधीजी ने बाद मे चोरी करना बंद कर दिया था." " मैं आशा करता हूं तुम वही गलती नही करोगे. वीर एक बार जिस रास्ते पर निकल पडता है उस रास्ते से वापस नहीं आता. गांधीजी ने चोरी बंद कर दिया....इसका परिणाम क्या हुआ? अपनी रोजी-रोटी के लिये दक्षिण-अफ़्रिका तक उन्हें भटकना पडा."- चाचा ने चोरी और वीरता को समानार्थक सिद्ध कर दिया था. कहने लगे "भगवान श्रीकृष्ण ने भी मूल रूप से चोरी की शिक्षा ही दिया है अपने जीवन से."चाचा की बातों मे दम था. पहली ही रात सफ़लता-पूर्वक मैंने अपने कार्य को पूरा किया,घर से पूरे दो सौ रुपये गुप्त रूप से प्राप्त किया.चाचा के जादुई व्यक्तित्व के प्रभाव ने मेरे भीतर ग्लानि के बदले गर्व को पैदा किया.चोरी की इस पहली घटना ने न केवल मेरे आत्म-विश्वास को बढाया बल्कि मेरी हिम्मत को भी चौगुना कर दिया.
अरविन्द कुमार झा
डिपो वस्तु अधिक्षक
भंडार नियंत्रक कार्यालय
द.पु.म.रेलवे, बिलासपुर
९७५२४७५४८१
Friday, January 1, 2010
नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है.
या दुखों के काले बादल.
आओ तुफ़ां बनकर जीवन में
या बन जाओ खुशियों के पल.
तुम जो चाहो हम सहमत है,
नव वर्ष तुम्हार स्वागत है।
तुम चाहो तो धावक भी
ठोकर खाकर गिर जाते हैं.
कोई लाख करे कोशिस लेकिन,
तुम्हे रोक ना पाते हैं.
जो भी होता इस जग मे
वह सबकुछ तेरी रहमत है.
नव वर्ष तुम्हार स्वागत है।
हम नहीं जानते हैं तुमको,
न कोई तुम्हें समझ पाया.
तुमने अपनी माया से
ऎसे ऎसे दिन दिखलाया.
छिन्न न होने देंगे क्षण को
इतनी हममे हिम्मत है.
नव वर्ष तुम्हार स्वागत है.
Wednesday, December 30, 2009
शुभ वर्ष बीस-दस
नई आशाएं, नयी योजनायें, नये प्रयास, नयी सफ़लता, नया जोश, नई मुस्कान, नया वर्ष बीस-दस
समृद्धशाली, गौरवपुर्ण, उज्ज्वल, सुखदायक, उर्जावान, विस्मयकारी, स्मृतिपुर्ण नव वर्ष बीस दस।
जीवन-मरण की सीमाओं मे बंधा हुआ नगण्य सा प्राणी मानव, काल-चक्र की द्रुतगति मे वीते वर्ष की परिधि बिंदु पर सांस लेता हुआ मानव, कालदेव की इच्छा-मात्र के अनुरूप अपने-अपने कर्तव्य एवम अधिकार के झंझावातों मे उलझा हुआ मानव और अन्य प्राणियों की भांति अपनी लघुतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कठिनतम प्रयास करता हुआ मानव का जीवन नव वर्ष बीस दस मेमंगलमय हो.
कालदेव नव वर्ष बीस दस के प्रत्येक क्षण आपके मुख-मंडल को दिवसदेव सुर्य की भांति तेजपूर्ण और कोमल पुष्प के समान प्रसन्नचित रखें. समय की धारा तरंगमयी सागर के लहरों की तरह आपके हृदय को तरंगित करें, रात्रि-राजन चंद्रदेव की तरह निर्मल करें, अमृतमयी गंगाजल की भांति पवित्र रखें और मदमस्त निर्झर-जल की भांति निश्छल बनायें--यही मेरी सुभकामना है.
अरविंद
डिपो सामग्री अधीक्षक
भंडार नियंत्रक कार्यालय
दक्षिण पूर्व मध्य रेल्वे
बिलासपुर, छत्तीसगढ
Wednesday, December 16, 2009
मेरी मां ने मुझे कहा था............,
(मेरी यह कविता मुझे जन्म देनेवाली मां इन्दिरा और नयी प्रेरणा देनेवाली मां निर्मला के लिये समर्पित है.मेरे ये शब्द उन सभी मांओं को समर्पित हैं जिन्होंने मातृत्व को नयी परिभाषा दी है.नारी निश्चित रुप से जननी है,अपने आप मे अन्य की तरह सद्गुणों से युक्त और हज़ारो अवगुणों के होते हुए भी वह निर्मला है.वह पहली और अंतिम पाठशाला है.उसके शब्दों के सागर को समेटना असंभव है.टुकडों मे ही सही सागर को समेटने का दुस्साहस कर रहा हुं.यदि प्रिय पाठकों को यह पसन्द आये तो आगे बढने का आदेश दें यही इस कविता की सार्थकता होगी.)
मेरी मां ने मुझे कहा था............,
मैने मां से सीख लिया था,
होश मे रहकर जीवन जीना.
फ़िर खुशियां लौटी जीवन मे,
नहीं मैं पहले जैसा दीना.
नारी जननी जीवमात्र की,
रुप भले ही अलग अलग हैं.
सौन्दर्य वही, प्रकृर्ति भी है,
वही चमेली वही जलज है।
कभी प्रसव पीडा वह सहती.
कभी बहन बन डोली सजती.
पत्नी बनकर सुख वह देती.
बेटी लक्ष्मी बन कर आती।
मेरी ईच्छा आदेश मान तू,
ला दे मेरे घर मे बहू तू.
जैसे ही पाया मैं ईशारा,
घर लेकर आया मैं दारा।
सपने मां के सत्य हुए थे.
क्षण मे ही सहस्त्रो फ़ूल खिले थे.
मां के मुख की रक्तिम आभा,
देख देव भी गौण पडे थे।
देखा मां के मुखाकाश पर,
तत्क्षण एक मेघों की टोली.
हर्ष, विषाद, संशय, चिन्तायें
भावनाओं के रंगों की होली.
मां ने मेरा हाथ पकडकर
निज मंदिर मे लेकर आयी.
वह मुझको एक पाठ पढाने,
अति सुन्दर एक कथा सुनायी.
Sunday, November 15, 2009
अभिव्यक्ति
उडान भरती है,
हवाई पत्तों की तरह.
तेज हवा के झोकों से
दोस्ती कर
चूम लेती है,
महलों की ऊंची दीवारों को.
टकराकर चिपक जाती है,
गगनचुंबी स्तंभों से.
लांघ जाती है,
मदमस्त चौडी नदियों को.
जमीन पर भी
दौडती है,
तेज रफ़्तार काफ़िलों के साथ.
लेकिन,
हमारी बातों मे वजन होता है.
डूब जाती है,
पत्थरों की तरह
किसी गहरे तालाब मे फ़ेंकने पर.
अब वह जमीन का हिस्सा नहीं होता.
वह दिखता नहीं.
वर्षों बाद उसमे काई लग जाती है.
स्वरुप बदल जाता है.
रंग बदल जाता है.
स्तित्व अर्थ नहीं रखता.
ऎसी अभिव्यक्ति का क्या अर्थ?
Monday, November 2, 2009
चाचा की चिट्ठी
मेरे प्यारे बच्चों
आज तुम सभी बाल-दिवस के रुप मे मेरा जन्मदिन मना रहे हो-यह मेरे लिये खुशी की बात है।बच्चे जो राष्ट्र के भविष्य होते है-आज वर्तमान बनकर भारत के निर्माण मे अपना योगदान दे रहे है.इससे बढकर खुशी की बात क्या हो सकती है.जैसा मैने सोचा था वैसे ही तुमने विकास की रेखा को स्वर्णिम भविष्य की ओर उन्मुख कर दिया.मेरे सपनो को तुम सबने बहुत हद तक साकार किया है.मेरी ओर से सभी उपलब्धियों के लिये हार्दिक बधायी और शुभकामनायें.
भारत के लाखों-करोडो सपूतों ने स्वतंत्रता के लिये संघर्ष किया था।वस्तुतः यह कार्य समुद्र-मंथन की तरह कठिन था जिसका सुखद परिणाम विश्व के सबसे बडे प्रजातंत्र के रुप मे भारत का जन्म हुआ. मुझे खुशी है कि तुमलोगों ने देश की एकता, अखंडता और हमारी सांस्कृतिक विरासतों को अक्षुण्ण रखा. वस्तुतः भारत एक राष्ट्र और एक भूखंड मात्र नही है.यह एक विचार है जो प्रगतिशील होते हुए भी सत्य और अहिंसा के पथ पर चलता है.भारत एक लक्ष्य है जो एक अरब लोगों के कल्याण के लिये प्रतिबद्ध है.भारत एक धर्म है जहां सभी मजहबों के लोग पारस्परिक सहिष्णुता रखते हुए अपनी कर्मठता से देशभक्ति की छाप छोडते है.आज हम जो कुछ भी है वह हमारी इसी सोच का सार्थक परिणाम है. भारतीय होना निश्चय ही गर्व का विषय है और मैं आशा करता हूं कि भारत का प्रत्येक नागरिक भविष्य मे भी भारतीय होने का गर्व करते रहेंगे.
मेरे पत्र लिखने का उद्देश्य न ही अपने राष्ट्र का गुणगान करना है और ना ही मेरे और जिन्ना के विचार धाराओं पर प्रकाश डालना है।मेरी कुछ चिंताऎं है.जहां चुनौतियां होती हैं वहां चिंताओं का होना स्वाभाविक ही है. बाधायें तभी आती है जब रास्ते पर आगे बढने की बात आती है. यदि तुम सबकुछ छोडकर सो गये होते तो निश्चय ही इतनी सारी बाधायें और चुनौतियां नहीं आती. मुझे खुशी है कि तुम सोये नहीं बल्कि प्रगति पथ पर अग्रसर रहे. गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी की समस्या आज भी देश मे बरकरार है. उन दिनों की अपेक्षा आज इन समस्याओं का कद काफ़ी छोटा हो गया है,लेकिन मेरे सपनों का भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां इन समस्याओं का कोई स्तित्व न हो.तुम लोगों का इन समस्याओं से निदान पाने का प्रयास प्रशंसनीय है. पहले हैजा और चेचक जैसी महामारी फ़ैल जाया करती थी और देखते ही देखते लाखों लोग काल के गाल मे नष्ट हो जाया करते थे. यह खुशी का विषय है कि इन समस्याओं से हमारा देश अब मुक्त हो चुका है.फ़िर भी एड्स एवं अन्य संक्रामक रोगों से निजात पाना आवश्यक है और इनके रोकथाम हेतु तुम लोगों के प्रयास की मैं सराहना करता हूं.
एक ऐसी भी चुनौती है जो भीतर ही भीतर हमारी व्यवस्था को खोखला किये जा रही है।मुझे दुख इस बात की है कि तुमलोग उस चुनौती का सामना करने के बजाय उसे सह दे रहे हो.यह चुनौती है भ्रष्टाचार को रोकना.पहले भी कुछ हद तक भ्रष्टाचार व्याप्त था, लेकिन आज स्थिति शर्मनाक हो चुकी है.आज तो न्याय मंदिर से लेकर मंत्रालयों तक भ्रष्टाचार जडे जमा चुकी है. जबकी सुविधायें बढी है, प्रति व्यक्ति आय कई गुणा बढ चुका है.सूचना प्रोद्योगिकी जैसे ब्रह्मास्त्र का कुशल प्रयोग कर भ्रष्टाचार को निर्मूल किया जा सकता है.मैं देखता हूं तुमलोग अन्य कार्य के लिये सूचना प्रोद्योगिकी का प्रयोग करते हो लेकिन वहां सूचना प्रोद्योगिकी का प्रयोग नहीं हो रहा है जहां भ्रष्टाचार होता है.
आज आतंकवाद और नक्सलवाद दो अहम समानान्तर समस्याएं आ खडी हुई है। धार्मिक कट्टरता ने आतंकवाद को पैदा किया है और पुलिसतंत्र एवं न्याय-व्यवस्था की अकर्मन्यता ने नक्सल्वाद को जन्म दिया है. यदि इनके मूलों को नष्ट किया जाये तो इन समस्याओं से निजात पाया जा सकता है. हिंसा का जबाब हिंसा से देकर आतंकी और नक्सली को मारा जा सकता है आतंकवाद और नक्सलवाद को नष्ट नहीं किया जा सकता.
मैं यह चाहता हूं कि तुमलोग इन समस्याओं पर विचार करो और ईमानदारी और निष्ठा से निदान की ओर आगे बढो। यह जान लो कि राष्ट्रभक्ति ही सर्वस्व है. एकमात्र यही गुण सभी समाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याओं पर भारी पडेगा और तुम्हे जीत दिलायेगा. जय हिन्द जय भारत.
तुम्हारा चाचा
जवाहर लाल.
